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बुधवार, मई 11, 2016

साहित्यकार सुधाकर का समग्र मूल्यांकन करती कृति

पुस्तक - प्रेम और सौन्दर्य के कवि कविवर सुधाकर 
संपादक द्वय - अनीता पंडित, युगल किशोर प्रसाद 
प्रकाशन - कविता कोसी 
पृष्ठ - 248 ( पेपरबैक )
कीमत - 350 / - 
किसी भी साहित्यकार के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व का समग्र मूल्यांकन न सिर्फ साहित्यकार विशेष के लिए जरूरी होता है, अपितु उस काल विशेष को समझने के लिए भी जरूरी होता है | कविवर सुधाकर के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने का पुनीत कार्य किया है - अनीता पंडित और युगल किशोर प्रसाद ने संपादित कृति - " प्रेम और सौन्दर्य के कवि कविवर सुधाकर " द्वारा | इस कृति को तीन भागों में बांटा गया है | प्रथम खंड कवि के व्यक्तित्व से संबंधित है | इसमें कविवर का परिचय और जीवनी दी गई है | साथ ही कवि ने अपनी प्ररेणा के बारे में लिखा है और एक संस्मरण भी दिया है | दूसरे खंड में कविवर की गद्य और पद्य रचनाएं हैं | तीसरा खंड उनका मूल्यांकन करता है | कविवर की सिर्फ पद्य पुस्तकें ही प्रकाशित हैं, इसलिए इसी पहलू का मूल्यांकन किया गया है | संपादक के रूप में और पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख आलोचना का विषय नहीं हैं ।

               30 दिसम्बर 1943 को गाँव - मचहा, पोस्ट  - कुशहा, थाना - त्रिवेणीगंज, जिला - सुपौल ( बिहार ) में जन्मे कविवर सुबोध कुमार सुधाकर एम.ए., साहित्य रत्न, डिप्लोमा इन एजुकेशन और बी.एल. हैं | 1964 में शिक्षक बने और 1990 में प्राधानाचार्य | 31 दिसम्बर 2003 को सेवानिवृत हुए | वर्तमान में क्षणदा पत्रिका का संपादन कर रहे हैं | इनके तीन गीत संग्रह - बीन के तार, खोल तरी पतवार, चल नदिया के पार और एक दोहा संग्रह - जलद घिरे आकाश प्रकाशित हो चुके हैं | इन्होने गीत प्रेम के ( गीत संग्रह ) का संपादन भी किया है और अनेक संस्थाओं से सम्मानित हो चुके हैं | 
              युगल किशोर प्रसाद जी लिखते हैं कि उनका जन्म निम्नवर्गीय यादव परिवार में हुआ और उन्होंने अपने कृतित्व से ही अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया है | प्रथम मिलन के बारे में वे लिखते हैं - 
" श्री सुबोध कुमार सुधाकर एक भद्र पुरुष हैं, इसलिए मेरे रूखे व्यवहार को उन्होंने अन्यथा नहीं लिया और अपनी सदाशयता के कारण उन्होंने मुझे अपना साहित्य सुहृद बना लिया | " ( पृ - 25 )
सुबोध कुमार जी अपने प्ररेणा स्रोतों को याद करते हुए लेखन की अनिवार्यता पर महत्त्वपूर्ण विचार रखते हैं । वे कहते हैं -
" काले-काले बादल जब आसमान में उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं, दादुर शोर मचाने लगते हैं, पादप शीश झुकाने लगते हैं, तब अंतर में भावनाएं कुलबुलाने लगती हैं, चाहत के चातक करवटें बदलने लगते हैं और तब दूर कहीं उस सघन कुंज से सृजन का पंछी उड़ आता है और सृजन प्रक्रिया शुरू हो  जाती है । सृजन  का यह पल सचमुच बड़ा ही नाजुक होता है और तब इस नाजुकता में सृजन भी अनिवार्य  हो जाता है । ( पृ - 28 )
                     कविवर की यही सोच उनकी रचनाओं में झलकती है । वे प्रकृति से प्रेरित होकर लिखते हैं | दूसरा खण्ड साहित्यिक रचनाओं को लेकर है | इस खंड की शुरूआत  कविवर अपनी पत्नी के प्रति श्रद्धा भाव दिखाकर करते हैं - 
प्रभा, सच है 
तुम्हारे पावन प्रणय पीयूष ने ही 
कवि को सुधाकर बनाया है | ( पृ - 32 )
उनके गीतों में प्रकृति और प्रेम के भरपूर चित्र हैं - 
आज कैसी यामिनी है / जगमगाती चांदनी है 
मौन हैं आकुल हवाएं / बीन के तार टूटे 
क्यों किसी का साथ छूटे ? ( पृ - 34 )
उनके गीतों में प्रेम की बारिश की फुहारें भी हैं और किसी के साथ न होने की पीड़ा भी है | 
पूर्णिमा की रात होती / और तारे पास होते 
काश ! हम-तुम साथ होते | ( पृ - 37 )
साथ न होने का दर्द उन्हें चुप करवा देता है -
मन की वीणा रूठ गई जब, कैसे राग सुनाएं 
गाने को जब साज नहीं, हम कैसे फाग मनाएं | ( पृ - 40 )
' बीन के तार ' के स्वर ' खोल तरी पतवार ' और ' चल नदिया के पार ' में भी विद्यमान हैं | कवि यहाँ भी दर्द झेलने की बात करता है | वह पूछता है - 
याद है, तूने कहा था प्यार मुझको ( पृ - 42 )
वह शिकवा करता है - 
गगन में आ गए बादल, मयूरी नाचती घायल 
सुनहरी सांझ के दृग में, विरह के अश्रु ये छाए 
सनम, तुम क्यों नहीं आए |( पृ - 43 )
अब रातें तारे गिन-गिन कर कटती हैं और कोयल की कूक से हिया में हूक उठती है | बुढापे में कोई जीवन संगिनी के साथ यूं फ़िक्र करता है  - 
बूढा पीपल सूख गया / बरगद जग से रूठ गया 
बुधन गया, बुधनी भी भागी  | रहा न कोई काका-काकी 
साथी, दिन कितने अब बाकी ? ( पृ - 52 )
नदिया के तीर की होली उनके गीतों का विषय बनती है, भोर की प्रकृति उनकी कलम की नोक पर आ बैठती है, प्रियतम को देखकर वे कह उठते हैं - 
फिर भी देख तुझे लगता है / मैं जन्नत की हूर पा लिया /
मैंने तुझमें नूर पा लिया |( पृ - 51 )
                उनके दोहों में प्रकृति चित्रण भी है, कोसी नदी का भयंकर रूप भी है, फाल्गुन के दोहे भी हैं और अध्यात्म के दोहे भी हैं | दोहों में व्यंग्य भरपूर है | कवियों पर उनका व्यंग्य देखी - 
वन्दन तेरा मैं करूं, कवियों के सिरमौर 
कविता रानी रो रही, करिए थोड़ा गौर | ( पृ - 54 )
क्षणदा पत्रिका में प्रकाशित आलेखों में से 9 आलेख इस संकलन में रखे गए हैं | इसके अतिरिक्त अपराधियों के आत्मसमर्पण पर प्रकाशित स्मारिका में उनके आलेख को भी इस संकलन में रखा गया है | उनका एक संस्मरण भी है जो ' आर्ष वचन ' में प्रकाशित है | इन आलेखों से उनके विचारों से भली-भांति परिचित हुआ जा सकता है | वे हिंदी के स्थान और दशा से चिंतित हैं | हिंदी पर क्षेत्रीय भाषाओं की अहमियत से दुखी हैं | वे हिंदी को सरल, सरस और तरल बनाने के पक्षधर हैं | वे कहते हैं - 
" आज पाठक कहानी-कविता से दूर भाग रहे हैं | कारण रचना की दुरूहता है | इसलिए सरलता, सरसता तथा तरलता का निर्वाह साहित्य सृजन में आवश्यक है |( पृ - 76 )
देश की संसद में कुर्सियां तोड़ी जाती हैं, नेता घोटालों में शामिल हैं, ये बातें सुधाकर जी को दुखी करती हैं | लेखक पत्रकारिता और लघु पत्रिकाओं के सच को भी उद्घाटित करता है - 
" पत्रिकाओं की भीड़ में बहुत सारी पत्रिकाएँ देखने को मिलती हैं, जिनकी कोई सार्थकता नहीं है, कोई निजी सोच नहीं है, कोई विचार नहीं है | ऐसी पत्रिकाएँ ऐसे ही निकलती रहती हैं - केवल नाम के लिए, केवल यश के लिए | मगर नाम या यश के बदले संपादक या प्रकाशक को अपयश और बदनामी ही मिलते हैं |( पृ - 69 )
लेकिन वे इनकी आर्थिक मजबूरी का भी वर्णन करते हैं और सुझाव देते हैं कि इन्हें विज्ञापन मिलने चाहिए | पत्रकारिता में आई गिरावट को वे उदाहरण देकर स्पष्ट करते हैं | पत्रकारों से सच्चे पत्रकार बनने का आग्रह करते हैं | वे तसलीमा नसरीन को दिल्ली में नजरबंद किए जाने का विरोध करते हैं ताकि अभिव्यक्ति का अधिकार तथा सच की स्वतन्त्रता बरकरार रहे | वे अंकों को लेकर फालतू के विवाद से बचना चाहते हैं | कोसी की बाढ़ के दृश्य से आहत भी होते हैं और सरकारों से आग्रह भी करते हैं | अपराधियों के आत्मसमर्पण को वह भागीरथी प्रयास कहते हैं | संक्षेप में, गीतकार सुधाकर की कलम समसामयिक और महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय मुद्दों पर गद्य लिखकर उनके सजग पत्रकार होने की सूचना देती है | 
                    मूल्यांकन खंड में 20 लेखकों के 31 आलेख हैं | इन आलेखों में कुछ में उनकी पुस्तकों की समीक्षा की गई जबकि कुछ में उनके समग्र साहित्य का मूल्यांकन किया है, लेकिन सभी उनके रचना-कौशल की व्याख्या करते हैं | उन पर कार्य करने वालों में सर्वाधिक योगदान युगल किशोर प्रसाद का है, जो इस पुस्तक के संपादक भी हैं | इस संकलन में उनके छह आलेख हैं | प्रो. दीनानाथ शरण और तारानन्दन तरुण के 3-3 आलेख हैं, रामचरण महेंद्र के दो और शेष 16 लेखकों का एक-एक आलेख है | 
                      युगल किशोर प्रसाद जी उनके समस्त काव्य में प्रेम और सुन्दरता को देखते हैं | इन गीतों में प्रेम का जो रूप वर्णित है, वह वासनाजन्य प्रेम नहीं, आत्मिक और सात्विक प्रेम है | प्रो. दीनानाथ शरण उनके प्रेम की विवेचना करते हुए कहते हैं कि सुधाकर जी देव और बिहारी नहीं, घनानन्द और रसखान हैं, क्योंकि वे प्रेम के पीर के कवि हैं | उन्होंने अनेक गीतों में प्रकृति का अपनी प्रणय पीर की अभिव्यक्ति के लिए अच्छा प्रयोग किया है | प्रकृति उनकी सरल सहचरी है | प. जनार्दन प्रसाद द्विवेदी जी उनके गीतों में प्रेम के दोनों रूप देखते  हैं – 
प्रेम की दोनों अवस्थाओं की व्यंजना समान दक्षता के साथ हुई है | कवि का संयोग वर्णन जहां पाठकों के मन को उत्फुल्ल करता है, वहीं वियोग की व्यंजना करुणा का उद्रेक भी करती है |( पृ- 212 )  
डॉ. कामेश्वर पंकज उन्हें प्रणय के कवि कहते हुए लिखते हैं – 
कवि सुधाकर की कविता में रूमानियत और एकाकीपन है | कवि स्वप्निल रागात्मक संसार की रचना करता और उसमें प्रणय व्यापार के चित्रों को विविध रंगों में भरता है | सभी भावों में विरह का रंग विद्यमान है |( पृ - 171 )
विनोद कुमार तिवारी इन्हें गीतों का राजकुमार कहते हुए इनके गीतों में प्रेम के बारे में लिखते हैं – 
विरह और मिलन के दो पाटों में कवि सुधाकर ने जो प्रेम की पावन दरिया बहाई है, वह बेहद बेमिसाल है | ( पृ – 109 )
डॉ. वन्दना वीथिका तो इन्हें विरले कवि मानते हुए इनकी तार सूफीवाद से जोडती हैं – 
सुधाकर जी के काव्य में प्रिय के लिए जो विह्वलता है, यह सूफी काव्य की झलक दिखलाता है | ( पृ – 175 )
इनके गीतों में अध्यात्म की झलक को तारानंदन तरुण ने भी देखा है – 
प्रकृति में परमेश्वर की सत्ता, उनसे मिलने की उत्कंठा, सागर में बूँद के समा जाने की ललक, आत्मा को परमात्मा में विलीन हो जाने की सनक का प्रतिपादन कतिपय गीतों में बखूबी हुआ है | ” ( पृ - 160 )
 सौन्दर्य और प्रेम की भावना को लेकर युगल किशोर प्रसाद कहते हैं – 
सौन्दर्य ही वह तत्व है, जिसके प्रति मानव-मन आकर्षित होता है | यह आकर्षण ही पारस्परिक प्रेम का हेतु बनता है | इस प्रकार प्रेम और सौन्दर्य परस्परालंबी तत्व हैं, जिनकी सफल अभिव्यक्ति कविवर सुधाकर जी का सम्पूर्ण साहित्य है | ( पृ - 115 ) 
प्रेम की धारणाओं के आधार पर वे घोषणा करते हैं – 
प्रेम और सौन्दर्य की पौर्वात्य और पाश्चात्य धारणाओं के अनुरूप सुधाकर जी प्रेम और सौन्दर्य के सफल कवि हैं | ( पृ - 120 )  
अपने निष्कर्षों के समर्थन में वे सुधाकर की पंक्तियों और विद्वानों के मत प्रस्तुत करते हैं | ‘ बीन के तार ’ संग्रह में वे इसी तत्व को तलाशते हुए इसे प्रेम और सौन्दर्य की काव्यकृति कहते हैं | 
प्रो. दीनानाथ शरण भी इसी मत का समर्थन करते हुए कहते हैं –
प्रेम और सौन्दर्य सुधाकर के गीतकार के मुख्य वर्ण्य विषय हैं और जीवन के इन शाश्वत विषयों को उनकी गीत कला ने अद्भुत मार्मिकता दी है | अनगढ़ या अल्पगढ़ ‘ नई कविता ’ वालों के हाथों में पड़कर प्रसाद, पन्त, निराला द्वारा प्रवाहित हिंदी गीतिकाव्य के इस दमघोंट समय में सुधाकर जी के गीत मुझे छायावादी गीत-वैभव का स्मरण दिलाते हैं | ( पृ- 150 )
उनके प्रकृति चित्रण पर भी विद्वानों ने अपनी राय रखी है | डॉ. रामचरण महेंद्र लिखते हैं - 
" सुधाकर जी का शब्द चयन लाजवाब है | कोमल कर्ण- प्रिय शब्दध्वनि तथा सुकोमल प्रकृति सौन्दर्य से बरबस ध्यान आकृष्ट कर लेता है  | प्रकृति के अनेक व्यापारों को उन्होंने कविता में बाँधा है |"( पृ – 127 )
शंभुनाथ अरुणाभ कहते हैं - 
" कवि अपनी रचनाओं में ऐसे भाषिक उपकरणों और बिम्बों से प्रकृति को चित्रित करते हैं कि प्रकृति मानवीकृत और जीवंत हो उठती है | उनके काव्यों में प्रकृति जड़ रूप में नहीं, चेतन रूप में आई है | वे प्रकृति से निरंतर संवादरत हैं  | "( पृ – 107 )
कविवर पर छायावादी प्रभाव भी लगभग सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है | युगल किशोर प्रसाद इन पर छायावदी प्रभाव देखते हैं क्योंकि इनके गीतों में वियोग है, विरोधाभासी स्थिति है, मानवीकरण है | तारानन्दन तरुण इनके गीतों में प्रकृति का साम्राज्य मानते हैं और इन्हें प्रेम और विरह का कवि कहते हैं | ध्रुव नारायण सिंह राई उन्हें छायावाद की कड़ी मानते हुए लिखते हैं – 
सुधाकर इस धरती के चहेते गीतकार हैं | ये हमेशा जीवन के गीत गाते रहते हैं | विरह-मिलन, सुख-दुःख, प्रेम-अध्यात्म की चतुर्वेणी इनके गीतों में लहराती रहती है | इन्हें छायावादी कवियों की श्रृंखला की एक कड़ी कहा जा सकता है | ( पृ – 101 )
विनोद कुमार तिवारी जी का मानना है कि 
वैसे कवि सुधाकर के गीतों में छायावादी प्रवृति प्रचुरता में है, लेकिन भाषा में छायावादी कवियों की भांति संस्कृतनिष्ठ, अतिशय अलंकृत तथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म अभिव्यंजित न होकर सरलता, सहजता तथा तरलता सर्वत्र व्याप्त है | ( पृ - 110 )
इस प्रकार विनोद कुमार तिवारी इनके गीतों को छायावादी मानते हुए इन्हें उसके दोषों से मुक्त मानते हैं, इसी तरह युगल किशोर प्रसाद भी इनकी कविताओं को पलायनवादी या निराशावादी नहीं मानते अपितु इनमें जीवन की क्षणभंगुरता का संदेश है | 
सुबोध कुमार सुधाकर ने दोहे भी लिखे, लेकिन मूलतः वे गीतकार हैं | शंभुनाथ अरुणाभ उन्हें गीत का पर्याय कहते हैं | युगल किशोर प्रसाद इन्हें गीति-चेतना से संपन्न एक सफल कवि तथा गीतकार मानते हैं | उनका मानना है कि सुधाकर की गीति चेतना की उर्वर भूमि कोशी जनपद है | इनके गीतों का दायरा ' प्रेम और श्रंगार ' तक सीमित नहीं | इनमें तात्विकता के दर्शन होते हैं |  इनमें रस के फव्वारे हैं, जिससे पाठकों का तन-मन सराबोर हो उठता है | उन्होंने इनकी गेय परम्परा को रासो ग्रन्थों से जोड़ते हुए कहा है –
सुधाकर जी जैसे गेय काव्य के रचनाकार प्रचार-प्रसार से दूर क्षेत्र- विशेष में अपनी गेय कविताएँ की बांसुरी टेर रहे हैं | ( पृ – 190 )
उनकी तकनीक के बारे में वे महेंद्र मस्ताना की टिप्पणी देते है – 
गीतों में महादेवी की वेदना नहीं, मीरा का दर्द उभरकर आया है | टेकनीक के दृष्टिकोण से गीतों की परम्परा में यह एक नवीन कड़ी है | ( पृ – 153 )
डॉ. वन्दना वीथिका गीतों के आधार पर इनका मूल्यांकन करते हुए लिखती हैं – 
कवि सुधाकर जी ने अपनी भावना की राख पर जो आंसू बहाए हैं और वेदना की लेखनी से जो गीत लिखे हैं, वे निश्चित रूप से अमर रहेंगे | ( पृ – 177 )
डॉ. मोतीलाल शर्मा उन्हें संवेदनशील कवि मानते हैं | 
पुस्तकों पर दी गई कई टिप्पणियाँ भी बेहद महत्त्वपूर्ण हैं | ‘ बीन के तार ’ संग्रह को युगल किशोर प्रसाद ने प्रेम और सौन्दर्य की काव्यकृति कहा है | उनका मानना है कि गीत मस्तिष्क की रचना नहीं, हृदय का संगीत है | सपेरा जब बीन बजाता है, तो सांप फन फैलाकर झूमने लगता है | बीन की स्वर लहरी गूंजती है | ‘ क्यों किसी का साथ छूटे ’, ‘ बजती जब प्राणों की पायल, मन पंछी रोता तब घायल ’ को वे इस संग्रह के श्रेष्ठ गीत कहते हैं | समग्र रूप से वे इस संग्रह को गागर में सागर कहते हैं, जिसमें भाव, विचार और चिन्तन की त्रिधारा अवाध रूप से प्रवाहमान है | रामचरण महेंद्र इस संग्रह को प्रकृति के विविध रंगों के चित्रों का मोहक एल्बम मानते हैं | उद्दीपन के रूप में प्रकृति के वर्णन को देखकर उन्हें सूर की स्मृति ताजा हो जाती है | इसके काव्य सौन्दर्य की बात करते हुए वे इन गीतों की मिठास की बात करते हैं | प. मदनेश्वर झा कहते हैं – 
बीन के तार का कवि चिंतित नहीं | अपना यह सोने का बना साहस-निकेतन मन, तो है अपने जीवन को आलोकित कर सकता है | कवि जीवन के अभाव को जीवन का शोषक नहीं, पोषक मानता है | ( पृ – 123 )
दयानन्द जडिया ‘ अबोध ’ का मानना है कि इसमें श्रृंगार के संयोग और वियोग पक्ष का अच्छा निरूपण है | वे लिखते हैं – 
गीतों का प्राण तो नाद सौन्दर्य कहा जाता है, जो कृति के समस्त गीतों में सुरभित समीर के समान समाया हुआ है | बीन के तार पुस्तक के सभी गीतों वीणा की मृदुमय झंकार से सदृश मधुरता, मृदुलता, मोहकता, लयात्मकता, ध्वन्यात्मकता एवं प्रभावोत्पादकता समाविष्ट है या यों कहें कि सर्वत्र गुंजायमान है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी |( पृ – 134 )
मो. सुलेमान इस संग्रह को दिलकश फूलों की सुन्दरमाला कहते हैं | यह विरह-मिलन के गीतों का संग्रह है, जिसमें विरह का स्वर तीक्ष्ण और मर्मभेदी है | उन्हें इनके गीतों में कहीं रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीतों की झलक मिलती है तो कहीं बुल्लेशाह की वेदना और तड़प इनमें झांकती है |  
            ' खोल तरी पतवार ' के शीर्षक को देखकर युगल किशोर प्रसाद कहते हैं कि इसकी अर्थ-भाव-व्यंजना वस्तुत: एक आह्वान है | तारानन्दन तरुण इस कृति को शिल्प की दृष्टि से छायावाद के बहुत निकट मानते हुए कहते हैं - 
" खोल तरी पतवार प्रकृति का वह उपवन है, जिसमें फूल भी हैं और शूल भी हैं | विभिन्न फूलों की महक जब चतुर्दिक छाती है, तब अगजग को सुगंधमय तथा घायल बना देती है | ऐसे प्रकृति के विभिन्न रूपों को कविता में बाँधने की कला कवि सुधाकर की विशेषता है | ( पृ – 158 )
                        ' चल नदिया के पार ' गीत संग्रह का नाम मधुकर अष्ठाना को 90 के दशक की फिल्म ' नदिया के पार ' से प्रेरित मानते हुए इसके विषय पक्ष पर लिखते हैं - 
" इस संग्रह के गीतों में प्रणय, प्रेयसी एवं प्रकृति की त्रिवेणी कल-कल नाद करती हुई अपना संगम बनाती दृष्टिगोचर हो रही है | " ( पृ – 209 )
युगल किशोर लिखते हैं - 
" गीतकार सुधाकर की कविताएँ प्रौढ़ हैं, जो हृदयग्राही भी हैं | उनका मानस लोक-मानस के रूप में विकसित हो चुका है, जिसे आचार्य शुक्ल ने ' हृदय ' की संज्ञा दी है | "( पृ – 182 )
उनका मानना है कि इस संग्रह की कविताएँ प्रेमाकुल जीवन की भाव-विह्वल अनुभूतियों का सही और सुस्पष्ट रूपांकन हैं | कवि प्रेयसी को नेह-निमन्त्रण देता है | व्यथित हृदय की झांकी उपस्थित करता है और इन सबके आधार पर वे कवि को जीवनानुराग के सफल कवि मानते हैं | प्रो. दीनानाथ शरण इस संग्रह को पढ़ते हुए कवि को छायावादी भाव-धारा से प्रेरित मानते हैं | उनका मानना है कि टिपिकल रोमांटिक प्रवृति सुधाकर जी के गीतों की विशेषता है और कवि बच्चन की तरह चल पड़ता है, जहां कवि के गीतों में उमंग है, उल्लास है, उच्छ्वास के साथ-साथ आनन्दातिरेक भी है | डॉ. उपेंद्र प्रसाद राय इस संग्रह के गीतों को सूखी पलकों के प्रेम गीत कहते हैं | रेगिस्तान में ऐसे नखलिस्तान का अस्तित्व उन्हें आश्चर्यचकित करता है | कटु यथार्थ से भी कवि पलायन नहीं करता | वे लिखते हैं - 
" चल नदिया के पार  एक उत्तम काव्य कृति है | प्यार पाने और प्यार देने की सहज ललक, तज्जनित व्यथा की अंतर्धारा और शिल्पगत सौन्दर्य - ये सभी कारक इस संग्रह को श्रेष्ठ बनाते हैं |"  ( पृ – 189 )
                     तीन गीत संग्रहों के अतिरिक्त सुधाकर जी ने एक दोहा संग्रह भी लिखा है | दोहा विद्या में पदार्पण को युगल किशोर श्रेष्ठ और श्लाघ्य मानते हैं | उनका मानना है कि कवि के दोहे विविध रंगों के हैं | दोहाकार की पैनी दृष्टि जग-जीवन की प्राय: हर ज्वलंत समस्या पर है | 177 दोहों में वे गीतों के प्रति प्रेम को दिखाने से नहीं चूकते | युगल किशोर जी निष्कर्ष निकालते हैं कि ' जलद घिरे आकाश ' में संकलित अलग-अलग शीर्षकों के दोहे भाव-व्यंजना, प्रतीकात्मक और बिम्बात्मक हैं | मर्मस्पर्शी दोहों के लिए वे साधुवाद के पात्र हैं | प्रो. दीनानाथ शरण कवि के दोहों के बारे में लिखते हैं - 
" इस पुस्तक के दोहों को दोहाकार सुधाकर ने कई उपशीर्षकों में बांटकर प्रस्तुत किया है, जिनमें संयोग भी है और वियोग भी, अध्यात्म भी है और धर्म भी, सामाजिक बुराइयां भी हैं और राजनैतिक गंदगियाँ भी, उमड़ते बादल भी हैं और रिमझिम बारिश की फुहारें भी, होली के अरुण गुलाल भी हैं और रंगों की पिचकारी भी, हास्य के पुट भी हैं और व्यंग्य के छींटे भी | "( पृ – 198 )
                   कृष्ण स्वरूप शर्मा ' मैथिलेंद्र ' का मानना है कि उन्होंने दोहों की सृजना गीतों से ऊब कर की, लेकिन वे आगे लिखते हैं - 
" उनके दोहे मनभावन है | अध्यात्म, व्यंग्य, बाढ़-प्रकोप, अकाल आदि विषयों पर दिल खोलकर लिखा है, परन्तु कोसी की बाढ़ का विवरण अत्यंत मार्मिक है | पढ़ते-पढ़ते आंसू निकल आते हैं |( पृ – 205 ) 
राजभवन सिंह कहते है कि श्रृंगार, अध्यात्म, धर्म और राजनीति सभी विषयों पर इनके दोहे अच्छे बन पड़े हैं | उन्हें हर्ष है कि आज के गद्य युक्त कविता के दौर में सुधाकर जी ने कविता का झंडा दोहे लिखकर बुलंद किया है | 
              साहित्य की विधा कोई भी हो भाषा का विशेष महत्त्व है | डॉ. कामेश्वर पंकज लिखते हैं - 
" कवि की शब्द योजना बेजोड़ है | यह भावों को मृसणता प्रदान करती है | भाषा में कहीं रूखडापन नहीं है - शब्द योजना, वर्ण-मैत्री सभी का अनोखा प्रयोग हुआ है | यह कवि के काव्यात्मक बोध को दर्शाता है | "( पृ – 173 )
ध्रुव तांती का मानना है - 
" इनकी काव्य भाषा मानसिक व्यायाम करानेवाली नहीं, बल्कि सरस, सुबोध तथा प्रवाहमयी है | "( पृ – 113 )
               डॉ. राम कुंवर सिंह इनकी भाषा और भावों के बारे में लिखते हैं - 
" गद्य क्षेत्र में जिस प्रकार प्रेमचन्द भाषा, पात्र एवं सामाजिक परिवेश को अपने उपन्यासों में जोडकर उपन्यास सम्राट के पद पर बिठाए गए, उसी तरह कवि ने अपने गीतों की भाषा एवं भावों को ऐसा रूप दिया है, जो मानव जीवन की वास्तविकता एवं सहजता को व्यक्त करता है | "( पृ – 197 )
डॉ. वन्दना वीथिका इस बारे में लिखती हैं - 
" इनकी शब्द-सज्जा, भावों की गहराई, गीतों की लयात्मकता हमारे मन को बहा ले जाती है | "( पृ – 176 )
जबकि युगल किशोर कहते हैं - 
" मेरी दृष्टि में कविवर सुधाकर की कविताएँ शब्द-क्रीड़ा के साथ-साथ लीला-क्रीड़ा भी हैं, जो हर दृष्टि से सार्थक भी हैं और जीवन के लिए सर्वथा उपादेय भी |( पृ – 183 )
                 पुस्तक के अंतिम पृष्ठों पर पाठकों की ढेर सारी प्रतिक्रियाएं है, जो सुधाकर जी स्वीकार्यता पर मोहर लगाती हैं | सुधाकर जी के सम्यक मूल्यांकन के उद्देश्य से लिखी गई यह कृति अपने उद्देश्य में सफल है | यह न सिर्फ सुधाकर जी की सभी कृतियों की विशेषताओं को एक साथ पाठक के सामने रखती है, अपितु शोधार्थियों के कार्य को भी आसान करती है | संपादक द्वय इसके लिए बधाई के पात्र हैं | हालांकि अनीता जी का कोई आलेख नहीं, लेकिन संपादन के साथ-साथ प्रकाशन के कार्य में उनकी मेहनत इस कृति में झलकती है | समय-समय पर विभिन्न साहित्यकारों पर ऐसी कृतियों का प्रकाशन होता रहना चाहिए | 
दिलबागसिंह विर्क 
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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (13-05-2016) को "कुछ कहने के लिये एक चेहरा होना जरूरी" (चर्चा अंक-2341) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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