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शुक्रवार, जून 14, 2013

UGC NET हिंदी की तैयारी हेतु कुछ सुझाव

परीक्षा कोई भी हो हम तब तक सफलता हासिल नहीं कर सकते जब तक पाठ्क्रम और पेपर पैटर्न से परिचित नहीं । मंजिल तक पहुँचने के लिए जिस प्रकार दिशा और रास्ते का ज्ञान जरूरी है ठीक उसी प्रकार परीक्षा में बैठने से पूर्व पाठ्क्रम और पेपर पैटर्न को समझना जरूरी है । 
            यूं तो नेट की परीक्षा में जुड़े सभी परीक्षार्थी इससे परिचित होंगे ही, फिर भी हिंदी की तैयारी कर रहे परीक्षार्थियों को पुन: स्मरण करवाने का प्रयास यहाँ कर रहा हूँ , शायद किसी को इससे लाभ मिल सके । 

गुरुवार, जून 13, 2013

हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन ( भाग - 1 )

इतिहास शब्द अस धातु ( हुआ / होना ) में इति ( ऐसा , पूर्णतय: समाप्ति का प्रतीक ) और ( निश्चयपूर्वक ) अव्यय का योग है ।अत: इसका अर्थ है - ऐसा ही था या ऐसा ही हुआ । इतिहास का संबंध अतीत से है, इसमें वास्तविक या यथार्थ घटनाएं रहती हैं और इसमें वो घटनाएं भी होती हैं जो प्रसिद्ध नहीं । इतिहासकार अपनी रूचि और दृष्टि के मुताबिक़ इनको चुनकर प्रस्तुत करता है । 
                इतिहास को मानव की विकास यात्रा कहा गया है , इस दृष्टिकोण से साहित्येतिहास को मानवकृत भाषा विशेष में रचित साहित्य की विकास यात्रा कहा गया है । साहित्येतिहास लेखन कई क्रमों से होते हुए आगे बढ़ा है । इसको व्यवस्थित सिद्धांत रूप में व्यवहृत करने का श्रेय फ्रेंच विद्वान तेन को जाता है । तेन ने अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में साहित्येतिहास को समझने हेतु तीन तत्व माने हैं - 
  1. जाति 
  2. वातावरण 
  3. क्षण विशेष 
हडसन ने इसकी आलोचना करते हुए दो तत्वों की उपेक्षा करने की बात कही , वे हैं - 
  1. काव्य सृजक का व्यक्तित्व 
  2. उसकी प्रतिभा 
जर्मन के इतिहास विशेषज्ञों ने इसमें तद्युगीन चेतना को जोड़ा और मार्क्सवादियों ने द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद, वर्गसंघर्ष एवं आर्थिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में इतिहास दर्शन की प्रक्रिया को सुस्पष्ट किया । अर्थात फ्रेंच विद्वान् तेन से लेकर रूस के मार्क्सवादियों तक साहित्येतिहास लेखन में कई पक्षों का समावेश हुआ । 

हिंदी साहित्य का इतिहास 


रविवार, जून 09, 2013

सप्तक के कवि

1943 में अज्ञेय जी के नेतृत्व में हिंदी साहित्य के एक नए आन्दोलन का प्रवर्तन हुआ जिसे विभिन्न संज्ञाएँ दी गई - प्रयोगवाद, प्रपद्यवाद , नई कविता । डॉ . गणपतिचन्द्र गुप्त ने इसे मुन्नी, युवती और बहू की संज्ञा दी । ये तीन अलग - अलग रूप भी हैं और एक दूसरे में समाहित भी । प्रयोगवाद के जनक अज्ञेय जी को माना गया लेकिन उन्होंने दूसरे सप्तक की भूमिका में इस शब्द का खंडन किया और पटना रेडियो से 1952 में नई कविता की घोषणा की , लेकिन नई कविता के जनक के रूप में जगदीश गुप्त ( 1954 में ' नई कविता ' पत्रिका संपादन करने के कारण ) को जाना गया । प्रपद्यवाद भी प्रयोगवाद की ही शाखा थी , इसे नकेनवाद ( नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार और नरेश के पहले अक्षर के आधार पर ) भी कहा गया । 
अज्ञेय जी का योगदान सप्तकों के संपादन के कारण भी है , इस प्रयास से उन्होंने हिंदी को अनेक कवि दिए जो अज्ञेय जी के ही शब्दों में राहों के अन्वेषी ( प्रथम सप्तक की भूमिका ) हैं । 


सप्तकों के कवि 

सोमवार, अप्रैल 01, 2013

हजारीप्रसाद द्विवेदी - एक झलक

काफी समय पहले हिंदी नेट हेतु तैयारी की थी , कुछ नोट्स बनाए थे | वर्तमान में जब पात्रता परीक्षा में बदलाव के बाद की स्थिति देखी तो एक बार फिर प्रयास करने की सोची और भगवान की कृपा से सफलता मिली । इंटरनेट ने भी काफी मदद की  । क्योंकि इस परीक्षा में पुस्तकों और लेखकों का नाम और उनका क्रम ज्यादातर पूछा जाता है , उस दृष्टिकोण से ही मैंने इन नोट्स को रूप दिया है । हालांकि इनकी प्रामाणिकता का कोई दावा मैं नहीं करता और आप सबसे निवेदन है कि अगर कोई गलती दिखे तो तर्क सहित टिप्पणी जरूर करें ताकि इसे प्रामाणिक और परीक्षोपयोगी बनाया जा सके ।    

हजारीप्रसाद द्विवेदी

जन्म - 19 अगस्त 1907,  बलिया जिले का आरत दूबे का छपरा
पिता - अनमोल दूबे ( संस्कृत के पंड़ित )
माता - ज्योति ( कली ब्रह्मनौली के विख्यात पंड़ित देवनारायण की पुत्री )
बचपन का नाम - बैजनाथ
विवाह - भगवती देवी से 1927 ई. में
मृत्यु - 19 मई 1979, दिल्ली


मंगलवार, जनवरी 15, 2013

आधुनिकता की सबसे बड़ी हार

फरीदाबाद के रेलवे स्टेशन पर लगभग दस घंटे रुकना पड़ा । कारण एक तो पत्नी का साक्षात्कार जल्दी समाप्त हो गया था दूसरा पंजाब मेल दो घंटे लेट थी । इतनी लंबी अवधि का इंतजार सामान्यतय नीरसता भरा रहता लेकिन मेरे लिए यह रोमांचक अनुभव लेकर आया ।

शनिवार, जनवरी 05, 2013

बेअकल लड़कियाँ

शीर्ष देखकर चौंक गए क्या ? बात तो चौंकने की ही है मगर है सच । अजी अभी से तेवर गर्म हो गए, पहले मेरी बात तो सुनिए । माना आज की लड़कियाँ सफलता के हर  शिखर को छू रहीं हैं मगर इससे उन्हें विदुषी होने का प्रमाण पत्र नहीं दिया जा सकता । आप फिर लाल पीले हो गए ।

गुरुवार, अक्टूबर 04, 2012

हो न हो - सुधीर मोर्य का प्रेम काव्य

कविता संग्रह - हो न हो 
कवि - सुधीर मौर्य सुधीर 
प्रकाशक - मांडवी प्रकाशन, गाजियाबाद 
पृष्ठ  -  128
मूल्य - 100 रु 
हो न हो - युवा कवि सुधीर मोर्य सुधीर का तीसरा काव्य संग्रह है । यह उनकी पांचवीं पुस्तक है । कवि के अनुसार वे गुप्त, पन्त, निराला और दिनकर जी से प्रभावित हैं । उनके खुद के अनुसार इस संग्रह की रचनाएं उनके पहले दो संग्रहों की रचनाओं से बेहतर हैं ।
                  हो न हो वास्तव में पठनीय काव्य संग्रह है जिसमें मुक्त छंद कविता, तुकान्तक कविता और गीत हैं । पहली नजर में यह प्रेम काव्य है जिसमें प्रेमिका की खूबसूरती का निरूपण है, प्रेमिका की याद है, प्रेमिका की बेवफाई है अर्थात संयोग वियोग दोनों में कवि ने कविता लिखी है । गरीबी और जाति प्रेम में बाधक है । कविताओं में इस स्थिति का वर्णन करके कवि समाज का कुरूप चेहरा दिखाता है ।

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