साक्षात्कार
BE PROUD TO BE AN INDIAN
सोमवार, सितंबर 23, 2019
मुझे बोल्ड और बिंदास कहा गया – प्रियंका ओम
मंगलवार, अगस्त 06, 2019
विशाल अनुभव से निकले मोतियों का संग्रह

दोहा-संग्रह - दोहों के दीप
दोहाकार - लखविन्द्र सिंह बाजवा
प्रकाशक - तस्वीर प्रकाशन, कालांवाली
कीमत - 150 /-
पृष्ठ - 102 ( सजिल्द )
हरियाणा पंजाबी साहित्य आकादमी के संत तरन सिंह वहमी पुरस्कार
से सम्मानित और पंजाबी में अनेक खंडकाव्य, महाकाव्य, मुक्तक काव्य और गद्य विधाओं
की 15 पुस्तकों के रचयिता श्री लखविन्द्र सिंह बाजवा का हिंदी की पुस्तक के रूप
में यह पहला प्रयास है और उन्होंने इसके लिए चुना है हिंदी की सर्वोतम विधा दोहे
को | दोहे अपने लघु आकार और मारक क्षमता के लिए जाने जाते हैं | बाजवा जी ने अपने
अनुभव के विशाल भंडार से दोहों के मोती इस संग्रह में पिरोये हैं |
रविवार, जुलाई 14, 2019
नए दौर की ग़ज़लों का संग्रह
ग़ज़ल-संग्रह – मिलो
जब भी हमसे
गज़लकार – डॉ. मेजर
शक्तिराज
प्रकाशक – आयुष
बुक्स, जयपुर
पृष्ठ – 80
कीमत – 150/- (
सजिल्द )
ग़ज़ल का संबंध शुरू में भले ही नारी सौन्दर्य
और प्रेम से रहा हो, लेकिन वर्तमान में ग़ज़लें सभी समसामयिक विषयों पर रची जा रही
हैं | इसी नई परम्परा को निभाया है, डॉ मेजर शक्तिराज ने अपने ग़ज़ल-संग्रह “ मिलो
जब भी हमसे” में | इस संग्रह में 66 ग़ज़लें हैं, जो भाषा, कहन और विषय सभी
दृष्टियों से नए दौर की ग़ज़लें हैं | शायर का ध्यान राजनीति, समाज की समस्यायों,
रिश्ते-नाते, महबूब, प्रकृति आदि पर गया है | वह धर्म के स्वरूप पर भी विचार करता
है और नैतिकता का उपदेश भी देता है |
ग़ज़लकार
होने के नाते उसका मानना है, कि ग़ज़ल कहने के लिए खास फन की जरूरत होती है | इस फन
में भावुकता का भी अंश जरूरी होगा, तभी तो वह लिखता है –
जिसके नयन न हुए सजल
/ किस मुँह से वो कहे ग़ज़ल ( पृ. – 18 )
वह जिंदगी को ही ग़ज़ल मानकर चलने की सलाह
देता है | वह कहता है, कि लक्ष्य की ओर पैर चलते रहने चाहिए | आपकी मुस्कान छीनने
का हक़ किसी में नहीं | उसका दृष्टिकोण आशावादी है –
घोर निराशा की
घटाएँ, बेशक हों आकाश में /
नई सभ्यता के अंकुर
पनपेंगे घोर विनाश में ( पृ. – 19 )
इसी के चलते वह बंजर भूमि पर प्यार की फसल
उगाने की बात कहता है |
आशावादी
होने के साथ-साथ वह समाज के यथार्थ को देखने से भी नहीं चूकता | उसका मानना है, कि
अन्नदाता भूखा है, मजदूर को आटे-दाल की फ़िक्र है, हालांकि उसका यह भी मानना है –
काम करे
तन-मन-बुद्धि से / सदा न वह कंगाल रहा है ( पृ. – 16 )
शायर वर्तमान समाज और वर्तमान हालात को
बड़ी बारीकी से देखता है | उसका मानना है, कि पश्चिम की हवा से तेवर बदल रहे हैं,
हवाओं में जहर घुला हुआ है, मोबाइल के कारण मेल-मिलाप का महत्त्व कम हो गया है,
वृद्धाश्रम बढ़ गए हैं | रिश्ते जंजाल हो गए है और संस्कार फ़ुटबाल | भ्रूण हत्या से
अपराध समाज में हो रहे हैं, लडकियाँ असुरक्षित हैं | आधुनिक दौर भी लड़कों पर ही
केन्द्रित है –
लडकियाँ यहाँ अभी
सुरक्षित नहीं /अभी यहाँ केवल लाल का मौसम है ( पृ. – 50 )
आरक्षण की समस्या है –
बिना योग्यता अफसर
बनते आरक्षण से /
अगड़ों में कुंठा
लाचारी रहती है / ( पृ. – 34 )
भारत में क्रिकेट का बोलबाल है, इसका
प्रभाव भी उनकी ग़ज़लों पर दिखता है –
गुड बालिंग आउट कर
सकती दस के दस /
लेकिन गेम जीतने
खातिर रन जरूरी / ( पृ. – 28 )
वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के
वर्ण्य-विषय पर भी कलम चलाते हैं और कलमकारों को सलाह देते हैं –
खुले रखो तुम कर्ण
नयन / वतन बेहाल जरूर लिखो / ( पृ. – 57 )
वह देश और गाँव का भी चित्रण करता है |
उसका मानना है, कि वतन हमसे सिर्फ दो बूँद पसीने की माँगता है | उसकी नजरों में
गाँव की तस्वीर आदर्शवादी ही है –
बेशक बढ़ती
भूखमरी-बेरोजगारी / हिंसा कभी नहीं पकती इन गाँवों में / ( पृ. – 38 )
लेकिन जो भी गाँव से शहर जाता है, वह वापस
गाँव नहीं जा पाता | वह जमाने की रफ्तार से कदम-से-कदम मिलाकर चलने का उपदेश देता
है | वह योगाभ्यास और प्राणायाम की भी सलाह देता है |
प्रकृति
भी इन ग़ज़लों का विषय बनी है | शायर ने इसका वर्णन आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों
में किया है | वह नदी, बारिश आदि का चित्रण करता है –
सावन आया चला भी
गया, खबर न कानोंकान हुई /
ना रिमझिम सी झड़ी
लगी व ना बरखा घमासान हुई ( पृ. – 46 )
वह प्रकृति के माध्यम से जीवन दर्शन की
बात भी करता है और मौसम का जीवन पर प्रभाव भी दिखाता है | जीवन-दर्शन की
अभिव्यक्ति इस संग्रह के विभिन्न शे’रों में हुई है | उसका मानना है, कि सच बोलने
वाले का सिर नहीं झुकता, मुस्कान बाँटने वाले के पास भरपूर खुशियाँ रहती हैं | खुशियाँ
पाने के लिए छल करने की जरूरत नहीं होती -
तुम्हें भी मिलेंगी
जिंदगी की खुशियाँ
मगर उनके वास्ते न
किसी को छलो तुम ( पृ. – 51 )
वह बच्चों के साथ दोस्ती रखने की सलाह
देता है -
ख़ुश रहना हो जीवन
में / बच्चों के संग यारी रख ( पृ. – 70 )
वह प्यार का हिमायती है, उसे पता है, कि
प्यार के बदले प्यार मिलेगा | प्यार संवेदनाओं से ही परिवार चलता है, वह प्यार मांगता
है, क्योंकि जीवन की खुशियाँ दया, प्रेम, विश्वास में छुपी हैं | वह नफरत का
विरोधी है -
नफरत हिंसा के दम पर
ख़ुशी नहीं ठहरा करती /
जीवन में ख़ुश रहना
है तो करो सभी से प्रीत ( पृ. – 42 )
वह दीन-दुखी, लाचार का अपमान न करने की
बात कहता है -
जब भी तुझसे हो सके
हर मुफलिस की मदद कर
काम क्रोध लोभ मोह औ
अहंकार को दूर कर ( पृ. – 35 )
इज्जत की रोटी कमाने के लिए मेहनत करनी
पड़ती है -
इज्जत की रोटी खाने
को / सबको करना पड़ता हीला ( पृ. – 80 )
वह परमसंतोषी है –
जितना भी आपको
प्राप्त है / उतना ही शायद पर्याप्त है ( पृ. – 53 )
वह आत्ममंथन पर बल देता है –
छिद्र अपनी कश्ती के
ढूँढे नहीं / दोष हम देते रहें तूफानों को ( पृ. – 44 )
वह धर्म के वर्तमान स्वरूप पर भी प्रहार
करता है | उसका मानना है, कि आजकल के संतों के लिए भी महल जरूरी हैं | वह ध्यान का
हिमायती है और धर्म को भीतर खोजने की बात करता है –
जगह-जगह क्यों देवता
पूजो ‘शक्ति’ /
मन के अंदर ढूँढ लें
भगवान को ( पृ. – 44 )
ग़ज़ल
के परम्परागत विषय प्रेम और सौन्दर्य पर भी इन ग़ज़लों में पर्याप्त मात्रा में कहा
गया है | कवि ने इसके लिए राधा-कृष्ण का भी सहारा लिया है | उनका मानना है, कि वो
जवानी क्या जिसकी कोई कहानी नहीं | पहला प्रेम सदा याद रहता है | प्रेम पलों का
वर्णन वे यूं करते हैं –
रोम-रोम हो जाया
करता पुलकित तुझे देखकर /
आलिंगन से ही मिलती
थी, प्रीत लता को खाद / ( पृ. – 60 )
प्रेम में असफलता का चित्रण करते हुए वह
कहते हैं –
कोशिशें करते रहे
हम, पर मंजूरी न मिली /
आशिकी हमको उन्हीं
से, हम उन्हें भाए नहीं / ( पृ. – 30 )
प्रेम में असफलता क्यों मिलती है, इसका भी
वे वर्णन करते हैं –
जो जानम के दिल की
चाह न जान सकें /
यौवन में उनके दिल
ही टूटा करते / ( पृ. – 39 )
प्रेम में सुन्दरता के वर्णन का विशेष
स्थान है, वे सुंदर चाल का वर्णन करते हैं –
खूब अदा से चलते हैं
इठलाकर /
अदा व थिरकती चल का
मौसम है / ( पृ. – 50 )
डॉ.
शक्तिराज अपने कहन में व्यंग्य का भी समावेश करते हैं, उनके अनुसार संसद में कातिल
और हत्यारों को आरक्षण मिलना चाहिए | आमा व्यवहार पर वे लिखते हैं –
पीछे बेशक टाँगें
खींच / सम्मुख गहरी यारी रख / ( पृ. – 25 )
सामान्यत:
ग़ज़ल में अलग-अलग विषयों को कहा जता है,
लेकिन मुसलसल ग़ज़ल एक ही विषय को लेकर लिखी जाती है | होली, बुद्ध, पत्नी, नदी,
क्रोधित मित्र आदि विषयों को लेकर शायर ने मुसलसल ग़ज़लें भी कही हैं | बहर, काफिया,
रदीफ़ में कहीं-कहीं चूक के बावजूद ग़ज़लें रवानी लिये हुए हैं | ग़ज़ल में उर्दू
शब्दावली का प्रयोग तो सहज होता ही है, शायर ने देशज और तत्सम शब्दों को भी इनमें
समाविष्ट किया है | मुहावरों का प्रयोग हुआ है | अलग-अलग आकार की बहरें हैं जिनमें
कुछ बहुत छोटी भी हैं, यथा एक मतला देखिए –
अरसे बाद / आई याद ( पृ. – 56 )
संक्षेप
में, ‘ मिलो जब भी हमसे ’ जीवन को करीब से देखते हुए रचा गया ग़ज़ल-संग्रह है, जो
भाव पक्ष और शिल्प पक्ष से सफल है और साहित्य जगत में अपनी सशक्त उपस्तिथि दर्ज
करवाने को आतुर है |
दिलबागसिंह विर्क
गाँव - मसीतां,
डबवाली, सिरसा
Pin –
125104
Mo. – 9541521947
Email – dilbagvirk23@gmail.com
रविवार, जुलाई 07, 2019
समीक्षाओं और प्रतिनिधि कविताओं का शानदार संकलन
लेखिका – कृष्णलता
यादव
प्रकाशन – सुकीर्ति
प्रकाशन, कैथल
पृष्ठ – 232
कीमत – 350/-
रूप देवगुण बहुआयामी
व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति हैं | साहित्य में उन्होंने कहानी, लघुकथा, कविता, ग़ज़ल,
समीक्षा आदि क्षेत्रों में अपनी लेखनी चलाई है | कृष्णलता यादव ने उनके कवि पक्ष
को अध्ययन के लिए चुना और उनके सोलह कविता-संग्रहों को आधार बनाकर जिस कृति का सृजन
किया है, वह है – “ रूप देवगुण की काव्य-साधना ”| यह कृति न सिर्फ रूप
देवगुण के कविता-संग्रहों का मूल्यांकन करती है, अपितु हर संग्रह में उनकी
प्रतिनिधि रचनाओं को भी प्रस्तुत करती है | प्रतिनिधि रचनाओं पर भी लेखकीय टिप्पणी
है | इस प्रकार लेखिका ने लेखक के साथ-साथ संपादक का दायित्व भी निभाया है |
सोमवार, जून 24, 2019
अध्यात्म और नैतिकता की दृष्टि से जीवन को देखता संग्रह
कवि - ज्ञान प्रकाश पीयूष
प्रकाशन - बोधि प्रकाशन
पृष्ठ - 136
कीमत - 200/- ( सजिल्द )
ईश्वर, सृष्टि और समाज को केंद्र में रखकर लिखी गई 96 कविताओं का संग्रह हैं, " साथी हैं संवाद मेरे " । इन 96 कविताओं में संवाद, माँ, पिता और बेटी शीर्षक के अंतर्गत क्रमश: 5, 10, 6 और 7 कविताएँ हैं, इस प्रकार यह कुल 120 कविताओं का संग्रह है । सामान्यतः कविताएँ मध्यम आकार की हैं, लेकिन कवि ने लघुकविताओं को भी इस संग्रह में पर्याप्त स्थान दिया है ।
मंगलवार, जून 11, 2019
इतिहास और साहित्य का सुमेल
रचयिता - मनजीतकौर मीत
प्रकाशन - अंजुमन प्रकाशन
पृष्ठ - 112
कीमत - 150/- ( पेपरबैक )
भारत ने आज़ादी के लिए लम्बा संघर्ष किया है । आज़ादी अपने साथ दंगे लाई । वे जख़्म तो किसी - न - किसी तरह भर गए, लेकिन भारत की वर्तमान दशा ऐसी नहीं हो पाई, कि इस पर गर्व किया जा सके । महँगाई, भ्रष्टाचार, असुरक्षा आदि अनेक मुद्दे हैं । नेता काले अंग्रेज़ बन गए और जनता पिसती जा रही है । ये बातें हर भावुक इंसान को उद्वेलित करती हैं । लेखिका मनजीतकौर मीत भी इनसे उद्वेलित है । उसने इतिहास सुनाने और कविता कहने का कार्य एक साथ किया है । इस अनोखे प्रयोग को उसने प्रस्तुत किया है, अपनी पुस्तक " आज़ादी के पहले और बाद " में । मूलतः यह कविता-संग्रह ही है, लेकिन यहाँ-यहाँ ज़रूरी लगा, वहाँ पर इतिहास का वर्णन गद्य में भी किया गया है, इस प्रकार यह संग्रह 1757 से आज तक की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को रेखांकित करने वाला दस्तावेज बन गया है ।
रविवार, अप्रैल 21, 2019
कहानीकार मालती मिश्रा की नज़र में कवच
वर्तमान परिवेश के धरातल पर रची गई काल्पनिक सत्य है 'कवच'
मानव का परिपक्व मन समाज की, परिवार की हर छोटी-बड़ी घटना से प्रभावित होता है और एक साहित्यकार तो हर शय में कहानी ढूँढ़ लेता है। आम व्यक्ति जिस बात या घटना को दैनिक प्रक्रिया में होने वाली मात्र एक साधारण घटना मान कर अनदेखा कर देते हैं या बहुत ही सामान्य प्रतिक्रिया देकर अपने मानस-पटल से विस्मृत कर देते हैं, उसी घटना की वेदना या रस को एक साहित्यिक हृदय बेहद संवेदनशीलता से महसूस करता है और फिर उसे जब वह शिल्प सौंदर्य के साथ कलमबद्ध करता है तो वही लोगों के लिए प्रेरक और संदेशप्रद कहानी बन जाती है। एक कहानीकार की कहानी कोरी काल्पनिक होते हुए भी अपने भीतर सच्चाई छिपाए रहती है, वह एक संदेश को लोगों के समक्ष रोचकता के साथ प्रकट करती है और चिंतन को विवश करती है। एक कहानीकार पाठक को मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक दायित्वों के लिए जागरूक भी बनाता है। एक साहित्यकार अपने साहित्य से समाज के उत्थान या पतन दोनों की दिशा सुनिश्चित कर सकता है और साहित्य की विधाओं में कहानी अति प्रभावी होती है। इसमें लोगों को बाँधे रखने के साथ-साथ सकारात्मक या नकारात्मक सोच को जन्म देने की गुणवत्ता होती है। कहानीकार दिलबाग 'विर्क' जी ने अपने संकलन 'कवच' में ऐसी ही इक्कीस संदेशप्रद कहानियों को संकलित किया है, जो वर्तमान समाज का आईना हैं। वर्तमान समाज की हर सकारात्मक, नकारात्मक पहलू पर उनकी लेखनी चली है। उनकी लेखनी से निकला हर शब्द कहानी की आत्मा प्रतीत होता है।
इसका कथानक रिश्तों की कशमकश, बेरोजगारी, रूढ़िवादिता, आधुनिकता की फिसलन, पारिवारिक बंधन की छटपटाहट आदि को अपने भीतर समेटे हुए है। कथोपकथन को पात्रों के अनुकूल रखने का प्रयास किया है। घर-गृहस्थी की चक्की में पिसता आज का युवा घर-परिवार के बंधनों से कुछ देर की मुक्ति हासिल कर मानों स्वयं को खुले आकाश का पंछी समझ लेता है और उसका चंचल मन कल्पनाओं के पंख लगा बंधन मुक्त स्वच्छंद होकर खुले आकाश में उड़ान भरना चाहता है और उसकी इस कल्पना की चिंगारी को हवा देने का काम आजकल सोशल मीडिया के द्वारा बखूबी कर दिया जाता है। कभी-कभी तो व्यक्ति मात्र क्षणिक हँसी-मजाक समझकर की गई बातों की श्रृंखलाओं में ऐसा उलझता जाता है कि उसे ज्ञात ही नहीं होता कि वह कितनी दूर निकल आया और जो वह कर रहा है वह गलत है या सही, किंतु किसी अपने के ऐसी परिस्थिति में होने की आशंका मात्र से सजग हो उठता है, 'खूँटे से बँधे लोग' कहानी के माध्यम से लेखक ने बेहद सजीवता से इसका चित्रण किया है। इसके एक-एक संवाद बेहद सहज आम बोलचाल की भाषा में लिखे गए हैं जो हिन्दी-अंग्रेजी के बंधनों से सर्वथा स्वतंत्र हैं।
कहानी के संवाद पात्रों और घटनाओं को सजीवता प्रदान करते हैं। दृष्टव्य है- कहानी का मुख्य पात्र अपनी सोशल मीडिया की महिला मित्र के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है-
"नहीं-नहीं, हम खूँटे से बँधे लोग क्या सहेली बनाएँगे।"
"खूँटे?"
"घर गृहस्थी खूँटे ही तो हैं।"- "हा हा हा" कहकर रमेश ने अपनी इस गंभीर बात को मजाक का रंग देने की कोशिश की।
"हम्म, कभी-कभी छूट तो मिल ही जाती होगी?" उसने आँख मारती स्माइली के साथ मैसेज भेजा।
"छूट तो कहाँ मिलती है, बस खूँटे पर बँधे थोड़ा उछल-कूद कर लेते हैं।" रमेश ने भी उसी स्माइली के साथ रिप्लाई किया।
पुस्तक की प्रतिनिधि कहानी 'कवच' के माध्यम से लेखक निश्चित समय पर कार्य न कर पाने की स्थिति में बहानों का कवच तैयार करने के प्रयास करता है जो एक मानव मन की सहज प्रक्रिया होती है और मस्तिष्क पर यही दबाव लेकर सो जाने से स्वप्न में वही सब देखता है कि महाभारत के पात्रों ने भी किस प्रकार स्वयं को निर्दोष दिखाने के लिए कवच ओढ़ रखा है। महाभारत के पात्रों के माध्यम से पौराणिकता में पत्रकार रंजन जैसे आधुनिक पात्रों को सम्मिलित करके लेखक ने कहानी को वर्तमान धरातल पर सार्थक कर दिया है। वहीं 'सुहागरात' जैसी कहानी समाज में व्याप्त रिश्तों के विकृत पहलू को नग्न करती है।
कवच की सभी कहानियाँ वर्तमान परिवेश के धरातल पर रची गई काल्पनिक सत्य हैं। सभी कहानियों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि ये पात्र तो हमारे जाने-पहचाने से हैं, शायद ये कहानी हम अक्सर अपने आसपास देखते हैं। जब किसी कहानी को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को उस कहानी का पात्र महसूस करने लगे तो वह कहानी कहानी नहीं जीवन प्रतीत होने लगती है, कुछ ऐसी ही हैं कवच की जीवंत कहानियाँ।
संबल जैसी कहानी जहाँ आजकल लड़कियों का संबल बनाए रखने हेतु और बुराई से सामना करने के लिए माता-पिता को बेटियों के साथ मित्रवत् व्यवहार करने की सीख देती है, वहीं कार्यक्षेत्र में महिला सहकर्मियों को लेकर पुरुष वर्ग द्वारा बनाई जाने वाली बातें तथा किंवदंतियों की भी बड़ी खूबसूरती से 'चर्चा' कहानी में चर्चा की गई है।
जहाँ एक ओर जाति-पाँति, धर्म-गोत्र में उलझे समाज के स्याह पहलू में विलीन बेटियों की व्यथा को दर्शाते हुए माता-पिता के बलिदान के द्वारा इस रूढ़िवादिता के तिमिर से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का प्रयास 'बलिदान' कहानी का मूल विषय है, तो वहीं पुत्र और पति के रिश्तों में पिसते एक ऐसे पुरुष वर्ग की दास्तां सोचने पर विवश कर देती है कि वास्तव में दोष किसका है? साधारण नौकरीपेशा उस पुत्र का जो अपनी माँ को संतुष्ट रखने के प्रयास में पत्नी की दृष्टि में उपेक्षित होता है या उस पति का जो पत्नी के साथ सामंजस्य बिठाने के प्रयास में माँ की उलाहनों का शिकार होता है, और अंततः माँ और पत्नी इन 'दो पाटन के बीच' पिसता हुआ उस अपराध का सजाभोगी बनता है, जो उसने किया ही नहीं।
कार्यालयी परिवेश में साथ काम करते हुए विवाहेतर आकर्षण का सजीव चित्रण 'च्युइंगम' के माध्यम से किया है तो बढ़ती महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने और दिखावे के अधीन होकर खर्चे पर नियंत्रण न करके कर्ज के बोझ में दबकर आत्महत्या करने की घटना का बेहद सजीव चित्रण कहानी 'सुक्खा' के माध्यम से किया गया है।
एकबार यदि किसी के माथे सजायाफ्ता का कलंक लग जाए तो वह कभी पीछा नहीं छोड़ता और व्यक्ति निराशा के दलदल में धँसता जाता, इसका उदाहरण है कहानी 'दलदल'।
कॉलेज के दिनों में दोस्ती के महत्व तथा प्यार के इज़हार न कर पाने की कशमकश का चित्र 'इजहार' में जीवंत हो उठा तथा रोज़गार की आड़ में उसूलों और अनुचित कार्यों के मध्य जद्दोज़हद कहानी 'रोज़गार' में परिलक्षित है।
देश के प्रति उदासीन रवैया दर्शाती कहानी 'गर्लफ्रैंड जैसी कोई चीज' तथा भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लाचारी, गरीबी और बेरोजगारी पर प्रहार है 'कीमत' कहानी।
कलुषित मानसिकता, चारित्रिक पतन और समाज की विद्रूपताओं का आईना है 'प्रदूषण' तो दिल और दिमाग के अन्तर्द्वन्द्व में मानवता और नैतिकता का ह्रास दर्शाती कहानी 'गुनहगार' जो पाठक को झकझोर कर रख देने की क्षमता रखती है।
लेखक ने समाज के हर पहलू को पाठक के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित 152 पृष्ठ की 'कवच' का मूल्य मात्र 150/ है।
मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि 'कवच' की कहानियाँ पाठक को बाँधे रखने में पूर्णतः सक्षम हैं तथा इसके प्रत्येक पात्र को आप अपने आसपास महसूस कर पाएँगे। लेखक अपनी कहानियों के माध्यम से जो संदेश पाठक तक पहुँचाना चाहते हैं उसमें पूर्णतः सफल हुए हैं।
मालती मिश्रा 'मयंती'
समीक्षक, कहानीकार व लेखिका
बी-20, गली नं०- 4, भजनपुरा, दिल्ली-110053
मो. 9891616087
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