जी नहीं, मैं फिल्म की बात नहीं कर रहा अपितु बात कर रहा हूँ उस ड्रामे की जो हरियाणा में चल रहा है । फिल्म में अतिथि आखिर में वापिस चला जाता है लेकिन हरियाणा के अतिथि कोर्ट के बार-बार कहने पर भी नहीं जा रहे । अब ताजा फैसला आया है माननीय सुप्रीम कोर्ट का । सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार अतिथि अध्यापकों के दवाब में काम कर रही है । यह बात ही बताती है कि सरकार की कार्यशैली कैसी है ।
BE PROUD TO BE AN INDIAN
बुधवार, फ़रवरी 22, 2012
शुक्रवार, जनवरी 13, 2012
भाईचारे को बढ़ाने वाला त्योहार है लोहडी़
रविवार, दिसंबर 11, 2011
परिवार के दुखों की कथा कहता उपन्यास - शुभदा
नशेडी, जुआरी और वेश्यागमन करने वाले व्यक्ति के परिवार के दुखों की कहानी है शरतचंद्र का उपन्यास शुभदा. शुभदा इस उपन्यास की केंद्र बिंदु है. उसका पति हारान बीस रूपये माह पर नौकरी करता है. इतनी आमदनी काफी है, लेकिन वह नशा करता है और कात्यायनी नामक वेश्या पर पैसे लुटाता है. पैसे के लिए गबन करता है, परिणामस्वरूप नौकरी चली जाती है. बाद में वह जुआ खेलता है, भिक्षा मांगता है.
सोमवार, नवंबर 21, 2011
क्या यह चोरी नहीं ?
सुधि पाठकों के सामने दो लघुकथाएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. एक लघुकथा मेरी है, जो अक्षर खबर पत्रिका के लघुकथा अंक में सितम्बर 2005 में प्रकाशित हुई थी, दूसरी लघुकथा श्रीमती इंदु गुप्ता जी की है, जो 21 नवम्बर 2011 को दैनिक जागरण के सांझी अंक में प्रकाशित हुई है। इन दोनों लघुकथाओं को पढकर बताइए क्या यह चोरी का मामला है या नहीं ? यहाँ मैं यह भी बताना चाहूँगा कि अक्षर खबर पत्रिका के जिस अंक में मेरी लघुकथा प्रकाशित हुई थी, उस अंक में इंदु गुप्ता जी की लघुकथाएं भी प्रकाशित हुई थी ।
गुरुवार, नवंबर 10, 2011
बुधवार, नवंबर 02, 2011
कपट, षड्यंत्र, नाजायज संबंधों का महाकाव्य - पथ का पाप
हिंदी के उपन्यासकार डॉ. रांगेय राघव का उपन्यास '' पथ का पाप '' पाप की कहानी है. यह धोखे, षड्यंत्र, अनैतिक सम्बन्धों से भरा पड़ा है. उपन्यास का नायक किशनलाल धोखेबाज़, ठग, मित्रघाती, वेश्यागमन करने वाला और पराई स्त्री पर बुरी नजर रखने वाला है, लेकिन इन तमाम बुराइयों के बावजूद वह खुद को पाक-साफ साबित करने में सफल रहता है. अपने रास्ते में आए हर कांटे को वह बड़ी चतुराई से निकाल देता है.
बुधवार, अक्टूबर 19, 2011
चुनावों में फिर भारी पड़ा जातिवाद का मुद्दा
लोकतंत्र एक अच्छी शासन प्रणाली अवश्य है, लेकिन लोकतंत्र पढ़े-लिखे और समझदार समाज की भी मांग करता है । दुर्भाग्यवश भारत की जनता अभी तक लोकतंत्र को सही अर्थों में समझने लायक नही हुई. ।चुनाव से पहले देश में अलग तरह का माहौल होता है और चुनाव आते ही देशवासी पूर्वाग्रहों में ग्रस्त होने लगते हैं । जाति, धर्म और क्षेत्र को इतनी मजबूती से पकड़ा जाता है कि लोकतंत्र दम तोड़ जाता है ।
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