एक तरफ भारत विकसित देशों की कतार में खड़ा होने को आतुर है, तो दूसरी तरफ भारत के लोग खुद को पिछड़ा साबित करने की होड़ में लगे हुए हैं | राजस्थान के गुर्जरों और गुजरात के पटेलों के बाद अब हरियाणा के जाटों ने इस श्रृंखला में अपना नाम लिखवा दिया है | भारत में किसी भी मांग के लिए जब प्रदर्शन होता है तो सरकारी सम्पत्ति को जलाना, तोड़-फोड़ करना आम बात है, ऐसे में हर प्रदर्शन के दौरान देश को करोड़ों की चपत लग जाती है | इस बार हरियाणा में वहशियत का जो नंगा नाच हुआ, वह तो शर्मनाक है | भीड़ पर किसी का नियन्त्रण नहीं होता, आंदोलनकर्ताओं की मंशा भले ही ऐसी न हो, लेकिन भीड़ में शामिल शरारती तत्व अक्सर मौके का फायदा उठा जाते हैं, लेकिन ऐसा तभी संभव है जब आन्दोलन होता है | सोचने की बात तो यह है कि आजाद देश में आखिर ऐसी नौबत क्यों आती है कि लोगों को सडकों पर उतरना पड़ता है ? यहाँ तक आरक्षण की बात है, यह विचारणीय है कि क्यों लोग खुद को पिछड़ा कहलवाने के लिए हिंसक हो रहे हैं ? आरक्षण की बैसाखियाँ आखिर कब तक जरूरी हैं ?
BE PROUD TO BE AN INDIAN
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बुधवार, मार्च 30, 2016
मंगलवार, जनवरी 15, 2013
बुधवार, मई 30, 2012
शुक्रवार, जनवरी 13, 2012
भाईचारे को बढ़ाने वाला त्योहार है लोहडी़
मंगलवार, सितंबर 27, 2011
लोकतंत्र को समझने में नाकाम भारतीय जनमानस
इस बात में संदेह नहीं है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है, लेकिन इस बात में संदेह होगा कि भारत एक सफल लोकतान्त्रिक देश है. भारतीय जनमानस अभी भी लोकतंत्र को समझने में नाकाम है. लोकतंत्र लोगों का राज है लेकिन भारतीय जनमानस अभी भी राजसी व्यवहार को अहमियत देता है, यही कारण है कि यहाँ के नेता सेवक न होकर शासक होते हैं और जनता राजा के रहमो-कर्म पर जीने वाली प्रजा होती है.
रविवार, जुलाई 17, 2011
खिलाडी भारत रत्न के हकदार क्यों नहीं ?
भारत रत्न का मिलना हर भारतीय के लिए सम्मान की बात होगा और ऐसा कौन है जो इसे लेना न चाहेगा लेकिन यह पाने के लिए विशेष योग्यता का होना जरूरी है . भारत में सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान मिलना चाहिए ऐसा दावा बहुत से लोग कर रहे हैं लेकिन सचिन का खेल जगत से जुडा होना उनके भारत रत्न पाने में रुकावट पैदा कर रहा है .भारत रत्न जिन विषयों के लिए दिया जा सकता है उन में खेल शामिल नहीं है . सचिन को भारत रत्न मिलेगा या नही यह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि इस समस्या का हल होना है कि किसी खिलाडी को यह सम्मान मिल सकता है या नहीं . इसलिए अब विचारणीय विषय यही है कि क्या खेल को भारत रत्न की परिधि से बाहर रखा जाना चाहिए . खेल मंत्रालय इसे भारत रत्न की परिधि में लेने का निवेदन कर चुका है . वैसे देखा जाए तो खेल को बाहर रखने की बात समझ नहीं आती . भारत रत्न देने का आधार या तो देश होना चाहिए या फिर कोई भी व्यक्तिगत उपलब्धि . यदि इसका क्षेत्र देश रखा जाए तो सिर्फ उन्हीं लोगों को भारत रत्न दिया जाना चाहिए जिन्होंने देश हेतु विशेष योगदान दिया हो .ऐसे में भारत रत्न बहुत कम लोगों को मिलेगा . इस आधार पर सिर्फ वैज्ञानिक या देश पर शहीद होने वाले लोग ही इसके हकदार होंगे . कोई भी साहित्यकार , संगीतकार ,फिल्मकार या खिलाडी इसका दावेदार नहीं होगा और यदि इसका आधार व्यक्तिगत उपलब्धि हो तो यह सभी क्षेत्रों की व्यक्तिगत उपलब्धियों पर मिलना चाहिए .अगर संगीत से जुडी कोई हस्ती संगीत में किए प्रदर्शन के आधार पर भारत रत्न पा सकती है तो सचिन क्रिकेट में किए प्रदर्शन के आधार पर भारत रत्न क्यों नहीं पा सकते.
अब समय है कि भारत रत्न देने के नियमों में परिवर्तन हो . इसमें न सिर्फ खेल को जोड़ा जाए अपितु यह बात जोड़ी जानी चाहिए कि देश हित में सर्वश्रेष्ट कार्य करने वाले व्यक्ति और सभी क्षेत्रों में अपने कार्यों के द्वारा विश्व पटल पर भारत का नाम चमकाने वाले व्यक्ति भारत रत्न पाने के हकदार होंगे . इससे सभी क्षेत्र भारत रत्न की परिधि में आ जाएंगे . भारत का नाम विश्व पटल पर चमकाने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करना देश का कर्तव्य है .
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रविवार, जून 05, 2011
ये कैसा लोकतंत्र है ?
लोकतंत्र का अर्थ क्या है ? यही न कि आपको कहने की , रहने की ,जीने की आज़ादी है .आप शांतिपूर्ण ढंग से अपनी असहमति जता सकते हैं . आप न्याय की अपील कर सकते हैं , आप दोषी की तरफ ऊँगली उठा सकते हैं .आपको कोई बेजा तंग नहीं कर सकता .प्रशासन आपका रक्षक है .
लेकिन क्या महान देश भारत में ऐसा हो रहा है ? चार जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में योगगुरु रामदेव के धरने पर रात के एक बजे पुलिस बल का प्रयोग क्या लोकतान्त्रिक देश को शोभा देता है ? क्या यह इस बात की और इंगित नहीं करता कि कांग्रेस सरकार एक असहनशील सरकार है ? क्या यह इंदिरा गाँधी के आपातकाल की पुनरावृति नहीं ?
हालांकि सरकार का तर्क है कि रामदेव ने सहमती पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे . ऐसे में प्रदर्शन समाप्त होना चाहिए था . अगर इस बात को सच मान भी लिया जाए तो भी सरकार की बर्बरता पूर्ण कार्यवाही को उचित नहीं ठहराया जा सकता . सरकार को पत्र मीडिया के जरिये जनता के सामने लाना चाहिए था . दूध का दूध और पानी का पानी हो जाने का इंतजार करना चाहिए था .
सरकार की इस कार्यवाई को तब तो सही ठहराया जा सकता था ,जब प्रदर्शनकारी कोई हिंसक गतिविधि कर रहे होते .यह आन्दोलन तो शांतिपूर्ण तरीके चल रहा था और फिर जिस समय पुलिस बल का प्रयोग किया गया उस समय आंदोलनकारी सो रहे थे . सोये हुए लोगों पर तो युद्ध में भी बार नहीं किया जाता . निहत्थों पर बार कायरता की निशानी है और कांग्रेस सरकार ने ऐसा करके लोकतंत्र को शर्मसार किया है . अगर केंद्र सरकार को ताकत दिखाने का इतना ही शौक है तो उसे आंतकवादी संगठनों के खिलाफ ताकत दिखाकर लोकतंत्र की रक्षा करनी चाहिए . देश की संसद पर हमला करने वाले आंतकवादी तो सरकारी मेहमान बने बैठे हैं और सरकार उनको कुचल रही है जो देश से भ्रष्टाचार मिटाने की बात करते हैं , जो काले धन को देश में लाने की बात करते हैं
केंद्र सरकार के इस निंदनीय कृत्य की भर्त्सना करना देश के नागरिकों का कर्तव्य बनता है . यदि इस समय ऐसा नहीं किया गया तो देश में लोकतंत्र की हत्या संभव है .
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गुरुवार, फ़रवरी 10, 2011
कितना सार्थक है वैलेंटाइन डे
14 फरवरी किसी के लिए प्यार का दिवस है तो किसी के लिए विरोध का .युवा दिलों को इसका बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है , लेकिन भारतीय संस्कृति के पक्षधर इसके कट्टर विरोधी हैं . यह दिन मनाया जाना चाहिए या नहीं , इस पर मतभेद होंगे ही क्योंकि पीढ़ियों का अन्तराल सोच में अंतर पैदा करता है . युवा पीढ़ी पाश्चात्य रंग में रंगती जा रही है . पाश्चात्य संस्कृति उसे बेहतर नजर आती है . यही कारण है कि वैलेंटाइन डे का विरोध होता है . वैसे भारतीय समाज सहनशील समाज है . अनेक संस्कृतियों को यह अपने में समेटे हुए है , इसको को भी स्वीकार किया जा रहा है , विरोध है तो सिर्फ कुरूप पक्ष का .
अगर वैलेंटाइन डे प्यार का दिवस है तो किसी को इसका विरोध नहीं करना चाहिए ,लेकिन समस्या तो यह है कि आज का प्यार , प्यार कम वासना अधिक है .कालेज के बच्चों को छोडो स्कूलों के नासमझ , नाबालिग बच्चों को भी यह बीमारी लगी हुई है . बीमारी शब्द इसलिए कि इस स्तर पर प्यार की कोई समझ नहीं होती और महज़ शारीरिक आकर्षण ही प्यार का आधार होता है . प्यार वासना न था , न है ,न होगा . भारतीय संस्कृति में प्यार इबादत है , लेकिन पाश्चात्य रंग में रंगी फिल्मों में यह कमीना हो गया है और युवा पीढ़ी जो फिल्मों से प्रभावित है इसे इसी रूप में स्वीकार कर रही है . वैलेंटाइन डे आवारागर्दी करने का सर्टिफिकेट मात्र है इसीलिए इसका विरोध है .
प्यार तो जीवन का आधार है .माना कि कुछ लोग प्यार को प्यार भी मानते हैं फिर भी इसके लिए एक दिन निर्धारित करना कोई प्रासंगिक बात नहीं दिखती . प्यार करना शुरू आप किसी खास दिन से तो नहीं करते . वास्तव में प्यार किया ही कब जाता है , प्यार तो होता है और होने का दिन निर्धारित नहीं होता . यह वैलेंटाइन डे कि परम्परा तो किशोरों को भटका रही है . करियर बनाने कि उम्र में ध्यान भटकाने के लिए ऐसे दिवस सहायक सिद्ध होते हैं इसलिए इनसे परहेज़ ही बेहतर है .
भारतीय समाज में रहते हुए हमें भारत की परिवारवादी परम्परा पर विश्वास करना चाहिए . शादी परिवार का आधार है . शादी औपचारिक भी हो सकती है और यह प्रेम विवाह भी , लेकिन प्रेम को पवित्र रखना ही होगा . प्रेम फैले यह तो जरूरी है , लेकिन यदि प्रेम के नाम पर विद्रूपता फैले तो इसका विरोध होना ही चाहिए .
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मंगलवार, जनवरी 25, 2011
62 वाँ गणतन्त्र दिवस
देशवासियों को 62 वें गणतन्त्र की हार्दिक बधाई | 61 गणतन्त्र मनाए जा चुके हैं | 62 वाँ मनाए जाने की तैयारी है और कुछ समय बाद यह मनाया जा चुका होगा, लेकिन विचारणीय विषय यही है कि क्या इतना काफी है ? क्या गणतन्त्र से अभिप्राय दिल्ली में परेड मात्र है ? हर कोई इसका जवाब नहीं देगा, लेकिन हालात कुछ और बयाँ करते हैं | सरकारों पर सरकारें बदलती हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात | विपक्ष में आते ही सबको बुराइयाँ नजर आती हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद सब बुराइयाँ दिखनी बंद हो जाती हैं | इस बार कुछ परिवर्तन होगा, ऐसा नहीं है, परन्तु उम्मीद पर दुनिया कायम है | काश ! अच्छा हो - ये सभी सोच रहे हैं | देशवासी देश के कर्णधारों की तरफ बड़ी उम्मीद से ताक रहे हैं | वे कब उम्मीदों पर खरे उतरेंगे यह भविष्य के गर्भ में है |
आम आदमी को जीने के अधिकार मिलें, उसके मौलिक अधिकारों की रक्षा हो, सुरक्षा और सुविधाएँ समान स्तर पर मिलें, नौकरी में अवसर की समानता प्रदान की जाए, सबको आगे बढने का मौका मिले, ये कुछ ऐसी मांगें हैं जो हर कोई मांग रहा है और ये कोई खैरात भी नहीं है अपितु देश के नागरिक होने के नाते हमारा हक भी है | हमारे पूर्वजों ने इन्हीं हकों को पाने के लिए बलिदान दिए थे | देश के कर्णधारों को ये हक देशवासियों को मुहैया करवाने ही चाहिए |
ये तो रही सरकार की जिम्मेदारी | आम जनता की भी कुछ जिम्मेदारियां हैं | उन्हें भी अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए | अकेले हक मांगने से देश नहीं चलता | कर्त्तव्य भी जरूरी हैं | छोटी-सी बात होते ही जब हम देश की सम्पत्ति को नष्ट करने पर उतारू हो जाते है, तब देश कैसे बचेगा | देश हमारा घर है ये बात समझनी होगी |
आओ इस 62 वें गणतन्त्र पर हम सब देश हित का प्रण लें | देशवासी देश के बारे में सोचें और देश के कर्णधार देशवासियों के बारे में | देश हमसे है और हम देश से हैं - यही सोचकर जब हम फैसले लेंगे तो निस्संदेह देश का भला होगा |
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मंगलवार, जनवरी 18, 2011
आओ प्रयास करें
मुझे गर्व है इस बात के लिए कि मैं भारतीय हूँ मुझे यह भी स्वीकार करते हुए शर्म नहीं आती कि भारत , जो प्राचीन काल में समृद्ध संस्कृति का स्वामी था , वर्तमान में अनेक बुराइयों से ग्रस्त हो चुका है . ये बुराइयाँ सामाजिक , राजनैतिक और धार्मिक सभी स्तरों पर हैं . एक सच्चा नागरिक होने के नाते बुराइयों का वर्णन करना , इनके निराकरण के बारे में सोचना और इन्हें दूर करने का प्रयास करना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ क्योंकि सुंदर और समृद्ध भारत को देखना हर भारतीय की तरह मेरा भी सपना है . यूं तो कहा जाता है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता , लेकिन ये भी सच है कि एक-एक से काफिला बनता है. इसी दृष्टिकोण से मैं प्रयासरत हूँ . निश्चित रूप से आप भी होंगे . आओ मिलकर प्रयास करें . सिर्फ आलोचना के लिए आलोचना न करके सुधार के लिए आलोचना करें . विरोध योग्य हर बात का विरोध करें .शोषितों , दीन-दुखियों के लिए आवाज़ बुलंद करें और सुंदर-समृद्ध भारत की नींव रखें .
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मंगलवार, जनवरी 11, 2011
गठन नए राज्यों का

कहने को हम भारतीय हैं, लेकिन वास्तव में भारतीय होने की अपेक्षा हम हरियाणवी, पंजाबी, गुजराती, मराठी ज्यादा हैं | क्षेत्रवाद से हमारा प्रेम इतना ज्यादा है कि देश पीछे छूट जाता है | महाराष्ट्र का मराठावाद सर्वविदित ही है | नए-नए राज्यों का गठन और इनके क्षेत्र को लेकर विवाद इसी का प्रतीक है | अक्सर राजनेताओं पर आरोप लगाया जाता है कि वे वोट बैंक के लिए ऐसे मुद्दे उठाते हैं, लेकिन असली दोषी जनता है जो इन मुद्दों को उठने का मौका देती है |
यहाँ तक नए राज्यों के गठन की बात है, देश में तेलंगाना, विदर्भ, हरित प्रदेश, बुन्देलखण्ड, गोंडवाना, मिथिलांचल, गोरखालैंड जैसे राज्यों की मांग समय-समय पर उठती रही है | छोटे राज्य लाभदायक हैं ऐसा तर्क दिया जाता है | हरियाणा , हिमाचल ,उतरांचल का उदाहरण भी दिया जाता है, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाता क्योंकि प्रत्येक पार्टी के अपने हित हैं | गठित किये गए आयोग भी कमोबेश सत्तारूढ़ दल की उम्मीदों का ध्यान रखतें हैं | परिणामस्वरूप एक तरफ आन्दोलन होते रहते हैं, दूसरी तरफ टरकाउ नीति जारी रहती है |
नए राज्यों का गठन कुछ हद तक जायज है, लेकिन इसकी देखा-देखी जब देश के हर कोने से नए राज्य की मांग उठने लगती है, तब यह अनुचित हो जाता है | देशवासियों को सोचना चाहिए कि नए राज्यों का गठन एक खर्चीला काम है | जब हम घरेलू स्तर पर फालतू खर्च स्वीकार नहीं करते तब देश के स्तर पर इसे जायज कैसे माना जा सकता है ? अत: जब जरूरी हो तभी नए राज्यों का गठन होना चाहिए |
नए राज्यों के गठन में क्षेत्र का निर्धारण सबसे बड़ी समस्या है | तेलंगाना-आंध्रप्रदेश में हैदराबाद किस तरफ हो यह प्रमुख मुद्दा है | कुछ ऐसी ही समस्या हरियाणा बनने के 44 वर्ष बाद भी कायम है | ' चंडीगढ़ हमारा है ' - ये रट दोनों राज्य लगाए हुए हैं | हैदराबाद हमारा है - ऐसी ही रट कल को तेलंगाना और आंध्रप्रदेश लगाएंगे | इसका एकमात्र समाधान ऐसे क्षेत्रों को केन्द्रशासित प्रदेश बनाना ही है, लेकिन केन्द्रशासित बनाते ही इसे दोनों राज्यों से छीनना जरूरी है | चंडीगढ़ के मामले में ऐसा नहीं हुआ | यह हरियाणा और पंजाब दोनों की राजधानी है और अब कोई भी इसे छोड़ने को तैयार नहीं है | चंडीगढ़ किसे मिले यह विवाद का विषय है और इसका समाधान यही है कि चंडीगढ़ दोनों से छीन लिया जाए, यही तरीका हैदराबाद के बारे में अपनाया जाना चाहिए | ऐसा करने में किसी को एतराज नहीं होना चाहिए क्योंकि ये दोनों खूबसूरत शहर रहेंगे तो भारत का हिस्सा ही |
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गुरुवार, दिसंबर 30, 2010
जश्न नव वर्ष का

हर पल नया होता है, फिर पता नहीं क्यों नव वर्ष का ही जश्न क्यों मनाया जाता है ? नहीं, मैं जश्न विरोधी नहीं हूँ | जीवन को नाचते-गाते ही जिया जाना चाहिए, न कि रो-रोकर | हाँ, सिर्फ नए वर्ष का जश्न मुझे न्यायसंगत नहीं लगता | नए वर्ष में दूसरों से भिन्न कुछ भी नहीं | हर नए दिन की तरह यह भी एक सामान्य तरीके से आया नया दिन है | ऐसे में पार्टीबाजी का बहाना ढूँढने की कोई बात नहीं लगती |
अगर बात जश्न की है तो हमारा जीवन ऐसा होना चाहिए कि हम हर पल को आनन्द से जी सकें और इसकी शुरुआत के लिए अगर कोई निश्चित दिन चाहिए तो यह एक जनवरी हो सकता है, लेकिन शर्त ये है कि हमारा संकल्प पूरा वर्ष आनन्द से जीने का होगा |आनन्द ! ख़ुशी से बढकर होता है, इसका ध्यान रहे | आनन्द के लिए दूसरों को दुखी नहीं किया जा सकता, अपितु यह दूसरों की भलाई में छिपा रहता है | हमारे तुच्छ स्वार्थों से तो सिर्फ ख़ुशी मिल सकती है, आनन्द नहीं |
तो चलो आओ वर्ष 2011 के स्वागत में हम आत्ममंथन करते हुए खुद को बदलने के लिए तैयार करें | आनन्द प्राप्ति के लिए प्रयास करें और सही अर्थों में नव वर्ष का जश्न मनाएं |
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शुक्रवार, दिसंबर 24, 2010
भारत का दुर्भाग्य

भ्रष्टाचार भारत का पर्याय बनता जा रहा है . वर्तमान में 2 जी घोटाला सुर्ख़ियों में है | राष्ट्र्मंडल खेलों की बात अभी बहुत पुरानी नहीं हुई है | आखिर ऐसा क्यों होता है ? समय-समय पर नए-नए घोटाले उभर कर सामने आते हैं | देश का पूरा मीडिया कुछ दिन तक नए उभरे घोटाले के पीछे उलझा रहता है, फिर कुछ दिन के बाद हालात ऐसे हो जाते हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं | इस देश में हर्षद मेहता का क्या हुआ ? चारा घोटाले, बोफोर्स घोटाले का क्या हुआ ? कुछ भी नहीं | यही वो कारण है जिसके कारण बार-बार घोटाले होते हैं | देश का प्रत्येक आदमी अपने सामर्थ्य के अनुसार घोटाले करने में जुटा हुआ है | न्याय प्रक्रिया का अत्यंत धीमा होना आग में घी डालता है | नैतिकता का अभाव, देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को न समझना कुछ अन्य कारण हैं |
इसका तत्कालीन समाधान तो विशेष अदालतों का गठन ही दिखता है | दोषियों को यथाशीघ्र और सख्त-से-सख्त सज़ा घोटालों की संख्या को कम कर सकती है, लेकिन इस उपाय को अपनाने में पता नहीं कितना समय लगेगा ? जब तक घोटाले रोकने का कोई उपाय नहीं अपनाया जाता तब तक देश की सम्पत्ति यूं ही धूर्तों के हाथ लगती रहेगी और आम जनता दुखी व त्रस्त रहेगी | दुर्भाग्य से यही भारत का भाग्य बनता जा रहा है |
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