BE PROUD TO BE AN INDIAN

बुधवार, सितंबर 27, 2023

गुनगुनी धूप सी कविताओं का संग्रह 'गुनगुनी धूप में कविता"

लघु कविता-संग्रह - गुनगुनी धूप में कविता 
कवि - बलबीर सिंह वर्मा 'वागीश'
प्रकाशक - आनंद कला मंच प्रकाशन, भिवानी 
पृष्ठ - 120 
मूल्य - 250 / -
लघु कविता इन दिनों स्वतंत्र विधा के रूप में फल-फूल रही है। हर महीने अनेक लघु कविता संग्रहों का प्रकाशन हो रहा है। बलबीर सिंह वर्मा 'वागीश' का लघु कविता संग्रह 'गुनगुनी धूप में कविता' इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। 

शुक्रवार, अप्रैल 30, 2021

भूमिका - गीता दोहावली ( दिलबागसिंह विर्क )

श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति का अनूठा ग्रंथ है, जो विश्व के ज्ञाननिधि में एक अमूल्य चिंतामणि रत्न रूप में प्रकाशमान है। यह साहित्य सागर में अमृत कुंभ है, जिसमें कर्म-भक्ति-ज्ञान रूप में जीवनामृत भरा है। साथ ही यह एक सर्वांगसुंदर योगशास्त्र भी है। योग इसलिए कि यह शास्त्र परमपिता से जुड़ने की कला बताता है। श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा अनुपमेय शास्त्र है, जिसकी महिमा अपार है, अपरिमित है। इसके यथार्थ का वर्णन कोई नहीं कर सकता। शेष, महेश, गणेश भी इसकी महिमा को पूरी तरह से बखान नहीं कर सके, फिर मनुष्य तो अंशमात्र है। विद्वानों ने इसे अब तक अनेकाधिक कोटियों में रखा है - यह धर्म-ग्रंथ नहीं है, यह एक दर्शन है, एक रहस्यमयी ग्रंथ है, वेदों का सार-संग्रह है, यह सर्वशास्त्रमय है, यह गीतोपनिषद है, साक्षात भगवान की दिव्य-वाणी है आदि- आदि। निस्संदेह विश्व की अनेक भाषाओं में, अनेक गीता भाष्य प्राप्त हैं। इस ग्रंथ को देश-विदेशों के अनेक पूज्य संतों, मर्मज्ञ विद्वानों एवं गीता मनीषियों ने इसके हृदयकोश में क्या ज्ञानोपदेश भरा है, उसको उन्होंने अपने-अपने ढंग से समझाने का सफल प्रयास किया है, किंतु विदेशों में ही नहीं, अपितु भारत में भी कोई पूर्ण रूप से प्रामाणिक संस्करण मिलना असंभव ही प्रतीत होता है। हाँ, इतना निश्चित रूप से अवश्य कहा जा सकता है कि श्रीमद्भगवद्गीता एक सार्वभौमिक, सार्वकालिक, कल्याणकारी एवं जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन की क्षमता रखनेवाला अत्यंत ही अद्भुत ग्रंथ है, जो असीम सत्ता के साथ जोड़े रखकर, निष्काम, निरपेक्ष और फल की इच्छा किए बिना, अपने क्रियाकलाप करते रहने का संदेश देता है।

      श्रीमद्भगवद्गीता मनस्वी दिलबागसिंह विर्क की "गीता दोहावली" पुस्तक की पांडुलिपि अवलोकनार्थ मेरे समक्ष है। भारत के सत्त्वगुणी महान विद्वान, महात्मा, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का भाष्य प्राप्त होता है। उनसे पूर्व भी किंहीं विद्वानों ने भाष्य किया, ऐसा आदि शंकराचार्य के कार्य से विदित होता है, किंतु इन्हीं के भाष्य को प्रथम माना जाता है। संत शिरोमणि बाबा नामदेव ने भी भक्ति योग को आधार मानकर अपने आराध्य विट्ठल भगवान की स्तुति लिखी है और संत ज्ञानेश्वर ने तो पूरी गीता का मराठी भाषा में काव्य-भाष्य रूप दिया है, जो आज तक प्रसिद्ध है। आधुनिककालिक विद्वानों एवं मनीषियों ने भी श्रीमद्भगवद्गीता पर अपनी लेखनी का चमत्कार प्रदर्शित किया है, उनमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, विनोबा भावे आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। रविंद्रनाथ टैगोर ने भी कुछ पद बांग्ला भाषा में लिखे, जो 'गीतांजलि' नाम से प्रसिद्ध हैं। बाद में, प्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं कवि आइंस्टाइन ने गीतांजलि का अंग्रेज़ी अनुवाद किया, जिस पर टैगोर को नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी श्रीमद्भगवद्गीता का भाष्य अंग्रेज़ी में किया। श्रीमद्भगवद्गीता के इस लोक-कल्याणकारी अवदान और विश्व मान्य महत्ता को दृष्टि-पथ में रखकर, गीता प्रेस ने भी अनेक छोटे-बड़े संस्करण तथा विस्तृत टीकाएँ प्रकाशित की हैं, जिनमें ब्रह्मलीन जयदयाल गोयंदका द्वारा प्रणीत 'तत्त्व विवेचनी' टीका अन्यतम है। रासबिहारी पांडेय ने श्रीमद्भगवद्गीता नाम से इसका हिंदी दोहों में अनुवाद करके इस दिशा में अनूठा प्रयास किया है।

    दोहा हिंदी काव्य की सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्राचीनतम विधा है। अपभ्रंश, प्राकृत, पाली, खड़ी बोली भाषाओं से लेकर हिंदी तक इसकी धारा अविछिन्न गति से प्रवाहित होती है। भक्तिकाल में कबीर, नानक, दादू, मलूकदास आदि अनेक संतों ने अपनी अनुभूतियों को दोहे के माध्यम से ही व्यक्त किया है। तुलसी, जायसी, रहीम और बिहारी की लेखनी का स्पर्श पाकर अनुभूति की गहराई के साथ-साथ उसने अपार लोकप्रियता प्राप्त की। वर्तमान में, वेदों में 'गायत्री' और लौकिक संस्कृत में 'अनुष्टुप' छंद की जो लोकप्रियता तथा सरलता दर्ज है, वही हिंदी में 'दोहा' छंद की है। वेद के अंग व्याकरण को जहाँ मुख माना गया है, वहाँ छंद को पाद बताया है। वेद का सबसे छोटा छंद 24 वर्णों व तीन चरणों का 'गायत्री' छंद है, इस 24 वर्णों वाले गायत्री छंद से लौकिक छंद 'अनुष्टुप' ( जिसमें 8 वर्णों के चार चरण होते हैं) प्रचलन में आया। अनुष्टुप वार्णिक छंद है, जिसमें 8 × 4 = 32 वर्णों का विधान है। छंद शास्त्र के आदि प्रवर्तक पिंगल ऋषि ने अनुष्टुप के लक्षण निश्चित करते समय लिखा है, "अनुष्टुप में पाँचवां वर्ण चारों चरणों में लघु (ह्रस्व), दूसरे और चौथे चरण में सातवाँ वर्ण भी लघु और प्रत्येक चरण में छठा वर्ण गुरु है। यहाँ यही संकेत सुखद आश्चर्य है कि यदि अनुष्टुप को मात्राबद्ध किया जाए, तो इसके विषम ( 1,3 ) चरण में तेरह मात्रा तथा सम चरण (2,4) में ग्यारह मात्राएँ प्रायः मिलती हैं; रामायण, महाभारत तथा श्रीमद्भगवद्गीता के अधिकांश श्लोक अनुष्टुप छंद में ही है।

      जायसी ने प्रथम बार चौपाई चंद्रमणियों में हीरकवत दोहे का प्रयोग कर मुक्त काव्य को नवीनता प्रदान की। इसी का अनुकरण श्री तुलसी ने रामचरितमानस में भी किया। हिंदी साहित्य में जिस प्रकार हम भाषा विकास क्रम संस्कृत - प्राकृत - पालि - अपभ्रंश - ब्रज, खड़ी बोली से हिंदी की ओर गतिशील हुए, उसी भाँति कबीर, रहीम, जायसी, बिहारी की भाषाएँ। वस्तुतः इसी प्रकार 'दोहा' भी हमारे जीवन में वेदों के समय से गायत्री - अनुष्टुप से प्रविष्ट होता हुआ उर्दू तथा हिंदी में 'सत्यं-शिवं-सुंदरं' की संकल्पना के साथ प्रस्तुत हो रहा है। दोहा सतसई की परंपरा को आगे बढ़ाते, वर्तमान में अनेकाधिक नाम दर्ज़ हैं, किंतु 'गीता दोहावली' के रूप में गीता उपासक दिलबागसिंह विर्क से अन्यंत्र विरला ही है। पिछले दशक से हिंदी में दोहा लेखन की बाढ़-सी आई है, किंतु 'दोहावली' दुर्लभ रूप में दृष्टव्य है। यह दोहे की लोकप्रियता का एक अकाट्य प्रमाण है। वर्तमान परिवेश में राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, प्रकृति-सौंदर्य आदि अनेक दोहावली मिल सकती हैं, किंतु दिलबागसिंह विर्क विरचित 'गीता दोहावली' विषयक विशेष प्रस्तुतिकरण नहीं। फिर प्रकृत दोहावली में दोहा संदर्भ में गहनतम अनुसंधानात्मक आलेख एक नवोन्मेषकारी प्रयोग रूप में चरितार्थ होना श्लाघनीय कृत्य है। इस प्रकार दोहा परंपरा को समृद्धि प्रदान करती प्रकृत दोहावली अनंत, अमूल्य दोहा रूप में जड़ित 621 दोहे संग्रहीत हैं। संस्कृत भाषा के न जानने वाले जन के लिए यह पुस्तक सरल, सहज व क्लिष्ट शब्द-अर्थ सहित, हिंदी भाषा में गीता ज्ञान को और भी अधिक सरलीकृत कर प्रस्तुत होती है। इसमें ज्ञान-भक्ति- कर्म और योग की अपूर्व एकता के साथ आशावाद का निराला निरूपण समाहित है, कर्त्तव्य कर्म का उच्चतम प्रोत्साहन है,भक्ति-भाव का सर्वोत्तम वर्णन, ज्ञान की गंगा-सी धार तथा योग की चेतना है।

     कविवर ने, आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने अपने मित्र अथवा भक्त अर्जुन को जो भगवद्गीता का उपदेश अठारह अध्यायों अथवा वार्ता रूप में दिया था, उस दृष्टि से प्रकृत दोहावली यथारूप अनुपम दृष्टव्य है। इस महान ग्रंथ के यथार्थ रूप का माध्यम बना है, कविवर का 'दोहा' छंद। जिस प्रकार आत्मा अजर, अमर है, वैसे ही गीता वाणी अमर है। यह सीधी शून्य में जाकर, वहाँ स्थायी बनी रहती है। शायद यही कारण इस कृति की रचना का बना है। कविवर के शून्य में विराजमान श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद की दिव्य-ध्वनि मुखरित हो क़लमबद्ध हुई है। इस कृति में सभी अध्यायों को पृथक-पृथक कर, श्लोकों को दोहा छंद में रचा गया है। लगता है कविवर के अनुभव यंत्रणाओं के लंबे दौर से गुजरकर एक भावातीत पूर्ण तल्लीनता से उस अगोचर के साथ जुड़े हैं। यह तल्लीनता इन्हें आस्था में उद्भूत एक समर्पण की भावना से जोड़ती है, न कि टूटने की कमज़ोरी से, जिसकी अभिव्यक्ति इनके दोहों में देखी जा सकती है -

ज्ञानयोग तूने सुना, आगे सुन अब कर्म

कर्म ज़रूरी है सदा, समझो इसका मर्म।

 ●  ●  ●

अंतर्यामी में रहा, जिसका भी विश्वास

पकड़ूँ उसका हाथ मैं, न टूटने दूँ आस।

     ●  ●  ●

नाश हुआ जब धर्म का, लेता हूँ अवतार

मैं अविनाशी रूप हूँ, धरूँ देह साकार।

 ●  ●  ●

यह निश्चित ही इनकी चेतना का विकास कहा जा सकता है। ये आत्मीय क्षण कभी-कभी स्वयं रचनाकार की अनुभावना की पकड़ में नहीं आते, किंतु यह उसकी दार्शनिक बनने की प्रक्रिया ही होती है -

संशय में डूबे रहें, जो दें श्रद्धा छोड़

वे कुछ भी पाते नहीं, बस है यही निचोड़।

तमाम कवि / लेखकों का यह एक सत्य रहा है कि जब वह सिद्धि की ओर जाता है, तो अनायास दर्शन में उसकी अभिव्यक्ति अथवा संवेदना प्रणीत होने लगती है, किंतु कविवर दिलबागसिंह विर्क अपनी यौवनावस्था में ही सिद्धि प्राप्त करते दिखाई देते हैं, अन्यथा इतने गूढ़ ग्रंथ के अंतस में झाँकना और इसके काँचनमणि प्रकाश की किरणों को क़लमबद्ध करना, इतना सहज कार्य नहीं है। वास्तव में कवि ने बड़े शांत और स्निग्ध- भाव से सभी न्यूनताओं और संभावनाओं को अभिव्यक्त किया है।

    अतः कविवर दिलबागसिंह विर्क विराट की ओर उन्मुख होकर, अपनी तथा मानवता की तलाश करते दृष्टिगत होते हैं। ऐसा लगता है जैसे मानव मन अज्ञात क्षणों की सत्ता से साक्षात्कार करना चाहता है। दोहे एक नए क्षितिज को छूते हैं तथा कवि का एक सर्वदा परिवर्तित रूप परिलक्षित होता है। प्रत्येक श्लोक को 'परिचय' के रूप में गढ़ा गया है। आज का मनुष्य जहाँ भी किसी परब्रह्म अथवा परमात्मा की प्रार्थना, वंदना अथवा मंगलाचरण को पढ़ता है, तो उसके मन में अनेक प्रश्न उठते हैं कि यह 'ब्रह्म क्या है?' अगोचर, अज्ञात तथा अनिर्वचनीय से आज सहज संतोष नहीं मिलता। कवि ने इन दोहों मे उस ब्रह्म रूप को कर्म-ज्ञान-भक्ति और योग के माध्यम से ब्रह्म-वाणी को मूर्त बनाने की सफल कोशिश की है। अतः प्रकृत 'गीता दोहावली' को श्रीकृष्ण-अर्जुन वार्ता का पुनर्जन्म कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। अतः गीता को समझने के लिए निश्चय ही सरल भाषा, लोकप्रिय विधा का प्रयोग अपेक्षित है, जिसका कविवर ने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निर्वहन किया है। मुझे आशा है, इस पुस्तक से अधिकाधिक जन लाभ लेंगे। यह पुस्तक विद्वानों में ख्याति प्राप्त करेगी। निःसंदेह गीता के द्वारा मानवता को उपदेश देनेवाले परमात्मा ने अपनी करुणा कविवर पर न्योछावर की है। कवि के इस सद्प्रयास के लिए मैं अभिनंदन करता हूँ तथा शुभकामनाओं सहित, मंगलमय जीवन की मुहुर्मुहुः कामना करता हूँ। इति शुभम।

शुभेच्छु

डॉ. अशोक कुमार मंगलेश

आलोचक एवं कवि

अध्यक्ष, निर्मला स्मृति साहित्यिक समिति

चरखी दादरी, हरियाणा

मो. - 81999-29206


शुक्रवार, मार्च 26, 2021

अतीत गौरवमयी मानते हुए सुंदर भविष्य की कल्पना करती कविताएँ

कविता-संग्रह - कैसे भूलूँ तेरा अहसान
कवि - बलबीर सिंह वर्मा
प्रकाशक - मोनिका प्रकाशन, दिल्ली
पृष्ठ - 152
कीमत - ₹400/-
हरियाणा साहित्य अकादमी की अनुदान योजना के अंतर्गत वर्ष 2018 के लिए चयनित बलबीर सिंह वर्मा की पुस्तक "कैसे भूलूँ तेरा अहसान" का प्रकाशन मोनिका प्रकाशन, दिल्ली से 2021 में हुआ है। प्रकाशन की दृष्टि से यह उनकी दूसरी कृति है, लेकिन रचना कर्म की दृष्टि से यह उनकी पहली कृति है। इस संग्रह में 88 रचनाएँ हैं, जिसकी शुरूआत माँ शारदे का वंदन करते हुए की है। इसके अतिरिक्त भी कुछ भक्तिपरक कविताएँ कवि ने रची हैं। वह शिव, कृष्ण की महिमा का गान करता है। कृष्ण को पुनः आकर सुदर्शन चक्र चलाने के लिए कहा गया है। मीरा की भक्ति को दिखाया गया है। 

शुक्रवार, मार्च 05, 2021

पतनोन्मुख समाज का चित्रण करता कविता-संग्रह

कविता-संग्रह - डूबी सच की पतवार
कवि - राकेशकुमार जैन

प्रकाशक - मोनिका प्रकाशन, दिल्ली

क़ीमत - ₹400/-

पृष्ठ - 136

"पहला प्रयास" कविता-संग्रह के साथ साहित्य के क्षेत्र में कदम रख चुके राकेशकुमार जैनबन्धु का सही अर्थों में पहला प्रयास कहे जाने वाले कविता-संग्रह की पांडुलिपि मेरे हाथ में है। इसे द्वितीय प्रयास इसलिए बनना पड़ा क्योंकि इसको अकादमी की अनुदान योजना के अंतर्गत भेजा गया था और परिणाम आने से पूर्व कवि के पास एक संग्रह की सामग्री तैयार हो गई, जिसे उसने प्रकाशित करवा लिया। अनुदान योजना भले ही लेखकों को पुस्तक प्रकाशित करवाने हेतु आर्थिक मदद देने के लिए है, लेकिन इसके साथ-साथ यह योजना यह भी इंगित करती है कि रचनाकार का स्तर साहित्यिक कहा जाने योग्य है। इस दृष्टि से यहाँ अकादमी का कार्य सराहनीय है, वहीं राकेश बधाई के पात्र हैं कि वे अब अकादमी द्वारा स्वीकृति प्राप्त कवियों की श्रेणी में आ गए हैं।

           यहाँ तक इस पांडुलिपि का सवाल है, इसमें 90 कविताएँ हैं। संग्रह का शीर्षक बताता है कि कवि की नजर सच के डूबने की तरफ गई है। आज के हालात चिंतनीय कहे जा सकते हैं क्योंकि सच हार रहा है, सभ्यता और संस्कृति पतन की ओर बढ़ रही है। शिक्षा दुकान बन गई है। कवि की पैनी नजर इन पर पड़ती है। भूल गया नैतिकता, मर गया जमीर, डूबी सच की पतवार, सपना या सच, नई गीता, संस्कार सब मिट गए, रिश्ते हुए तार-तार, प्रण, नशा कुछ काम न आया, ज़िंदगी करती इशारे, भटका देश का युवा आदि कविताओं में कवि इसी दशा का चित्रण करता है। ये कविताएँ आज के इंसान का सटीक चित्रण करती हैं। कवि ने खुद को भी इसमें शामिल किया है -

"रिश्ते-नाते तोड़कर / मैं बन गया अमीर /

भूल गया हूँ सब कुछ / मेरा मर गया जमीर"

कवि का खुद को शामिल करना इशारा है कि बड़ी-बड़ी बातें करने वाले हम सभी पतन के लिए कहीं-न-कहीं जिम्मेदार हैं। भले ही हम दूसरे पर अंगुली उठाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लें, लेकिन वास्तव में निर्दोष हम भी नहीं। हमारे कारण ही झूठ, फरेब, अन्याय, अत्याचार बढ़ रहा है। कवि लिखता है -

"झूठ है मजबूत बड़ा / डूबी सच की पतवार"

          कवि किसान, गरीब, विधवा, वृद्ध, कन्या सभी के दुखों को भी देखता है। करदे तू कल्याण, मैं हूँ विश्वशक्ति, फुटपाथ, माँ के अश्रु, देखी अनाथ की पीर, वृद्धाश्रम, विधवा का दुख, फिर भी जन्म लूंगी, दुखी अम्मा, किसान की दास्तां, मैं गरीब, दबा कुचला, आम आदमी, अभागी माँ आदि कविताएँ इन्हीं विषयों से संबंधित हैं। भटके युवा का चित्रण भी उसकी कविताओं में मिलता है। कवि ने यहाँ दीन-दुखियों की दशा का चित्रण किया है, वहीं आशावादी सोच को भी दिखाया है। वह बच्चों को मॉं-बाप की सेवा करने का संदेश देते हुए कहता है-

"मत भूल वो अवतार हैं / तेरे वो जीर्णोद्धार हैं /

छू लो माँ-बाप के चरण / वे तेरे स्वर्गद्वार हैं"

वह ज़िंदगी को इम्तिहान बताता है। उसका मानना है कि मंजिल पाना आसान नहीं, लेकिन इसे पाया जा सकता है। वह हौसला देते हुए लिखता है -

"नाकामियों को देखकर दिल मत उदास कर /

कुछ कामयाबी के दिन तो याद कर /

क्या वो तेरी सफलता नहीं" 

पैसा-पैसा करने वाले से सवाल करता है -

"क्या यही तेरा वजूद है?" 

वह संस्कार बचाए रखने की बात करता है। खून-पसीने की रोटी कमाने का संदेश देता है। ऐसे पात्र का चित्रण करता है, बुरा करने के बाद जिसकी आत्मा जागती है। वह सद्कर्मों को मोक्ष का द्वार कहता है। धार्मिक पाखंडों की बजाए दीन दुखी की मदद करने की बात करता है। वह चेतावनी भी देता है-

"होगी प्रलय / पड़ेगा सूखा / मरेगा हर प्राणी /

जैसे-जैसे धरती पर / पाप बढ़ेगा"

       कवि मैं के रूप में अपनी कविताओं में शामिल है और वह अपनी कामना जाहिर करता हुआ हर दृष्टि से श्रेष्ठ होना चाहता है। वह ईश्वर को भी याद करता है। वह उसकी वंदना भी करता है और उससे आशीर्वाद भी माँगता है। वह उसे याद करते रहने की बात कहता है। 

       पौराणिक प्रसंगों को लेकर भी अनेक कविताएँ हैं, यथा - लंका में अंगद, शिव-पार्वती बन्धन, सीता हरण, चीर हरण आदि। 'छीन लो हक' कविता में प्राचीन प्रसंगों से लेकर आधुनिक दौर तक नारी की दशा बताते हुए मातृशक्ति को प्रेरित करता हुआ लिखता है -

"माँगने से न मिलें / एकजुट हो /

छीन लो हक" 

वह फौजी की तमन्ना का बयान करता है, हिंदी की दशा का हाल बताता है, माँ भारती को रणचंडी, काली बताता है।

        प्रकृति के वर्णन में कवि का मन खूब रमा है। छाई खुशियाँ चहुँ ओर, पॉलीहाउस में कैद, आँखे तरस जाएँगी, घटा घनघोर छा रे, घनघोर घटा, निखरा रूप और यौवन, संवाद, समुद्र का जल, सुधा, शातिर चोर, कुदरत, भोर हो आई, चाँद-चाँदनी का पहरा, धन्य है माली, धरा और मेघ, हवा, पानी की बूँद, पक्षी मेरे धन, कैसे होगी गुजारी, अपूर्व सौंदर्य आदि कविताओं में प्रकृति चित्रण को आधार बनाया है। इन कविताओं में कहीं पर प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन है, कहीं खुद को प्रकृति का अंग मानकर प्रकृति के दुख को बयां किया है और कहीं प्रकृति के सहारे से अन्य प्रसंगों को उठाया है। पक्षियों के संवाद के माध्यम से बदल रही स्थितियों को दिखाया गया है। प्रदूषण का वर्णन है। धरती की बेबसी का बयान है, लेकिन वह कहती है-

"फिर भी मैं खड़ी स्थिर / धरा जो हूँ /

सब मुझ पर निर्भर"

आधुनिकता के प्रभाव को भी इन कविताओं के माध्यम से स्पष्ट किया गया है और मानव जात को स्वार्थी बताया गया है, लेकिन कवि की दृष्टि में किसान महान है, तभी चाँद कहता है-

"पिलाऊँ सुधा पालनहार को / युगों-युगों रहे जो अमर" 

       शिल्प पक्ष से इन कविताओं में कवि ने शाब्दिक चमत्कार पर ध्यान दिया है। यथा -

"घर मेरे घृत घट पड़े / बरसन का बहाना बना"

अनुप्रास का भरपूर प्रयोग है। तत्सम शब्दों का भी खूब प्रयोग हुआ है। प्रकृति चित्रण करते हुए मानवीकरण के उदाहरण मिलते हैं। कविताएँ मुक्त छंद में हैं, लेकिन तुकांत का प्रयोग भी है। वर्णनात्मक के साथ-साथ आत्मकथात्मक शैली का खूब प्रयोग हुआ है। 

        संक्षेप में, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकुला से अनुदान प्राप्त इस पांडुलिपि के प्रकाश्नोपरांत साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा, ऐसी मुझे आशा है। कवि निरन्तर सृजन करता हुआ श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कृतियाँ साहित्य जगत को दे, यही मेरी कामना है। 

दिलबागसिंह विर्क

95415-21947

बुधवार, नवंबर 18, 2020

भक्ति और प्रेम की बात करता कविता-संग्रह

 कविता-संग्रह - तुम्हारे लिए

कवयित्री - स्वाति शशि

प्रकाशक - ब्लैकवर्डस पब्लिकेशन, थाने

पृष्ठ - 152

कीमत - ₹200/-

अमेरिका के मिशिगन में रह रही भारतीय मूल की कवयित्री स्वाति शशि का हिंदी साहित्य के क्षेत्र में पहला कदम कविता-संग्रह के रूप में आया है, जो समर्पण भावना से ओत-प्रोत है। प्यार की भावना को समर्पित इस कविता-संग्रह का नाम "तुम्हारे लिए" भी समर्पण भावना का परिचायक है। थाने ( महाराष्ट्र ) के ब्लैकवर्डस पब्लिकेशन से प्रकाशित इस संग्रह में 115 कविताएँ हैं। इनमें से 113 कविताएँ कवयित्री ने लिखी हैं और 2 कविताएँ स्वाति पर उसकी दो दोस्तों रश्मि किरण और अर्चना कुमारी ने लिखी हैं। इस संग्रह में माँ, रंग, नदी, चाँद, ज़िंदगी, लम्हा, बातें आदि अनेक शीर्षकों को लेकर एकाधिक कविताओं की रचना की गई है। संग्रह में भक्ति और प्रेम की प्रधानता होते हुए भी समाज और प्रकृति का भरपूर चित्रण मिलता है।

बुधवार, नवंबर 11, 2020

पहली दस्तक से उम्मीद जगाता विविधता भरा कविता-संग्रह

कविता-संग्रह - एहसास के गुंचे

कवयित्री - अनीता सैनी

प्रकाशन - प्राची डिजिटल पब्लिकेशन

पृष्ठ - 180

मूल्य - 240/-

प्राची डिजिटल पब्लिकेशन, मेरठ से प्रकाशित "एहसास के गुँचे" अनीता सैनी का प्रथम संग्रह है। इस संग्रह में 128 कविताएँ हैं। पहली कविता गुरु वंदना के रूप में है, जिसमें 5 दोहे हैं। कवयित्री के अनुसार गुरु के ध्यान से ज्ञान की राह संभव होगी, उनके अनुसार गुरु महिमा का बखान संभव नहीं -

"गुरु की महिमा का करें, कैसे शब्द बखान

जाकर के गुरुधाम में, मिलता हमको ज्ञान।" (पृ. - 19)

इसके बाद की 127 कविताओं को वर्ण्य-विषय के आधार पर 6 विषयों में विभक्त किया गया है। 

सोमवार, जुलाई 06, 2020

वीरों को याद करती, आदर्श समाज का सपना देखती कविताओं का संग्रह

कविता-संग्रह - ढाई आखर
कवि - बलबीर सिंह वर्मा 'वागीश'
प्रकाशक - Book Rivers
कीमत - 180
बलबीर वर्मा सोशल मीडिया के साहित्यिक ग्रुपों का जाना-माना नाम है और यह नाम उसने अल्पावधि में कमाया है और इसका कारण है निरन्तर सृजन करना, साहित्यिक ग्रुपों में बढ़ चढ़कर भाग लेना । निरन्तर लेखन से उसकी रचना शैली में निखार आया है। अब उसका झुकाव छंदबद्ध की ओर हुआ है, लेकिन इस संग्रह में छंदमुक्त रचनाएँ ही हैं । इस संग्रह में तुकांत का प्रयोग भले ही खूब हुआ है, लेकिन रचनाएँ छंदमुक्त ही रही हैं । हाँ, जापानी छंद सेदोका में एक कविता जरूर है । यह संग्रह उसकी शुरुआती रचनाओं का है । इस संग्रह में कवि ने समाज के नायकों, त्योहारों को लेकर लिखी कविताओं को स्थान दिया है, तो समाज में फैली विसंगतियों को देखकर मन में उठे सवालों, ख्यालों से बनी कविताओं को भी रखा है । कवि एक आदर्श समाज का सपना देखता है ।

बुधवार, जून 17, 2020

प्रकृति के सान्निध्य में रची गई कविताएँ


कविता-संग्रह - पहाड़ के बादल अभिनय करते हैं
कवि - डॉ. रूप देवगुण
प्रकाशक - राज पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली
पृष्ठ - 76
कीमत - ₹100/-

राज पब्लिशिंग हाउस दिल्ली से 2008 में प्रकाशित 'पहाड़ के बादल अभिनय करते हैं', 'रूप देवगुण' का आठवाँ कविता-संग्रह है, जिसमें मध्यम आकार की 37 कविताएँ हैं। सभी कविताएँ प्रकृति से जुड़ी हुई हैं। सिर्फ एक कविता दो दोस्तों से संबंधित है। इसमें दो दोस्तों की बातचीत है और कवि कहता है कि हमें दूसरे को बोलने का मौका देना चाहिए। इस कविता में  वाणी को गड़गड़ाहट और बारिश जैसा कहकर कवि ने प्रकृति से जोड़ा है।

बुधवार, जून 10, 2020

साहित्य में अपनी खनक छोड़ती शायरी

पुस्तक - आज के प्रसिद्ध शायर अमीर कज़लबाश
संपादक - कन्हैयालाल नन्दन
प्रकाशक - राजपाल
पृष्ठ - 160
कीमत - ₹150/-
"क्या किसी दौर में ऐसा भी हुआ है यारो
आईना देख के हर शख्स डरा है यारो।"
आईना सच को सच कहता है और इसलिए आज का दौर आईने से, आईना दिखानेवालों से डरता है। शायर से बढ़कर आईना दिखानेवाला कौन होगा। अमीर कज़लबाश ऐसा ही शायर है, जिसकी शायरी के केंद्र में आईना है। यह बात दावे के साथ कही जा सकती है 'राजपाल' प्रकाशन से प्रकाशित कन्हैयालाल नन्दन द्वारा संपादित पुस्तक "आज के प्रसिद्ध शायर अमीर क़जलबाश" को पढ़कर।

बुधवार, जून 03, 2020

जीवन दर्शन की बात करता कविता-संग्रह

कविता-संग्रह - नदी की तैरती सी आवाज़
कवि - रूप देवगुण
प्रकाशक - सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल
कीमत - ₹150/-
पृष्ठ - 96
'नदी की तैरती-सी आवाज़' रूप देवगुण का ग्यारहवाँ कविता-संग्रह है, जिसका प्रकाशन 2013 में सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल से हुआ। इस संग्रह में 48 कविताएँ हैं और अधिकांश कविताएँ प्रकृति से जुड़ी हुई हैं। इस संग्रह का नाम भी इसे प्रकृति काव्य सिद्ध करता है। कविताओं में प्रकृति के किसी-न-किसी अवयव का जिक्र है और उसके माध्यम से कवि अपनी बात करता है। कवि के जीवन के प्रति नजरिये को इन कविताओं से समझा जा सकता है।

बुधवार, मई 27, 2020

प्रकृति के सान्निध्य में सरल जीवन जीने का सन्देश देती कविताएँ

कविता-संग्रह - युग से युग तक
कवि - राजकुमार निजात
प्रकाशन - बोधि प्रकाशन, जयपुर
पृष्ठ - 124
कीमत - ₹150/-
राजकुमार निजात कृत कविता-संग्रह "युग से युग तक" बोधि प्रकाशन से सितंबर 2018 में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में 101 कविताएँ हैं, जिन्हें कवि ने छह दिनों की अल्पावधि में सृजित किया है। कवि ने प्रकृति और जीवन से जुड़े सजीव-निर्जीव अवयवों जैसे - नदी, पहाड़, सूरज, आसमान, कुआँ, वृक्ष, परिंद, बच्चा, शिक्षक, दादी, स्कूल, घण्टी, रास्ता आदि के माध्यम से अपनी कविताएँ कही हैं। वह परिंदों से, सूरज से, आसमान से बातचीत करता है।

बुधवार, मई 20, 2020

दाम्पत्य में आई संवादहीनता का परिणाम दिखाता उपन्यास

उपन्यास - कोई फायदा नहीं
उपन्यासकार - श्याम सखा श्याम
पृष्ठ - 120
(त्रैमासिक पत्रिका मसि-कागद के अंक के रूप में प्राप्त)
हरियाणा साहित्य अकादमी से पुरस्कृत उपन्यास 'कोई फायदा नहीं' हरियाणा साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. श्याम सखा श्याम द्वारा लिखा गया है। इस उपन्यास को उन्होंने 'स्त्री-पुरुष संबंधों की विडम्बना पर आधारित' कहा है। ये कहानी है कुलश्रेष्ठ दम्पति की, जिनका दाम्पत्य जीवन बड़ा दुखदायी रहा। रत्ना का यह कहना -
"क्या, विवाह मजबूरी ही रहेगी हमेशा?
" (पृ. - 84)
इसके कथानक को स्पष्ट करती है। वैवाहिक जीवन क्यों दुखदायी बना, इसको विस्तार से बताया गया है। यह घट चुकी घटनाओं का बयान है, इसलिए क्यों का उत्तर मिल पाता है। घट चुकी घटनाएं डायरी के द्वारा प्रकट होती हैं। एक डायरी नरोत्तम कुलश्रेष्ठ की है और दूसरी डायरी उसकी पत्नी रत्ना की। ये दोनों डायरियाँ मिलती हैं शेखर गोस्वामी को। शेखर कर्णधार की भूमिका निभाता है। 

बुधवार, मई 13, 2020

मन साधकर जीवन को बदलने की बात करती पुस्तक


पुस्तक - सफल एवं स्वस्थ जीवन के सात गुरुमंत्र
लेखक - डॉ. पुष्प कुमार शर्मा
प्रकाशन - आधार प्रकाशन, पंचकूला
पृष्ठ - 119
कीमत - ₹200/-
दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे अहसान उतारता है कोई। 
गुलजार का यह शे'र बहुत से लोगों के जीवन के प्रति नज़रिये को बयां करता है। ज्यादातर लोग ज़िन्दगी जीने की बजाए दिन काटने में विश्वास रखते हैं, जबकि ज़िन्दगी का असली मज़ा जीने में है। जीने की कला सिखाने के लिए अनेक विद्वानों, महापुरुषों ने प्रयास किये हैं। आधार प्रकाशन, पंचकूला से प्रकाशित डॉ. पुष्पकुमार शर्मा की पुस्तक "सफल एवं स्वस्थ जीवन के सात गुरुमंत्र" इसी दिशा में एक प्रयास है। इस पुस्तक में 10 अध्याय हैं, जिनमें से पहले सात अध्याय एक-एक मंत्र के रूप में हैं। इन अध्य्यायों से पूर्व लेखक ने अपनी बात भी कही है।

रविवार, मई 10, 2020

कवि की जीवन दृष्टि को परिलक्षित करती कविताएँ


कविता-संग्रह - मेरे घर आई नदी
कवि - पूरन मुद्गल
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन, जयपुर
कीमत - ₹100/-
पृष्ठ - 87
2018 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित कविता-संग्रह "मेरे घर आई नदी" स्वर्गीय पूरन मुद्गल जी की अंतिम पुस्तक है। इस संग्रह में 48 कविताएँ हैं, जिनमें कवि कभी खुद से तो कभी दूसरों से संवाद रचाता है। हालांकि वह किसी वाद, दर्शन में बंधना नहीं चाहता, लेकिन वह कर्मवाद का समर्थक है। वह कहता है-
"भाग्य के दस्तक देने पर भी / दरवाज़ा खोलने के लिए /
उठना तो पड़ता है" (पृ. - 35)

बुधवार, मई 06, 2020

समाज के उजले और कुरूप पक्ष को दिखाती लघुकथाएँ

लघुकथा-संग्रह - तो दिशु ऐसे कहता
लघुकथाकार - रूप देवगुण
प्रकाशक - सुकीर्ति प्रकाशन
पृष्ठ - 95
कीमत - ₹150/-
2012 में सुकीर्ति प्रकाशन से प्रकाशित लघुकथा-संग्रह "तो दिशु ऐसे कहता" रूप देवगुण जी का चौथा लघुकथा-संग्रह है। इस संग्रह की लघुकथाओं के माध्यम से लेखक ने समाज के उजले पक्ष को भी दिखाया है और कुरूप पक्ष को भी। कुरूप पक्ष को लेकर लेखक ने कहीं-कहीं सिर्फ स्थिति का चित्रण मात्र किया है, और कहीं-कहीं कटाक्ष किया है। कुछ लघुकथाओं में लेखक रास्ता भी दिखाता है।

रविवार, मई 03, 2020

मसाले और सालन में लिपटी कहानियाँ

कहानी-संग्रह - नमक स्वादानुसार
लेखक - निखिल सचान
प्रकाशक - हिन्द-युग्म
पृष्ठ - 165
कीमत - ₹120/-
कहानी-संग्रह 'नमक स्वादानुसार' का पहला संस्करण 2013 में हिन्द-युग्म, दिल्ली से प्रकाशित हुआ और यह निखिल सचान का पहला कहानी-संग्रह है। इसके कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं, जो इसकी लोकप्रियता का सूचक है। हिन्द-युग्म नई हिंदी आंदोलन का ध्वजवाहक है और इसके अंतर्गत इसके अनेक लेखक हिंदी साहित्य में नामी लेखक का खिताब लिए हुए हैं, लेकिन जिस नई हिंदी की वकालत की जा रही है, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए या नहीं, यह पाठक को तय करना है। नई हिंदी का एक प्रयोग तो रोमन लिपि का प्रयोग है, जो देवनागरी लिपि के लिए खतरा कहा जा सकता है और दूसरा प्रयोग है गालियों की भरमार। इस संग्रह में रोमन लिपि का प्रयोग भी हुआ है, और अशिष्ट भाषा का भरपूर प्रयोग भी, हालांकि रोमन लिपि का प्रयोग एक विशेष पात्र को प्रस्तुत करने के दृष्टिकोण से स्वीकार किया जा सकता है, फिर भी वह हिंदी के सामान्य पाठक के काम का नहीं।

बुधवार, अप्रैल 29, 2020

खुद से बात करने, सकारात्मक रहने की सलाह देती पुस्तक

पुस्तक - 5 पिल्स लेखक - डॉ. अबरार मुल्तानी प्रकाशन - राधकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली कीमत - ₹150/- पृष्ठ - 144
राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित "5 पिल्स" डॉ. अबरार मुल्तानी की डिप्रेशन-स्ट्रेस मुक्ति विषय से संबंधित पुस्तक है। डॉ. मुल्तानी पेशे से डॉक्टर हैं और वे दवाइयों से तो मरीजों को ठीक करते ही हैं, साथ-ही-साथ अपने लेखन द्वारा भी स्वस्थ रहने के उपाय बताते हैं। डिप्रेशन का संबन्ध तो जीवन-शैली से है, इसलिए इस विषय पर पुस्तक दवाई से अधिक महत्त्वपूर्ण है, लेकिन पुस्तक कोई भी हो, तभी अपना प्रभाव दिखाती है, जब उसे सिर्फ पढ़ने तक न रखकर उसकी बातों को जीवन में उतारा जाए। यही समझाने के लिए डॉ. मुल्तानी ने पुस्तक की शुरूआत में ही पुस्तक का अधिकतम लाभ उठाने का तरीका बताया है और यह तरीका सिर्फ इसी पुस्तक तक न रखकर हर पुस्तक पर अपनाया जाए तो पुस्तकें निस्संदेह अधिक उपयोगी हो पाएँगी।

रविवार, अप्रैल 26, 2020

प्रेम और सामाजिक विषयों की कहानियों का संग्रह

कहानी-संग्रह - वो यादें
लेखिका - इंदु सिन्हा
प्रकाशक - सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल
पृष्ठ - 96
कीमत - ₹200/-
2011 में सुकीर्ति प्रकाशन कैथल से प्रकाशित इंदु सिन्हा के कहानी-संग्रह में ग्यारह कहानियाँ हैं, जो प्रेम के पलों, प्रेम में संघर्ष और समाज के विविध विषयों से संबंधित हैं। लेखिका को प्रीत और पराग नाम विशेष प्रिय लगता है, तभी चार कहानियों के पात्र यही हैं। यह भी आभास होता है कि संभवतः ये एक ही युगल है, जिसकी कहानी को लेखिका ने चार भागों में विभक्त करके कहा है। तीन कहानियाँ तो एक श्रृंखला का ही हिस्सा लगती हैं।

बुधवार, अप्रैल 22, 2020

जीवन अनुभवों से निकले मोतियों का संग्रह

सूक्ति-संग्रह - मनोहर सूक्तियाँ
सूक्तिकार - हीरो वाधवानी
प्रकाशन - के.बी.एस. प्रकाशन, दिल्ली
कीमत - ₹450/-
पृष्ठ - 240 ( सजिल्द )
हीरो वाधवानी एक प्रसिद्ध सूक्तिकार हैं। "मनोहर सूक्तियाँ" उनका तीसरा सूक्ति संग्रह है, जो के.बी.एस. प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित है। इस संग्रह के दो भाग हैं। प्रथम भाग में सूक्तियाँ हैं और दूसरे भाग में हीरी वाधवानी के पूर्व प्रकाशित सूक्ति-संग्रहों पर की गई विभिन्न विद्वानों की समीक्षा को रखा गया। पुस्तक के अन्त में प्रकाशक का महत्त्वपूर्ण वक्तव्य है। प्रकाशक सूक्तियों को सिद्ध-सूत्र कहते हुए लिखते हैं -
"सूक्तियाँ अर्थात ऐसे सिद्ध सूत्र जो जीवन को जीने और सफल बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह कल्पना के आधार पर रची/कही कविता या कहानी से बिलकुल भिन्न जीवन के अनुभवों से प्राप्त ज्ञान का पिटारा होते हैं, जो बहुत ही मुश्किल से प्राप्त होते हैं।" (पृ. - 239 )

रविवार, अप्रैल 19, 2020

रिश्तों के सच को दिखाती कहानियों का संग्रह

कहानी-संग्रह - रिश्तों का एहसास
लेखिका - सुरेखा शर्मा
प्रकाशन - समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद
कीमत - ₹150/-
पृष्ठ - 100
समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद से 2011 में प्रकाशित कहानी-संग्रह "रिश्तों का अहसास" की लेखिका हैं, 'सुरेखा शर्मा'। नाम के अनुरूप इस संग्रह की कहानियाँ समाज में व्याप्त रिश्तों को लेकर रची गई हैं। वृद्ध माता-पिता के प्रति व्यवहार, सास-बहू और पति-पत्नी के संबन्ध प्रमुखता से बयान हुए हैं। खून के रिश्तों के अतिरिक्त मानवता के नातों का भी बयान है। रिश्तों का कुरूप और सुंदर पक्ष, दोनों को लेखिका ने बड़ी खूबसूरती से बयान किया है। 

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...