BE PROUD TO BE AN INDIAN

बुधवार, दिसंबर 07, 2016

आम जन की सोच बदलने का कार्य करता चालीसा

काव्य कृति - दिव्यांग चालीसा
कवि - डॉ. राजकुमार निजात
कीमत - निःशुल्क 
जिनके लिए पहले विकलांग या अपाहिज शब्द का प्रयोग किया जाता था, उनके लिए अब दिव्यांग शब्द को अपनाया गया है । अपने आप में शब्द का कोई महत्त्व नहीं होता । दरअसल समस्या शब्द के अर्थ से नहीं, सोच से होती है । दुर्भाग्यवश हम भारतीय लोग बाहरी रंग-रूप को ज्यादा ही महत्त्व देते हैं । गोरे रंग का मोह भी इसी का एक रूप है । यदि यह कहा जाए कि ज्यादातर लोगों की सोच दिव्यांग या विकलांग है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।

सोमवार, नवंबर 28, 2016

आशा और हौसले से ओत-प्रोत कविताओं का संग्रह

कविता-संग्रह - हौसलों की उड़ान 
कवयित्री - नीतू सिंह राय 
प्रकाशक - हिंदी साहित्य सदन 
कीमत - 250 / -
पृष्ठ - 128 ( पेपरबैक )
सुख-दुःख जीवन-रूपी सिक्के के दो पहलू हैं और हर व्यक्ति अपने जीवन में इनसे रू-ब-रू होता है | कब सुख आते हैं, कब दुःख या कहें की ये आपस में गड़मड़ रहते हैं | सुख-दुःख के प्रति हर व्यक्ति का अपना नजरिया है | यही नजरिया जीवन के प्रति दृष्टिकोण का निर्धारण करता है | कुछ लोग आशा से भरे रहते हैं, तो कुछ लोग निराशा में डूबे रहते हैं | कुछ हौसलों की उड़ान भरते हैं, तो कुछ पस्त होकर दिन काटते हैं | ' नीतू सिंह राय ' का कविता-संग्रह ' हौसलों की उड़ान ' आशा और हौसले से ओत-प्रोत कविताओं का संग्रह है | कवयित्री अनेक माध्यमों से अपने बुलंद हौसलों का इज़हार करती है | 51 कविताओं से सजे इस संग्रह का शीर्षक भी इसी का द्योतक है | 

मंगलवार, नवंबर 22, 2016

आज़ाद ख़्याली के जीवन दर्शन की बात करता यात्रा वृत्तांत { भाग - 2 }

पुस्तक – आज़ादी मेरा ब्रांड 
लेखिका - अनुराधा बेनीवाल 
प्रकाशन - सार्थक, राजकमल का उपक्रम
पृष्ठ - 204
मूल्य -  199 /-
भारतीयों में आमतौर पर घूमने की प्रवृति कम ही होती है और जो घूमने निकलते हैं, उन्हें घूमने का तरीका नहीं आता | जीने और घूमने के बारे में अक्सर कहा जाता है - 
जीने का मज़ा लेना है तो अरमान कम रखिए 
सफ़र का मज़ा लेना है तो सामान कम रखिए |

बुधवार, नवंबर 16, 2016

आज़ाद ख़्याली के जीवन दर्शन की बात करता यात्रा वृत्तांत { भाग - 1 }

पुस्तक – आज़ादी मेरा ब्रांड 
लेखिका - अनुराधा बेनीवाल 
प्रकाशन - सार्थक, राजकमल का उपक्रम
पृष्ठ - 204
मूल्य -  199 /-
आज़ादी पुरुष के लिए जितनी ज़रूरी है, जितना इस पर उसका अधिकार है, यह स्त्री के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है और इस पर उसका भी बराबर का अधिकार है लेकिन आज़ादी की मांग जब भी की जाती है, आज़ादी के लिए जब भी संघर्ष होता है, दोनों के तरीके अलग-अलग होते हैं । स्त्री अक्सर वस्त्रों के माध्यम से अपनी घोषणा करती है । " आज़ादी मेरा ब्रांड " की लेखिका ' अनुराधा बेनीवाल ' अपने यात्रा वृत्तांत के बारे में जब आखिर में अपने वतन की लड़कियों को संबोधित करती है, तो कहती है - 
" तुम आज़ाद बेफ़िक्र, बेपरवाह, बेकाम, बेहया होकर चलना । तुम अपने दुपट्टे जलाकर, अपनी ब्रा साइड से निकालकर, खुले फ्रॉक पहनकर चलना । तुम चलना ज़रूर । " 

बुधवार, अक्तूबर 26, 2016

व्यंग्य के युगपुरुष हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई ने कहानियाँ, उपन्यास, संस्मरण, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ लिखी लेकिन उनकी ख्याति व्यंग्यकार के रूप में ही है और उन्हें व्यंग्य विधा को स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है । व्यंग्य शब्द की व्यंजना शक्ति से उपजता है और शब्द की तीनों शब्द शक्तियां अभिधा, लक्षण, व्यंजना शुरू से ही मौजूद हैं । परसाई से पूर्व और समकालीन साहित्यकारों ने भी व्यंजना शक्ति का प्रयोग किया लेकिन इन्हें ही व्यंग्य का जनक माना गया । जिस प्रकार प्रेमचन्द से पूर्व भी उपन्यास लिखे गए लेकिन प्रेमचन्द ने उपन्यास के क्षेत्र में ऐसे क्रांतिकारी बदलाव किए कि उपन्यास का जिक्र आते ही प्रेमचन्द का नाम आता है, वैसे ही व्यंग्य का जिक्र आते ही हरिशंकर परसाई का नाम उभरता है । परसाई ने न सिर्फ व्यंग्य के स्तर को उठाया, अपितु इसे स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया । 

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