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बुधवार, अप्रैल 27, 2016

शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने में सरकार नाकाम

शिक्षा सरकार का दायित्व है, ऐसे में अगर परीक्षा परिणाम बुरा है या प्राइवेट स्कूल मनमर्जी कर रहे हैं तो यह प्रत्यक्ष रूप से सरकार की नाकामी है । ऐसा नहीं कि सरकार इस हेतु प्रयास नहीं कर रही, लेकिन जमीनी सच्चाई को न समझते हुए बनाई गई नीतियां नाकामी का बड़ा कारण हैं । 
सरकारी स्कूलों की विफलता में हाथ -
सरकारी स्कूल तो सरकारी नीतियों का मूर्त रूप हैं । सरकारी स्कूलों की विफलता भले ही अध्यापकों के माथे मढ़ी जाती है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से सरकार की विफलता है । स्कूलों में पर्याप्त अध्यापक उपलब्ध करवाना, अध्यापकों से काम करवाना, यह सरकार के दायरे में आता है । जब एक अध्यापक अपने से आधे वेतन वाले क्लर्क का काम करता है तो इससे उसका अध्यापन कार्य ही प्रभावित नहीं होता बल्कि यह एक तरह से पैसे की बर्बादी भी है, क्योंकि वह उस समय ज्यादा वेतन लेकर कम वेतन वाला काम कर रहा होता है । स्कूल में क्लर्क, डाटा ऑपरेटर, मिड-डे मील इंचार्ज, स्कूल भवन निर्माण हेतु कुछ कर्मचारी अलग से रखे जा सकते हैं, ताकि अध्यापक के पास एकमात्र पढ़ाने का काम हो । अन्य कर्मचारियों का वेतन कम होगा ही, ऐसे में अतिरिक्त कार्यों के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति करके पैसे भी बचाए जा सकेंगे और अध्यापकों को सिर्फ पढाई पर केन्द्रित किया जा सकेगा, जबकि वह अब कभी डाटा ऑनलाइन करवा रहा होता है, कभी बच्चों के खाते में पैसे डलवा रहा होता है, कभी वर्दियां खरीद रहा होता है, कभी आधार कार्ड बनवा रहा होता है, कभी खाना बनवा रहा होता है । इतना ही नहीं कहीं-कहीं तो क्लर्क न होने से अध्यापक ट्रेजरी के कामों में भी उलझे रहते हैं । 
अध्यापकों पर अविश्वास दिखाना भी सरकार की नाकामी है । आज के अध्यापक पिछले वक्त के अध्यापकों से ज्यादा शिक्षित हैं, लेकिन परिणाम खराब आ रहे हैं | कारण है, अध्यापकों पर अविश्वास । अधिकारी हों या स्थानीय लोग सब अध्यापक को निशाना बनाने को तैयार बैठे हैं । इसके पीछे स्कूलों का निजीकरण करने की भी नीति है । ‘ प्राइवेट स्कूल सरकारी स्कूलों को गोद लें ’ ऐसे बातें सुनने में आ रही हैं । यह कदम सरकार का दायित्व से भागने वाला है । निजीकरण समस्या का हल नहीं । समस्या के जो कारण है, सरकार उनको देख नहीं पा रही या देखना नहीं चाहती । सरकार की इसी नीति के कारण सरकारी स्कूलों का स्तर गिरता जा रहा है ।
निजी स्कूलों पर नियन्त्रण का अभाव -
निजी स्कूलों पर सरकार का कितना नियन्त्रण है, इसे आप छुट्टियों में देख सकते हैं । जब पूरे राज्य के स्कूल बंद करने के आदेश होते हैं, तब भी प्राइवेट स्कूल जिले और ब्लॉक के शिक्षा अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे खुले रहते हैं । जो स्कूल छुट्टी करने तक की बात नहीं मानते, वे अन्य नियमों को मानेंगे, यह कब संभव है ? नौवीं और ग्यारहवीं की पढाई न करवाई जाने की शिकायतें लगातार होती रहती हैं, इसलिए हरियाणा में इस बार प्राइवेट स्कूलों से नौवीं और ग्यारहवीं के कुछ पेपर बोर्ड मंगवाए जाने का निर्णय लिया गया है, लेकिन इसका तोड़ बड़ी आसानी से निकाला जा सकेगा क्योंकि परीक्षा का आयोजन स्कूल स्तर पर होना है । सरकार यह तो कह सकती है कि प्राइवेट स्कूल सरकारी स्कूल को गोद ले लें, यह नहीं कहेगी कि सरकारी स्कूल का प्रिंसिपल नजदीक के प्राइवेट स्कूलों में होने वाली परीक्षाओं पर नजर रखे । ट्यूशन पर नकेल कसने में भी सरकार नाकाम रही है । 
अच्छे सबक न सीखना -
सफलता के लिए जरूरी होता है कि आप सीखते रहें । यह बात सरकार पर भी लागू होती है । अगर आप खुद गलती करके ही सीखेंगे तो आप बहुत ज्यादा नहीं सीख सकते, क्योंकि जिंदगी बड़ी छोटी है । सीखने के लिए जरूरी है कि आप दूसरों की गलतियों और अच्छे कामों से भी सीखें । सरकार एक तरफ अपनी गलतियों को दोहराए जा रही है, वहीं प्राइवेट स्कूलों की अच्छी बातों को नहीं अपना रही । प्राइवेट स्कूलों में बहुत-सी अच्छी बातें भी हैं, जिन्हें अगर सरकारी स्कूलों में अपना लिया जाए तो सरकारी स्कूलों का कोई मुकाबला संभव नहीं । प्राइवेट स्कूलों में बच्चों और अध्यापकों का अनुपात काबिले-तारीफ होता है, जबकि सरकारी स्कूलों में हालत खस्ता ही है । प्राइवेट स्कूल में अध्यापक पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं होता, फीस लेने तक का काम क्लर्क करता है, जबकि सरकारी स्कूल के अध्यापकों को अतिरिक्त कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती । अनुशासन के मामले में स्थिति भले ज्यादा बेहतर नहीं, फिर भी प्राइवेट स्कूल किसी को दाखिला देने, न देने में स्वतंत्र होते हैं, जबकि सरकारी स्कूल इस मामले में स्वतंत्र नहीं । सरकारी स्कूल के अध्यापक अनुशासनहीन बच्चों के आगे बेबस नजर आते हैं । 
            संक्षेप में, शिक्षा की दशा के लिए सरकार काफी हद तक जिम्मेदार है । ‘ हमें सुधारना आता है ’ की धमकी देने की बजाए, यह कहा जाना जरूरी है कि हम मिलकर सुधार करेंगे । वर्तमान में गुरु को गोबिंद से बड़ा भले न समझा जाए मगर यह तो स्वीकार करना ही होगा कि शिक्षक पर ही शिक्षा निर्भर करती है । वह शिक्षा के स्तर को सुधार सकता है, बशर्ते आप उस पर विश्वास करें, उसे सहयोग दें । शिक्षक पर से भरोसा उठना इस दौर की सबसे बड़ी दुर्घटना है । निस्संदेह अध्यापक भी इसके लिए दोषी हैं, लेकिन सरकार का भी इसमें बड़ा हाथ है । आखिर शिक्षक उसी की नीतियों का ही तो पालन करता है । सरकार की नाकामी अभिभावकों की सबसे बड़ी परेशानी है क्योंकि शिक्षा कैसी है इसका प्रभाव सरकार और शिक्षकों पर आंशिक रूप से पड़ता है, जबकि नौनिहालों का भविष्य इससे पूर्णत प्रभावित होता है ।
न्यूज़बल्क में प्रकाशित 
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दिलबागसिंह विर्क 
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3 टिप्‍पणियां:

महेंद्र मिश्र ने कहा…

bahut badhiya sarthak Post ...

Harsh Wardhan Jog ने कहा…

सही विश्लेषण किया है. परन्तु निकट भविष्य में कुछ सुधार होता नज़र भी नहीं आ रहा.

M. Rangraj Iyengar ने कहा…


हालातों को स्प्षट करती हुई और सीदी सादी पोस्ट..ने . एक अंधेरे कोने में उजाला कर दिया

धन्यवाद सर.

अयंगर

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