BE PROUD TO BE AN INDIAN

मंगलवार, सितंबर 20, 2016

रहस्यवाद, प्रकृति और सच को बयाँ करता संग्रह

काव्य-संग्रह - निदा फ़ाज़ली ( ग़ज़लें, नज़्में, शे 'र और जीवनी )
संपादक - कन्हैयालाल नन्दन 
प्रकाशन - राजपाल 
पृष्ठ - 160 ( पेपरबैक )
कीमत - 150  / -
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए ।
हिंदी-उर्दू शायरी का शौकीन ऐसा कौन है, जो इन पंक्तियों से अपरिचित होगा । इन पंक्तियों के शायर हैं - निदा फ़ाज़ली । राजपाल प्रकाशन के आज के प्रसिद्ध शायर श्रृंखला में " निदा फ़ाज़ली : गज़लें, नज़्में, शे'र और जीवनी " पुस्तक का संपादन किया है - कन्हैयालाल नन्दन ने । इस पुस्तक में शामिल रचनाओं में निदा फ़ाज़ली के फलसफे को बड़ी आसानी से समझा जा सकता है । 

बुधवार, सितंबर 14, 2016

कब मिलेगा हिंदी को उसका मुकाम

1949 के 14 सितम्बर को हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया लेकिन आज तक हिंदी अपना मुकाम हासिल नहीं कर पाई । हिंदी आज भी अपेक्षित-सी महसूस कर रही है । हिंदी के साथ अंग्रेजी को 15 वर्ष के लिए स्वीकार किया गया था । तब उम्मीद थी कि इतने वर्षों में हिंदी का प्रयोग हर क्षेत्र में होने लगा लेकिन वह अवधि हम कब की पार कर आए । अंग्रेजी आज भी हिंदी पर भारी पड़ रही है । स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि कई संस्थाएँ 14 सितम्बर को ' हिंदी डे ' मनाती हैं । हिंदी का अंग्रेजीकरण ज़रूरत से ज्यादा ही हुआ है । अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी में बात करना अपराध के समान है । अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी को जब विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, तो इसे अंग्रेजी के माध्यम से ही पढ़ाया जाता है । मात्राओं का ज्ञान देने का नमूना देखिए - " आ has a मात्रा but अ does not have a मात्रा । " इस तरीके से पढ़े विद्यार्थियों को हिंदी का कितना ज्ञान होगा, इसका सहज ही अंदाज़ लगाया जा सकता है । अब प्रश्न यह है कि हिंदी की अवहेलना क्यों हो रही है ? हिंदी को सिर्फ़ हिंदी दिवस पर ही क्यों याद किया जाता है ?

बुधवार, अगस्त 17, 2016

हरियाणवी फिल्मों को समझने और उन्हें प्रगति की राह दिखाती पुस्तक

पुस्तक – हरियाणवी सिनेमा : संदर्भ कोष
लेखक – रोशन वर्मा
प्रकाशक – लक्ष्य बुक्स, पिंजौर
पृष्ठ – 176 ( पेपर बैक )
कीमत – 500 /-
संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों का नाम है जो लोगों के सोचने, बोलने, कार्य करने, खाने-पीने में झलकता है । नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि संस्कृति को सुरक्षित रखने में सहायक होते हैं । फिल्मों का योगदान भी इस दृष्टिकोण से अमूल्य है । हरियाणवी सिनेमा हरियाणवी संस्कृति को संजोने का काम कर रहा है, लेकिन हरियाणवी फिल्मों की दशा और दिशा कैसी है, इससे बहुत से लोग परिचित नहीं । इस क्षेत्र में रोशन वर्मा की पुस्तक “ हरियाणवी सिनेमा संदर्भ कोष ” महत्त्वपूर्ण पुस्तक है ।

सोमवार, अगस्त 08, 2016

क्षण विशेष को चित्रित करती लघु कविताएँ

कविता संग्रह – पत्तों से छनकर आई चाँदनी
कवि – रूप देवगुण
प्रकाशक - सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल
पृष्ठ - 86
मूल्य - 200 / -  ( सजिल्द )
साहित्य समाज सापेक्ष होता है | आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में लम्बी विधाओं को पढ़ने का समय लोगों के पास कम ही है | लघुकथा इसी कारण आज एक लोकप्रिय विधा बन चुकी है | यूं तो लघु कविताएँ भी समय-समय पर लिखी जाती रही हैं, लेकिन अभी तक इन्हें अलग विधा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता, लेकिन रूप देवगुण जी इसे अलग विधा के रूप में स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत है और इसी कड़ी में उन्होंने लघु कविताओं का तीसरा संकलन “ पत्तों से छनकर आई चाँदनी ” साहित्य जगत को दिया है | इस संग्रह में उन्होंने 119 लघु कविताओं को 10 शीर्षकों के अंतर्गत रखा है | 

सोमवार, अगस्त 01, 2016

पाठकों और शोधार्थियों, दोनों के लिए उपयोगी पुस्तक

पुस्तक - रूप देवगुण की कहानियों में सामाजिक संदर्भ
लेखिका - शील ‘ शक्ति ’
प्रकाशन - सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल 
पृष्ठ - 160 ( सजिल्द ) 
कीमत - 350 / -
वाद और विचारधाराओं में जकड़े साहित्यकारों को अगर छोड़ दें तो सामान्यत: साहित्यकार लिखते समय रचना को महत्त्व देता है, वाद या विचारधारा को नहीं | कहानी-लेखन में तो बहुधा पात्र कहानीकार की सोच से अलग राह पर कहानी को ले चलते हैं, ऐसा अनेक कहानीकारों ने स्वीकार किया है | दरअसल कहानीकार कहानी लिखते समय अपने पात्रों और उसकी परिस्थितियों को जीता है और उसी के आधार पर कहानी का सृजन होता है | कहानी में किस तत्त्व की प्रधानता है, यह देखना समीक्षकों का कार्य है | सामान्यत: कहानी एकांगी नहीं होती | उसमें प्रेम भी हो सकता है, सामाजिक सन्दर्भ भी, आदर्शवाद या यथार्थवाद भी | समीक्षक किसी कहानीकार की कहानियों को अलग-अलग नजरिये से देखने के लिए स्वतंत्र होते हैं | इसी कड़ी में, रूप देवगुण की कहानियों में सामाजिक सन्दर्भों को देखने का शानदार प्रयास किया है शील शक्ति जी ने पुस्तक “ रूप देवगुण की कहानियों में सामाजिक सन्दर्भ ” में | 

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