RTE के अंतर्गत पहली से लेकर आठवीं तक के किसी भी विद्यार्थी को फेल नहीं करना , उसका नाम नहीं काटना । पत्र-पत्रिकाओं में यह सूचना इतने जोर-शोर से बताई गई कि बच्चा- बच्चा इससे परिचित है । इसके अतिरिक्त अध्यापक को बच्चों को डांटने तक का अधिकार नहीं है , यह बात भी आज के बच्चे जानते हैं । इन सब बातों के परिणाम भविष्य में हम सबके सामने होंगे, लेकिन फिलहाल जो माहौल बन रहा है उसकी बानगी इन दो बातों से हो सकती है। ये दोनों बातें मेरे दोस्तों के साथ घटी और शत-प्रतिशत सही हैं ।
BE PROUD TO BE AN INDIAN
शुक्रवार, मार्च 09, 2012
शुक्रवार, मार्च 02, 2012
चुप बैठी सरकार
मानें ना कानून को , स्वयंभू हुए आप ।
लेकर सत्ता हाथ में , करे फैसले खाप ||
करे फैसले खाप , रहे तोड़-फोड़ जारी |
हो कोई भी बात , ट्रैक रोंकें नर-नारी ||
लोग हैं परेशान, न दु:ख किसी का जानें |
पशुतुल्य हुए भीड़, कब किसी की ये मानें ||
********
अदालत लगाती रही , बार-बार फटकार |
बनकर भोली-बावली , चुप बैठी सरकार ||
चुप बैठी सरकार , करे पक्षपात भारी |
चहेते बने गेस्ट , मार पात्रों को मारी ||
करें हैं हेर-फेर , बनाई कैसी आदत |
ना करना अन्याय , देख रही है अदालत ||
********
दिलबागसिंह विर्क
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लेकर सत्ता हाथ में , करे फैसले खाप ||
करे फैसले खाप , रहे तोड़-फोड़ जारी |
हो कोई भी बात , ट्रैक रोंकें नर-नारी ||
लोग हैं परेशान, न दु:ख किसी का जानें |
पशुतुल्य हुए भीड़, कब किसी की ये मानें ||
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अदालत लगाती रही , बार-बार फटकार |
बनकर भोली-बावली , चुप बैठी सरकार ||
चुप बैठी सरकार , करे पक्षपात भारी |
चहेते बने गेस्ट , मार पात्रों को मारी ||
करें हैं हेर-फेर , बनाई कैसी आदत |
ना करना अन्याय , देख रही है अदालत ||
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दिलबागसिंह विर्क
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बुधवार, फ़रवरी 22, 2012
अतिथि कब जाओगे ?
जी नहीं, मैं फिल्म की बात नहीं कर रहा अपितु बात कर रहा हूँ उस ड्रामे की जो हरियाणा में चल रहा है । फिल्म में अतिथि आखिर में वापिस चला जाता है लेकिन हरियाणा के अतिथि कोर्ट के बार-बार कहने पर भी नहीं जा रहे । अब ताजा फैसला आया है माननीय सुप्रीम कोर्ट का । सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार अतिथि अध्यापकों के दवाब में काम कर रही है । यह बात ही बताती है कि सरकार की कार्यशैली कैसी है ।
शुक्रवार, जनवरी 13, 2012
भाईचारे को बढ़ाने वाला त्योहार है लोहडी़
रविवार, दिसंबर 11, 2011
परिवार के दुखों की कथा कहता उपन्यास - शुभदा
नशेडी, जुआरी और वेश्यागमन करने वाले व्यक्ति के परिवार के दुखों की कहानी है शरतचंद्र का उपन्यास शुभदा. शुभदा इस उपन्यास की केंद्र बिंदु है. उसका पति हारान बीस रूपये माह पर नौकरी करता है. इतनी आमदनी काफी है, लेकिन वह नशा करता है और कात्यायनी नामक वेश्या पर पैसे लुटाता है. पैसे के लिए गबन करता है, परिणामस्वरूप नौकरी चली जाती है. बाद में वह जुआ खेलता है, भिक्षा मांगता है.
सोमवार, नवंबर 21, 2011
क्या यह चोरी नहीं ?
सुधि पाठकों के सामने दो लघुकथाएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. एक लघुकथा मेरी है, जो अक्षर खबर पत्रिका के लघुकथा अंक में सितम्बर 2005 में प्रकाशित हुई थी, दूसरी लघुकथा श्रीमती इंदु गुप्ता जी की है, जो 21 नवम्बर 2011 को दैनिक जागरण के सांझी अंक में प्रकाशित हुई है। इन दोनों लघुकथाओं को पढकर बताइए क्या यह चोरी का मामला है या नहीं ? यहाँ मैं यह भी बताना चाहूँगा कि अक्षर खबर पत्रिका के जिस अंक में मेरी लघुकथा प्रकाशित हुई थी, उस अंक में इंदु गुप्ता जी की लघुकथाएं भी प्रकाशित हुई थी ।
गुरुवार, नवंबर 10, 2011
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