BE PROUD TO BE AN INDIAN

रविवार, दिसंबर 11, 2011

परिवार के दुखों की कथा कहता उपन्यास - शुभदा


नशेडी, जुआरी और वेश्यागमन करने वाले व्यक्ति के परिवार के दुखों की कहानी है शरतचंद्र का उपन्यास शुभदा. शुभदा इस उपन्यास की केंद्र बिंदु है. उसका पति हारान बीस रूपये माह पर नौकरी करता है. इतनी आमदनी काफी है, लेकिन वह नशा करता है और कात्यायनी नामक वेश्या पर पैसे लुटाता है. पैसे के लिए गबन करता है, परिणामस्वरूप नौकरी चली जाती है. बाद में वह जुआ खेलता है, भिक्षा मांगता है.

सोमवार, नवंबर 21, 2011

क्या यह चोरी नहीं ?


सुधि पाठकों के सामने दो लघुकथाएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. एक लघुकथा मेरी है, जो अक्षर खबर पत्रिका के लघुकथा अंक में सितम्बर 2005 में प्रकाशित हुई थी, दूसरी लघुकथा श्रीमती इंदु गुप्ता जी की है, जो 21 नवम्बर 2011 को दैनिक जागरण के सांझी अंक में प्रकाशित हुई है। इन दोनों लघुकथाओं को पढकर बताइए क्या यह चोरी का मामला है या नहीं ? यहाँ मैं यह भी बताना चाहूँगा कि अक्षर खबर पत्रिका के जिस अंक में मेरी लघुकथा प्रकाशित हुई थी, उस अंक में इंदु गुप्ता जी की लघुकथाएं भी प्रकाशित हुई थी । 

गुरुवार, नवंबर 10, 2011

हरियाणा में शिक्षा का गिरता स्तर

शिक्षा आज की सबसे बड़ी जरूरत है ।  शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत प्रयास हो रहा है ।  हर बच्चा शिक्षा प्राप्त करे इसके लिए शिक्षा का अधिकार लागू किया गया है । साक्षरता की दर संभवत: बढ़ी भी है, लेकिन शिक्षा को लेकर जो स्थिति अब भी भारत में है वह बहुत संतोषजनक नहीं ।  

बुधवार, नवंबर 02, 2011

कपट, षड्यंत्र, नाजायज संबंधों का महाकाव्य - पथ का पाप

हिंदी के उपन्यासकार डॉ. रांगेय राघव का उपन्यास '' पथ का पाप '' पाप की कहानी है. यह धोखे, षड्यंत्र, अनैतिक सम्बन्धों से भरा पड़ा है. उपन्यास का नायक किशनलाल धोखेबाज़, ठग, मित्रघाती, वेश्यागमन करने वाला और पराई स्त्री पर बुरी नजर रखने वाला है, लेकिन इन तमाम बुराइयों के बावजूद वह खुद को पाक-साफ साबित करने में सफल रहता है. अपने रास्ते में आए हर कांटे को वह बड़ी चतुराई से निकाल देता है.

बुधवार, अक्टूबर 19, 2011

चुनावों में फिर भारी पड़ा जातिवाद का मुद्दा

लोकतंत्र एक अच्छी शासन प्रणाली अवश्य है, लेकिन लोकतंत्र पढ़े-लिखे और समझदार समाज की भी मांग करता है । दुर्भाग्यवश भारत की जनता अभी तक लोकतंत्र को सही अर्थों में समझने लायक नही हुई. ।चुनाव से पहले देश में अलग तरह का माहौल होता है और चुनाव आते ही देशवासी पूर्वाग्रहों में ग्रस्त होने लगते हैं । जाति, धर्म और क्षेत्र को इतनी मजबूती से पकड़ा जाता है कि लोकतंत्र दम तोड़ जाता है । 

शनिवार, अक्टूबर 15, 2011

प्रेम की तलाश में भटकाव की कथा है - चरित्रहीन

बांगला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का प्रसिद्ध उपन्यास चरित्रहीन प्रेम की तलाश में भटकाव की कहानी है. यह भटकाव है हारान की पत्नी किरणमयी का. वह अपने पति से संतुष्ट नहीं क्योंकि उसका कहना है कि पति से उसके सम्बन्ध महज गुरु-शिष्य के हैं, इसीलिए वह हारान का इलाज करने आने वाले डॉक्टर अनंगमोहन से सम्बन्ध बना लेती है, लेकिन बाद में उसे ठुकराकर उपेन्द्र की तरफ झुकती है. उपेन्द्र अपने एकनिष्ठ पत्नी प्रेम के कारण उसके प्रेम निवेदन को ठुकरा देता है, लेकिन वह अपने प्रिय दिवाकर को पढाई के लिए उसके पास इस उम्मीद से छोड़ जाता है कि वह उसका ध्यान रखेगी, लेकिन वह उसी पर डोरे डाल लेती है और उसे भगाकर आराकान ले जाती है, लेकिन उनके सम्बन्ध स्थायी नहीं रह पाते.

मंगलवार, सितंबर 27, 2011

लोकतंत्र को समझने में नाकाम भारतीय जनमानस

इस बात में संदेह नहीं है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है, लेकिन इस बात में संदेह होगा कि भारत एक सफल लोकतान्त्रिक देश है. भारतीय जनमानस अभी भी लोकतंत्र को समझने में नाकाम है. लोकतंत्र लोगों का राज है लेकिन भारतीय जनमानस अभी भी राजसी व्यवहार को अहमियत देता है, यही कारण है कि यहाँ के नेता सेवक न होकर शासक होते हैं और जनता राजा के रहमो-कर्म पर जीने वाली प्रजा होती है.

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