इस बात में संदेह नहीं है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है, लेकिन इस बात में संदेह होगा कि भारत एक सफल लोकतान्त्रिक देश है. भारतीय जनमानस अभी भी लोकतंत्र को समझने में नाकाम है. लोकतंत्र लोगों का राज है लेकिन भारतीय जनमानस अभी भी राजसी व्यवहार को अहमियत देता है, यही कारण है कि यहाँ के नेता सेवक न होकर शासक होते हैं और जनता राजा के रहमो-कर्म पर जीने वाली प्रजा होती है.
BE PROUD TO BE AN INDIAN
मंगलवार, सितंबर 27, 2011
मंगलवार, सितंबर 13, 2011
सोमवार, सितंबर 05, 2011
दोषी सिर्फ गुरु नहीं
आज अध्यापक दिवस है ।अध्यापक के सम्मान का दिवस है । कुछ पुरस्कार भी वितरित होंगे लेकिन अध्यापक का आज सम्मान होता होगा , इसमें सन्देह है । निस्सन्देह अध्यापक वर्ग काफी हद तक खुद दोषी है और अध्यापक का पतन आज ही शुरु हुआ हो ऐसा नहीं है ।अध्यापक ने तो उसी दिन अपनी गुरुता खो दी थी जिस दिन उसने एक शिष्य की भलाई की खातिर उस दूसरे शिष्य का अंगूठा मांग लिया था , जिसको उसने शिक्षा दी ही नहीं थी । और हैरानी इस बात की है कि वही गुरु हमारा आदर्श है और उसके नाम का अवार्ड श्रेष्ट गुरु को दिया जाता है । गुरु ने तो गुरुता महाभारत काल में खो दी थी लेकिन शिष्य की शिष्यता उस दौर में बरकरार थी ।
गुरुवार, अगस्त 18, 2011
गृहदाह : एक मार्मिक उपन्यास
गत दिनों सुप्रसिद्ध बांगला उपन्यासकार शरतचंद्र का उपन्यास गृहदाह पढ़ा , सोचा इसे ब्लॉग पर साँझा कर लूं
गृहदाह उलझे हुए सम्बन्धों की कहानी है .ब्रह्म समाज और हिन्दू समाज का भी मुद्दा है . ब्रह्म समाज के लोगों को हिन्दू अच्छा नहीं मानते - उपन्यास की नायिका बार-बार ऐसा कहती-पूछती है ,लेकिन हिन्दू पात्रों ने कहीं भी असहिष्णुता नहीं दिखाई . हिन्दू युवा ब्राह्म लडकी से प्रेम करते हैं , अन्य पात्र उन्हें अपने से अलग तो मानते हैं ,लेकिन घृणा कोई नहीं करता . उपन्यास के अंत में जब रामबाबू अचला को वेश्या समझकर उसे असहाय अवस्था में छोड़ जाते हैं तब महिम हिन्दू धर्म पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहता है -'' पर इस आचार-परायण ब्राह्मण का यह धर्म कौन-सा है, जो एक मामूली-सी लडकी के धोखे से तुरंत धूल में मिल गया ? जो धर्म अत्याचारी की ठोकर से आप अपने को और पराए को नहीं बचा सकता ,बल्कि मृत्यु को उसी को बचाने के लिए प्रतिपल अपनी शक्ति को तैयार रखना पड़ता है - वह धर्म आखिर कैसा धर्म है , और मनुष्य जीवन में उसकी उपयोगिता क्या है - जिस धर्म ने स्नेह की मर्यादा नहीं रखने दी , एक असहाय नारी को मौत के मुंह में छोड़कर चले जाने में जरा भी हिचक नहीं होने दी ,चोट खाकर जिस धर्म ने इतने बड़े स्नेहशील बूढ़े को भी प्रतिहिंसा से ऐसा निर्दयी बना दिया - वह कैसा धर्म है ? और जिसने उस धर्म को कबूल किया , वह कौन से सत्य को लेकर चल रहा है ?''
सोमवार, अगस्त 15, 2011
आओ स्वाधीनता दिवस पर प्रण लें
आज राष्ट्र ६५ वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है । गाँव-गाँव, शहर-शहर आयोजन हो रहे हैं, ध्वजारोहण हो रहा है, बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे हैं, शहीदों को नमन किया जा रहा है । यह एक अच्छी बात है, लेकिन यह जज्बा दोपहर ढलते-ढलते दूध में आए उफान की तरह बैठ जाता है । फिर किसी को न देश की याद आती है न शहीदों की । यही कारण है कि भारत आज भी उस मुकाम को नहीं छु पाया जिसकी कल्पना आज़ादी के दीवानों ने की थी । आज़ादी अपने वास्तविक अर्थों से कोसों दूर है ।
आज अधिकारों की बात बहुत की जाती है । लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों, इस हेतु बहुत प्रचार हुआ है । RTI इस दिशा में उठाया गया बेहतरीन कदम है, लेकिन सिर्फ भाषणों को छोड़कर कर्तव्यों की बात कहीं नहीं हो रही । क्या कर्तव्यों के बिना अधिकार पाए जा सकते हैं ? एक का कर्तव्य दूसरे का अधिकार है । कर्तव्य और अधिकार एक सिक्के के दो पहलू हैं और किसी एक को ठुकराकर दूसरे को हासिल नहीं किया जा सकता ।
आज राष्ट्र को कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों की जरूरत है । '' देश ने हमें क्या दिया ?'' यह प्रश्न पूछने की बजाए '' हमने देश को क्या दिया ? '' -यह पूछने की जरूरत है । निस्संदेह स्वाधीनता दिवस एक बड़ा पर्व है और इस बड़े पर्व पर यह प्रण लेने की जरूरत है कि दूसरों को कुछ कहने से पहले, दूसरों से कुछ अपेक्षा करने से पहले हम खुद को सुधारेंगे । अगर हम खुद को सुधार पाए तो राष्ट्र के हालत भी अवश्य सुधरेंगे क्योंकि राष्ट्र वैसा ही है जैसे हम हैं ।
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दिलबागसिंह विर्क
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रविवार, जुलाई 17, 2011
खिलाडी भारत रत्न के हकदार क्यों नहीं ?
भारत रत्न का मिलना हर भारतीय के लिए सम्मान की बात होगा और ऐसा कौन है जो इसे लेना न चाहेगा लेकिन यह पाने के लिए विशेष योग्यता का होना जरूरी है . भारत में सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान मिलना चाहिए ऐसा दावा बहुत से लोग कर रहे हैं लेकिन सचिन का खेल जगत से जुडा होना उनके भारत रत्न पाने में रुकावट पैदा कर रहा है .भारत रत्न जिन विषयों के लिए दिया जा सकता है उन में खेल शामिल नहीं है . सचिन को भारत रत्न मिलेगा या नही यह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि इस समस्या का हल होना है कि किसी खिलाडी को यह सम्मान मिल सकता है या नहीं . इसलिए अब विचारणीय विषय यही है कि क्या खेल को भारत रत्न की परिधि से बाहर रखा जाना चाहिए . खेल मंत्रालय इसे भारत रत्न की परिधि में लेने का निवेदन कर चुका है . वैसे देखा जाए तो खेल को बाहर रखने की बात समझ नहीं आती . भारत रत्न देने का आधार या तो देश होना चाहिए या फिर कोई भी व्यक्तिगत उपलब्धि . यदि इसका क्षेत्र देश रखा जाए तो सिर्फ उन्हीं लोगों को भारत रत्न दिया जाना चाहिए जिन्होंने देश हेतु विशेष योगदान दिया हो .ऐसे में भारत रत्न बहुत कम लोगों को मिलेगा . इस आधार पर सिर्फ वैज्ञानिक या देश पर शहीद होने वाले लोग ही इसके हकदार होंगे . कोई भी साहित्यकार , संगीतकार ,फिल्मकार या खिलाडी इसका दावेदार नहीं होगा और यदि इसका आधार व्यक्तिगत उपलब्धि हो तो यह सभी क्षेत्रों की व्यक्तिगत उपलब्धियों पर मिलना चाहिए .अगर संगीत से जुडी कोई हस्ती संगीत में किए प्रदर्शन के आधार पर भारत रत्न पा सकती है तो सचिन क्रिकेट में किए प्रदर्शन के आधार पर भारत रत्न क्यों नहीं पा सकते.
अब समय है कि भारत रत्न देने के नियमों में परिवर्तन हो . इसमें न सिर्फ खेल को जोड़ा जाए अपितु यह बात जोड़ी जानी चाहिए कि देश हित में सर्वश्रेष्ट कार्य करने वाले व्यक्ति और सभी क्षेत्रों में अपने कार्यों के द्वारा विश्व पटल पर भारत का नाम चमकाने वाले व्यक्ति भारत रत्न पाने के हकदार होंगे . इससे सभी क्षेत्र भारत रत्न की परिधि में आ जाएंगे . भारत का नाम विश्व पटल पर चमकाने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करना देश का कर्तव्य है .
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रविवार, जून 05, 2011
ये कैसा लोकतंत्र है ?
लोकतंत्र का अर्थ क्या है ? यही न कि आपको कहने की , रहने की ,जीने की आज़ादी है .आप शांतिपूर्ण ढंग से अपनी असहमति जता सकते हैं . आप न्याय की अपील कर सकते हैं , आप दोषी की तरफ ऊँगली उठा सकते हैं .आपको कोई बेजा तंग नहीं कर सकता .प्रशासन आपका रक्षक है .
लेकिन क्या महान देश भारत में ऐसा हो रहा है ? चार जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में योगगुरु रामदेव के धरने पर रात के एक बजे पुलिस बल का प्रयोग क्या लोकतान्त्रिक देश को शोभा देता है ? क्या यह इस बात की और इंगित नहीं करता कि कांग्रेस सरकार एक असहनशील सरकार है ? क्या यह इंदिरा गाँधी के आपातकाल की पुनरावृति नहीं ?
हालांकि सरकार का तर्क है कि रामदेव ने सहमती पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे . ऐसे में प्रदर्शन समाप्त होना चाहिए था . अगर इस बात को सच मान भी लिया जाए तो भी सरकार की बर्बरता पूर्ण कार्यवाही को उचित नहीं ठहराया जा सकता . सरकार को पत्र मीडिया के जरिये जनता के सामने लाना चाहिए था . दूध का दूध और पानी का पानी हो जाने का इंतजार करना चाहिए था .
सरकार की इस कार्यवाई को तब तो सही ठहराया जा सकता था ,जब प्रदर्शनकारी कोई हिंसक गतिविधि कर रहे होते .यह आन्दोलन तो शांतिपूर्ण तरीके चल रहा था और फिर जिस समय पुलिस बल का प्रयोग किया गया उस समय आंदोलनकारी सो रहे थे . सोये हुए लोगों पर तो युद्ध में भी बार नहीं किया जाता . निहत्थों पर बार कायरता की निशानी है और कांग्रेस सरकार ने ऐसा करके लोकतंत्र को शर्मसार किया है . अगर केंद्र सरकार को ताकत दिखाने का इतना ही शौक है तो उसे आंतकवादी संगठनों के खिलाफ ताकत दिखाकर लोकतंत्र की रक्षा करनी चाहिए . देश की संसद पर हमला करने वाले आंतकवादी तो सरकारी मेहमान बने बैठे हैं और सरकार उनको कुचल रही है जो देश से भ्रष्टाचार मिटाने की बात करते हैं , जो काले धन को देश में लाने की बात करते हैं
केंद्र सरकार के इस निंदनीय कृत्य की भर्त्सना करना देश के नागरिकों का कर्तव्य बनता है . यदि इस समय ऐसा नहीं किया गया तो देश में लोकतंत्र की हत्या संभव है .
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