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बुधवार, मई 04, 2016

प्राइवेट स्कूलों की मनमानी

हालांकि हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी द्वारा जारी की टॉप टेन की सूची में सरकारी स्कूलों का दबदबा रहा, फिर भी यह तो स्वीकार करना ही होगा कि प्राइवेट स्कूल परिणाम की दृष्टि से सरकारी स्कूलों से बेहतर हैं । परिणाम और अन्य गतिविधियों में इनकी भूमिका, यहाँ प्राइवेट स्कूलों के सकारात्मक पहलू हैं, वहीं इनके अनेक नकारात्मक पहलू भी हैं, जो अभिभावकों को परेशान करते हैं - 
महंगी शिक्षा -
कोई भी आदमी किसी भी व्यवसाय में तभी निवेश करता है, जब उसेे लाभ मिले । शिक्षा के क्षेत्र में उतरे घराने सिर्फ सेवा के उद्देश्य से स्कूल चला रहे हैं, यह सोचना मूर्खता ही होगा । लाभ कमाने के लिए शिक्षा दिनोंदिन महंगी होती जा रही है । साधारण से साधारण प्राइवेट स्कूल की फीस तीस-चालीस  हजार रुपए वार्षिक है । इसके अतिरिक्त अन्य कई तरीकों से भी पैसे वसूले जाते हैं । कुल मिलाकर प्राइवेट स्कूल की नजर हर समय अभिभावकों की जेब पर रहती है और जेब काटने का कोई अवसर वे नहीं चूकते । यह महंगी शिक्षा दिला पाना हर अभिभावक के लिए संभव नहीं, ऐसे में बहुत से लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ा पाते । प्राइवेट स्कूल ‘ सबके लिए शिक्षा ’ की बजाए ‘ अमीरों के लिए शिक्षा ’ सूत्र पर कार्य करता है ।
जुगाड़ की नीति -
प्राइवेट स्कूल परीक्षा परिणाम बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, यह अच्छा भी है, लेकिन इसके लिए अनुचित तरीकों को अपनाया जाना और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करना गलत है । नकल को लेकर तो प्राइवेट और सरकारी सभी एक जैसे हैं ही, बहुत से प्राइवेट स्कूल 10 वीं और बारहवीं का परिणाम बेहतर बनाने के लिए नौवीं और ग्यारहवीं का पाठ्यक्रम ही नहीं करवाते और नौवीं में दसवीं की पढ़ाई करवाई जाती है और ग्यारहवीं में बारहवीं की । इस तरीके से भले बोर्ड की कक्षाओं का परिणाम बेहतर रहता है और बच्चों के अंक भी बढ़ते हैं लेकिन बच्चों को भविष्य में भारी नुक्सान उठाना पड़ता है । पाठ्यक्रम का निर्माण विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है । अगर नौवीं और ग्यारहवीं का पाठ्यक्रम जरूरी ही न होता तो उसे क्यों रखा जाता । प्रतियोगिताओं में अक्सर इसका खामियाजा भुगतना होता है, लेकिन यह खामियाजा भुगतते हैं बच्चे । प्राइवेट स्कूल तो बढ़िया परिणाम का प्रचार कर खुद को सही साबित कर लेते हैं ।
ट्यूशन और कोचिंग का बोलबाला -
इन दिनों ट्यूशन और कोचिंग सैंटरों की बाढ़ आई हुई है । प्राइवेट स्कूलों में जो होमवर्क दिया जाता है, उसे न तो बच्चे खुद कर पाते हैं, और न ही अधिकाँश अभिभावक उन्हें ये करवा पाते हैं क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में सक्षम नहीं होते । ऐसे में हर गली और मुहल्ले में ट्यूशन सैंेंटर कुकुरमुत्ते की तरह उग आएँ हैं । अगर बच्चों को ट्यूशन से ही पढ़ना है तो इन स्कूलों का औचित्य क्या है ? आजकल कोटा, बठिंडा, चंडीगढ़, दिल्ली जैसे शहरों में अनेक कोचिंग सैंेंटर खुले हुए हैं । कुछ शहर तो कोचिंग के पर्याय ही बन चुके हैं । इसका कारण है, स्कूलों में पाठ्यक्रम को सही ढंग से न करवाया जाना । नौवीं और ग्यारहवीं का जो पाठ्यक्रम स्कूलों में छोड दिया जाता, उसे पढ़ने के लिए इन कोचिंग सैंेंटरों में जाना ही पड़ता है । देश में जैसे-जैसे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने की प्रवृति बढ़ी है, वैसे-वैसे कोचिंग सैंटरों की संख्या का बढ़ना बताता है कि इन दोनों में सीधा संबंध है ।
अध्यापकों का शोषण -
प्राइवेट स्कूलों का प्रथम उद्देश्य है अधिक-से-अधिक लाभ कमाना । लाभ के लिए जरूरी है कि आमदन अधिक हो और खर्च कम । आमदन के लिए यहाँ बच्चों से अधिक फीस वसूली जाती है, वहीं खर्च कम करने के लिए अध्यापकों के वेतन पर कैंची चलाई जाती है । बेरोजगारी के इस दौर में सस्ते अध्यापक आसानी से मिल जाते हैं । कम वेतन मिलने पर उन्हें गुजर-बसर करने के लिए ट्यूशन और कोचिंग को बढावा देना पड़ता है । इसका सीधा प्रभाव पड़ता है, बच्चों की शिक्षा पर और अभिभावकों की जेब पर ।
संक्षेप में, प्राइवेट शिक्षा संस्थान मनमाने तरीकों से फीस लेते हैं, मनमाने तरीकों से पाठ्यक्रम में तोड़-मरोड़ करते हैं । भले ही अच्छे परिणाम दिखाकर वे अभिभावकों की नजर में अच्छा कार्य कर रहे है, लेकिन वास्तव में वे भी शिक्षा के लक्ष्यों से भटककर व्यापार की राह पर चल पड़े हैं ।
न्यूज़बल्क में प्रकाशित 
दिलबागसिंह विर्क 
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2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (06-05-2016) को "फिर वही फुर्सत के रात दिन" (चर्चा अंक-2334) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Joglekar ने कहा…

शिक्षा तो आजकल कमाई का जरिया है। पर नवी और ग्यारहवी का कोर्स न पढाना तो पहली बार सुना जो कि सरसर गलत है।

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