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मंगलवार, अप्रैल 12, 2016

न संभल पाने की कथा कहता उपन्यास

उपन्यास - इक आग का दरिया है 
लेखक - गिरिराज किशोर 
प्रकाशन - भारतीय ज्ञानपीठ 
कीमत - 180 / - 
पृष्ठ - 174
फिसलने के बाद संभलना काफी मुश्किल हो जाता है, बहुधा असंभव भी | उमा के फिसलने और फिर न संभल पाने की कहानी कहता है उपन्यास " इक आग का दरिया है " |
उमा एक बिंदास लडकी है | लेखक उसकी कहानी सुनाने की बात करते हुए लिखता है - 
" आज भी सोचकर दिल काँप जाता है |" वह इसमें था का प्रयोग नहीं करते क्योंकि ये पात्र आज भी हैं | लेखक के शब्दों में ' पात्र कभी नहीं मरते |' उमा का पात्र भी समाज में सर्वत्र मौजूद है | लेखक उसका परिचय देते हुए लिखता है - 
" उमा के अंदर एडवेंचर था | करो और देखो | गनीमत है उसने बम नहीं बनाया, नहीं तो पता नहीं क्या-क्या टूटता, क्या-क्या बिखरता | लेकिन जिस घटना का जिक्र कर रहा हूँ वह भी एक धमाका ही था |"
लेखक ने जिस घटना का जिक्र किया है, वह उन दिनों की है, जब उमा छोटी क्लास में थी यानी वह तब किशोर ही थी और घटना थी कि वह दो लडकों के साथ पार्क में पकड़ी गई थी | सिक्योरटी अफसर से पिता को पता चला था | दूसरी घटना में उमा अपनी छोटी बहन क्षमा को मजहर को प्रेम पत्र लिखने के लिए उकसाती है और दोनों घटनाओं में उसकी विद्रोही प्रकृति साफ़ झलकती है | क्षमा का पात्र इस उपन्यास का बड़ा छोटा हिस्सा है | बड़ी होकर वह अन्य जाति के युवक से प्रेम करती है और उसके पिता उसे इसकी सहमति देते हैं या यूँ कहें कि क्षमा के व्यवहार को देखकर ही समझ जाते हैं और खुद लड़के के पिता को बुलाकर यह रिश्ता मंजूर करते हैं | क्षमा का पात्र खुद महत्त्वपूर्ण न होकर भी अपने पिता के चरित्र को सुंदर तरीके से उद्घाटित करता है | उनके खुले विचारों के होने की जो झलक इस घटना में मिलती है, वह अन्य घटनाओं से और पुख्ता होती है | उमा के पिता को उमा और अवि का प्रेम भी स्वीकार था, लेकिन अवि के माँ-बाप को यह संबंध स्वीकार नहीं था | अवि को उमा से दूर करने के लिए वे अवि को पढने के लिए विदेश भेज देते हैं | अवि दब्बू किस्म का लड़का है | उमा भी इससे भली-भांति परिचित है | अवि से उसका संबंध टूटना उसे भीतर से भी तोड़ डालता है, हालांकि वह दर्शाती नहीं | इस समय लगता है कि यह उपन्यास इसी इश्क के दुःख को आग का दरिया मानकर लिखा गया है, लेकिन यह इश्क तो मात्र लहर थी | शायद यही लहर उमा को आग के दरिया में फैंक देती है, लेकिन लेखक ने इसे स्पष्ट नहीं किया |
               उमा की शादी निवेश से कर दी जाती है | निवेश का कद लम्बा है और उमा को लम्बा कद आकर्षित करता है | इसकी भी एक कहानी है कि कैसे वह अपने भाई के लम्बे कद वाले दोस्त के प्रति आकर्षित होती है, जिसके कारण उसके भाई को पढाई छोडनी पड़ती है | निवेश शिप का कैप्टन है | कुछ समय बाद उमा भी शिप पर चली जाती है | सब कुछ सामान्य है, लेकिन शिष्टाचारवश वह शराब को सिप करती है | फिर वह निवेश की हम प्याला हो जाती है और धीरे-धीरे इसकी आदी हो जाती है | निवेश परेशान तो होता है, लेकिन नाराज नहीं | गर्भावस्था में उसकी शराब की लत छुडाने के लिए एक कहानी सुनाता है जो असर करती है, लेकिन इसके बाद समुद्र का अज्ञात डर उसे सताने लगता है | निवेश उसे उसके मायके भेज देता है | यहाँ वह बेटी नताशा को जन्म देती है, लेकिन समुद्र अब भी उसे डराता है | फिर एक दिन वह खुद को बेबस पाती है - 
' " क्या बेटा, तूने फिर शुरू कर दी ?"
' नहीं तो पापा |'
" चल, अच्छा हुआ मेरे बिना नाम लिए ही समझ गई | मुझे बेशर्म नहीं बनना पड़ा | बस मैं यही कहूंगा, लाखों में तेरी एक बेटी और इतना अच्छा पति, इनका ख्याल कर | हम पर जो हरूफ आएगा सो आएगा ही | हमने जहाँ पहले सहा, अब भी सह लेंगे | इस बच्ची पर क्या गुजरेगी, यह भी सोच लो |' "
पिता-पुत्री का यह संवाद दर्शाता है कि शादी से पहले भी उमा पीती थी और अच्छी-खासी पियक्कड़ रही होगी | शायद अवि के विदेश जाने के बाद इस लत ने उमा को जकड़ा होगा, लेकिन लेखक ने तो इस लत का न तो संकेत दिया और न ही यह बताया कि वह कैसे इससे उबरी | शादी के बाद ससुराल में वह शराब नहीं पीती | शिप पर जाने के बाद सैनिकों के निवेदन करने पर वह निवेश की स्वीकृति से सिप करती है | उमा की ननद भी बाद में इस सवाल को उठाती है, लेकिन कोई उत्तर नहीं दिया जाता | 
          बाद की कहानी शराबी उमा के ऊहापोह की कहानी है | वह हर सुबह चुस्त उठती है | दिन भर संकल्प करती है कि वह अब शराब नहीं पीएगी, लेकिन शाम होते-होते वह सुध-बुध खो देती है | निवेश के वापस आने पर वह अलग घर लेकर रहने लगते हैं | नताशा बड़ी हो गई है, लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं कि सब कुछ संभाल सके | कार्टून देखते-देखते वह देर रात तक पिता का रोते हुए इन्तजार करती है, ताकि दरवाजा खोल सके, पिता के साथ खाना खा सके | उमा को तो उस समय होश ही नहीं होता | निवेश इस बात का इन्तजार करता है कि उमा खुद कहे कि उसे इलाज करवाना है, शराब छोडनी है | यह अवसर भी आता है, उमा को नशामुक्ति केंद्र में रखा भी जाता है, लेकिन इस इलाज का असर ज्यादा देर नहीं रहता | निवेश की सहयोगी प्रवृति उस दिन जवाब दे जाती है जिस दिन वह चलती कार से कूदना चाहती है | निवेश बेटी को लेकर अलग हो जाता है, हालांकि उसका कहना कि हमें अपना मूल्यांकन करना चाहिए | उमा बेटी के बिना तड़पती है, लेकिन लत नहीं छूटती | शराब छुडाने का एक प्रयास उसका पिता भी करता है, लेकिन यह प्रयास भी असफल रहता है | उलझे-सुलझे ब्यान के साथ कथा का अंत होता है |
               इस उपन्यास में दार्शनिकता का बोलबाला है | उमा भी दार्शनिक बातें करती है और निवेश भी | कई जगहों पर यह बातचीत कथा को बोझिल करती है | निवेश जब उमा को खुद से अलग करता है, तो निवेश और उमा के पिता की बातचीत में उमा के पिता का बात को धर्म-राजनीति से जोड़ना अप्रासंगिक लगता है - 
" मैं आपकी बात से सहमत होने के बावजूद एक ही बात सोचता हूँ कि कभी-कभी अपने व्यक्तिगत अनुभव को केंद्र में रखकर हम लोग किसी भी उस प्राणी के अनुभव या तकलीफ को नजरअंदाज कर देते हैं, जो अपनी सोच को शक्ल देने में असमर्थ होता है | यह बात धर्म से लेकर राजनीति तक सब क्षेत्रों पर लागू होती है | यह सामाजिक स्वार्थ भी हो सकता है और व्यक्तिगत स्वार्थ भी | स्वार्थ समाज का भी होता है | यह इस बात पर निर्भर करता है, कौन ऐसा कह रहा है |"
                       लेखक की बौद्धिकता, लेखक ने जो पढ़ा है, जो देखा है उन सबकी झलक उपन्यास में है, हालांकि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी मिलता है | निवेश की सोच मनोवैज्ञानिक है | उमा का इलाज वह तब तक नहीं करवाना चाहता, जब तक वह खुद तैयार नहीं होती -   
" इलाज अस्थायी होते हैं | इस तरह के रोग मौसम की तरह लौट आते हैं | बीमारियों, दवाओं और इंसान के बीच समझौता हो जाता है | वह उमा को तब तक कहीं भर्ती नहीं करना चाहता, जब तक वह स्वयं न कहे | इलाज के मामले में मरीज की सक्रिय हिस्सेदारी न हो तो रोग तरह-तरह के रूप रखकर आता है | "
                    पात्रों के दृष्टिकोण से इस उपन्यास में उमा ही प्रमुख पात्र है | पूरा उपन्यास उसी के इर्द-गिर्द बुना गया है | निवेश उसका सहयोग करता है | नताशा भी महत्त्वपूर्ण पात्र है और उमा के पिता की भूमिका भी अहम् है, बाकी सब गौण हैं | नताशा के रूप में लेखक ने नशे की आदी माँ के बच्चे की स्थिति का बड़ा सटीक चित्रण किया है | यह उपन्यास शराब रूपी आग के दरिया में झुलसते परिवार को तो दिखाता है, लेकिन निकलने का कोई रास्ता नहीं सुझाता इसे आधुनिकता के दुष्प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है | निवेश, उमा का पिता सुलझे हुए पात्र हैं | वे दुःख उठाते हैं, लेकिन उमा को भी समझते हैं | अगर वे समझदार न होते तो उमा का जीवन नर्क बन जाता, हालांकि वह स्वर्ग अब भी नहीं लेकिन अब ज्यादा नरकीय दुःख नताशा, निवेश के हिस्से आया है | 
                      परोक्ष रूप में, लेखक ने जहाजी जीवन को भी दिखाया है, समुद्री जीवन का चित्रण किया है, लेकिन प्रमुख विषय उमा की शराब की लत ही है | शुरूआती प्रेम और शिप की पार्टी उसे दलदल में धकेलती है | ऊँची सोसायटी में औरतों का शराब पीना सामान्य है, यह भी इस उपन्यास का एक बिंदु है, लेकिन नशे के आदी हो जाने के दुष्परिणामों को विस्तार से दिखाया गया है, हालांकि यह दिखाने के प्रयास में कथा अटकी-सी लगती है, विशेषकर अंतिम हिस्सा तो महज वर्णन-सा होकर रह जाता है |  
                  उपन्यास का अंत दार्शनिकता से होता है - 
" बकवास ! वह हंस देती है | " बकवास में भी शब्द होते हैं | उनका भी अर्थ होता है |" लोग ताज्जुब करते हैं, उमा को क्या हुआ | "
                 दार्शनिकता तो समझ आती है, लेकिन लोगों का ताज्जुब करना समझ नहीं आता क्योंकि उमा के कार्य, उमा की भाषा तो शुरू से ही ऐसी ही है | 
                        संक्षेप में, यह बौद्धिकता भरपूर उद्देश्यप्रधान उपन्यास है, जो नशे की लत के दुष्परिणामों का यथार्थपरक चित्र प्रस्तुत करता है |

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दिलबागसिंह विर्क 
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3 टिप्‍पणियां:

रश्मि शर्मा ने कहा…

अच्‍छी समीक्षा की आपने।

Jamshed Azmi ने कहा…

बहुत ही प्रभावी और सुंदर समीक्षा की है आपने। अच्छी समीक्षा प्रस्तुत करने करे लिए आपको आभार।

Kavita Rawat ने कहा…

उत्सुकता जागती बहुत अच्छी समीक्षा.. ..
गिरिराज किशोर जी को हार्दिक बधाई!

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