BE PROUD TO BE AN INDIAN

बुधवार, अक्तूबर 26, 2016

व्यंग्य के युगपुरुष हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई ने कहानियाँ, उपन्यास, संस्मरण, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ लिखी लेकिन उनकी ख्याति व्यंग्यकार के रूप में ही है और उन्हें व्यंग्य विधा को स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है । व्यंग्य शब्द की व्यंजना शक्ति से उपजता है और शब्द की तीनों शब्द शक्तियां अभिधा, लक्षण, व्यंजना शुरू से ही मौजूद हैं । परसाई से पूर्व और समकालीन साहित्यकारों ने भी व्यंजना शक्ति का प्रयोग किया लेकिन इन्हें ही व्यंग्य का जनक माना गया । जिस प्रकार प्रेमचन्द से पूर्व भी उपन्यास लिखे गए लेकिन प्रेमचन्द ने उपन्यास के क्षेत्र में ऐसे क्रांतिकारी बदलाव किए कि उपन्यास का जिक्र आते ही प्रेमचन्द का नाम आता है, वैसे ही व्यंग्य का जिक्र आते ही हरिशंकर परसाई का नाम उभरता है । परसाई ने न सिर्फ व्यंग्य के स्तर को उठाया, अपितु इसे स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित किया । 

                   हरिशंकर परसाई जी का जीवनकाल 1924 से 1995 ई. तक है । 1995 के बाद व्यंग्य के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग हुए हैं, अनेक ख्याति प्राप्त नाम उभरे हैं, लेकिन व्यंग्य को हरिशंकर परसाई की देन अमूल्य है और इस आधार पर व्यंग्य के क्षेत्र में उनकी कीर्ति सदा रहेगी ।
                 लेखक के रूप में उन्होंने कहानी- संग्रह – हंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे; उपन्यास – रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, ज्वाला और ज्वाला ; संस्मरण – तिरछी रेखाएं की सृजना की । निबन्ध और व्यंग्य संग्रह में उन्होंने तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, अपनी अपनी बीमारी, प्रेमचन्द के फ़टे जूते, माटी कहे कुम्हार से, काग भगौड़ा, आवारा भीड़ के खतरे, ऐसा भी सोचा जाता है, वैष्णव की फिसलन, पगडंडियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रद्धा का दौर, तुलसीदास चन्दन घिसैं, हम एक उम्र से वाकिफ हैं, की सृजना की । “ विकलांग श्रद्धा का दौर ” के लिए 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला जो  व्यंग्य के क्षेत्र में एकमात्र है । वे देशबन्धु अखबार में ‘ पूछिए परसाई से ’ कॉलम में पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते थे । साधारण सवालों से धीरे-धीरे उनसे गंभीर प्रश्नों का पूछा जाना उनके व्यक्तित  का ही नमूना है ।
                   वर्तमान में हास्य-व्यंग्य खूब प्रचलित है । हास्य-व्यंग्य के कवि सम्मेलन खूब तालियाँ बटोरते हैं, लेकिन इन कवि सम्मेलनों में प्रस्तुत कविताओं में हास्य अधिक होता है और व्यंग्य के नाम पर सिर्फ़ फूहड़ता या द्विअर्थी उक्तियाँ प्रस्तुत की जाती हैं । व्यंग्य अपने आप में गंभीर विषय है । परसाई की रचनाओं में यही गंभीरता मिलती है । ‘ एक मध्यवर्गीय कुत्ता’ लेख में कुत्ते की अहमियत आदमी से बढ़ जाने पर वे लिखते हैं –
“ माफ़ करें । मैं बंगले तक गया था । वहां तख्ती लटकी थी – कुत्ते से सावधान । मेरा ख्याल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं पर नेमप्लेट कुत्ते की टँगी दीखी ।”
यह शाश्वत सत्य है । कुलीन वर्ग में कुत्तों की अहमियत बढ़ी है । व्यंग्यकार की समाज पर पैनी दृष्टि होनी चाहिए, तभी वह जो घट रहा है, उस पर लेखनी चला सकेगा । परसाई ने तात्कालीन राजनीति पर प्रहार किए हैं  । विश्वनाथ प्रताप सिंह के बारे में उन्होंने लिखा कि जब उन्होंने आदर्शवाद के नशे में त्याग की बात की तब लगा कि इस बार मंत्री बनवाने के लिए यत्न करने होंगे लेकिन सत्ता मिलते ही सारे आदर्शवादी आपस में लड़ने लगे । उनका ये कथन भारत की राजनीति का अटल सच है –
“ हमारे देश में सबसे आसान काम आदर्शवाद बघारना है और फिर घटिया से घटिया उपयोगितावादी की तरह व्यवहार करना ।”
दिखावा भारतियों की सबसे बड़ी बीमारी है । झूठी शानो-शौकत पर उनका व्यंग्य देखिए –
“ मेरा ख्याल है नाक की हिफाज़त सबसे ज्यादा इसी देश में होती है । और या तो नाक बहुत नर्म होती है या छुरा बहुत तेज, जिससे छोटी-सी बात से भी नाक कट जाती है । ”
साहित्यकार की वास्तविक स्थिति से एक साहित्यकार परिचित होता है, साहित्यकार किस प्रकार के दंभ पालते हैं, इस पर की गई उनकी चोट देखिए –
“ सुबह की डाक से चिट्ठी मिली, उसने मुझे इस अहंकार से दिन भर उड़ाया कि मैं पवित्र आदमी हूँ, क्योंकि साहित्य का काम पवित्र काम है । दिन भर मैंने हर मिलने वाले को तुच्छ समझा । ”
‘ दस दिन का अनशन ’ व्यंग्य में वे अनशनकारियों की बखिया उधेड़ते हैं तो जन्म दिन की परंपरा पर मिलने वाले गिफ्ट के पीछे का सच बयान करते हैं । मुख्य अतिथि की दशा का उन्होंने बड़ा सजीव और व्यंग्यमय चित्र प्रस्तुत किया है –
“ यों उत्सव, स्वागत, सम्मान का अभ्यस्त हूँ । फूलमालाएं भी बहुत पहनी हैं । गले में पड़ी माला की ताकत जानता हूँ अगर शेर के गले में किसी तरह फूलमाला डाल दी जाए, तो वह भी हाथ जोड़कर कहेगा, मेरे योग्य सेवा ?”
समाज में व्याप्त बुराइयों को निष्पक्षता से देखना एक व्यंग्यकार के लिए जरूरी है । परसाई जी तथाकथित क्रांतिकारियों और आध्यात्मिकों पर प्रहार करते हैं । निंदा करने की बढ़ती प्रवृति को देखते हुए वे चुटकी लेते हैं –
“ निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं । निंदा खून साफ करती है,पाचन क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है । निंदा से मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं । निंदा पायरिया का शर्तिया इलाज है । संतों में परनिंदा की मनाही होती है, इसलिए वह स्वनिन्दा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं । ”
‘ प्रेमचन्द के फटे जूते ’ जैसे सुप्रसिद्ध व्यंग्य में वे प्रेमचन्द के फटे जूतों के माध्यम से समाज में साहित्यकार की दशा और व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए जितना कुछ कहते हैं, उससे कहीं ज्यादा अनकहा छोड़ते हैं, जो पाठक को सोचने पर विविश करता है । 15 अगस्त, 26 जनवरी की बात करते हुए उनका यह कहना कि ‘ भारत को चाहिए जादूगर और साधू’ भारतियों के अकर्मण्य और भाग्यशील चरित्र को उद्घाटित करता है । देश में फैला क्षेत्रवाद उन्हें दुखी करता है –
“ जनगण एक दूसरे से भिड़ रहे हैं । सब टूट रहा है । किस भारत भाग्य विधाता को पुकारें ? ”
वे सिर्फ व्यंग्य करके अपने कर्त्तव्य की इति श्री नहीं कर लेते अपितु कारणों की तह तक जाते हैं । ‘ आवारा भीड़ के खतरे’ निबन्ध में वे युवकों की हिंसक प्रवृति पर लिखते हैं –
“ युवक साधारण कुरता-पाजामा पहिने था । चेहरा बुझा था , जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फैंकते वक्त । शिक्षित था । बेरोजगार था । नौकरी के लिए भटकता रहा था । धंधा कोई नहीं । घर की हालत खराब । घर में अपमान, बाहर अवहेलना । वह आत्मग्लानि से क्षुब्ध । घुटन और गुस्सा एक नकारात्मक भावना । सबसे शिकायत । ऐसी मानसिकता में सुंदरता देखकर चिढ़ होती है । ”
             समाज के विद्रूप चेहरे पर तंज कसते नमूनों की भरमार है परसाई जी के साहित्य में । एक व्यंग्यकार के लिए जरूरी होता है कि उसके पास पारखी नजर हो । वो ऐसे तथ्यों को पहचाने जो शाश्वत हैं, जिन पर व्यंग्य करना जरूरी है । परसाई जी इसमें सिध्दहस्त थे । उन्होंने राजनीति, अन्धविश्वास, सामाजिक बुराइयों को पकड़ा और बड़ी शालीनता से उनको आईना दिखाया । जिन विषयों पर उनकी लेखनी चली वे आज भी प्रासांगिक हैं । मर्म को पकड़ना और उस पर प्रहार करना भी व्यंग्यकार के लिए जरूरी है, साथ ही चोट कितनी गहरी हो इसका तजुर्बा भी उसे होना चाहिए । शब्दों की मारक क्षमता का नियंत्रित प्रयोग ही व्यंग्यकार को व्यंग्यकार बनाता है, अन्यथा सच को कड़वे शब्दों में कहना बड़ा आसान है । परसाई जी के व्यंग्य और निबन्धों में भाषा का प्रयोग बड़ा नियंत्रित है । उनकी बातें कड़वे सच को बयां करती हैं मगर ये जख्म देने की बजाए होठों पर हल्की हंसी लाती हैं । पाठक सोचने को मजबूर होता है कि हम किस तरफ बढ़ रहे हैं । यही सफल व्यंग्यकार की पहचान है । हरिशंकर परसाई ने इस क्षेत्र में जो मापदण्ड स्थापित किए हैं वो आज भी कायम हैं और व्यंग्य को इन्हीं मापदंडों पर परखा जाता है । निस्संदेह हरिशंकर परसाई व्यंग्य के युगपुरुष हैं ।
*******
दिलबागसिंह विर्क

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

परसाई जी पर एक सुन्दर आलेख ।

Anil Sahu ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति.धन्यवाद!

Kavita Rawat ने कहा…


हरिशंकर परसाई जी को पढ़ना हर बार नया लगता है, लगता है जैसे अपने आस पास ही हम देख कर भी कुछ नहीं देख पा रहे हैं ...बहुत सुन्दर प्रस्तुति

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-10-2016) के चर्चा मंच "ये माटी के दीप" {चर्चा अंक- 2509} पर भी होगी!
दीपावली से जुड़े पंच पर्वों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...