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रविवार, अक्तूबर 16, 2016

" बेटी बचाओ, बेटी पढाओ " अभियान हेतु श्लाघनीय प्रयास

कृति - बेटी चालीस
कवि - राजकुमार निजात 
पुरुष और स्त्री जब जीवन रूपी गाड़ी के समान पहिए हैं तो बेटे-बेटी को भी समान महत्त्व दिया जाना चाहिए, लेकिन न तो स्त्री को समानता का दर्जा मिला और न ही बेटी को | कन्या भ्रूण हत्या के अपराध ने लिंगानुपात को भी प्रभावित किया है और यह बालिकाओं के प्रति समाज का घोर अन्याय भी है |

                       जब किसी को कम महत्त्व दिया जाता है या किसी को नकारा जाता है तब कवि, लेखक, बुद्धिजीवी वर्ग उसके लिए आवाज़ उठाता है | बेटी के लिए आजकल सोशल मीडिया पर अभियान जारी है और बेटी को बेटे से महान दिखाने वाली शायरी और उक्तियों की भरमार है , यथा - बेटे भाग्य से मिलते हैं तो बेटियाँ सौभाग्य से | यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, लेकिन इसमें वास्तविकता का अभाव है | वास्तव में तथ्यगत बातों का प्रचार होना ज्यादा जरूरी होता है | बेटी के बारे में यही नियम लागू होता है | बेटी और बेटा एक समान हैं और उन्हें समान महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए | ' बेटी को ही बेटा समझना ' - जैसे बहुप्रचलित नारों से भी परहेज होना चाहिए क्योंकि यह नारा भी हमारी उसी मानसिकता को दिखाता है कि महत्त्वपूर्ण तो बेटा है, लेकिन जब भगवान ने बेटा नहीं दिया तो हम बेटी को ही बेटा मान लेंगे | बेटी को बेटा माने जाने कि जरूरत नहीं अपितु बेटी मानते हुए ही उसे समानता का दर्जा दिया जाना चाहिए और वे तमाम अधिकार दिए जाने चाहिए जिसकी वह न्यायिक रूप से हकदार है और इसके लिए पीढ़ियों से रूढ़ियों में बंधे समाज को जागरूक किया जाना चाहिए | इस दृष्टिकोण से हरियाणा साहित्य अकादमी के सदस्य और प्रसिद्ध साहित्यकार ' राजकुमार निजात ' कृत " बेटी चालीसा " बेहद महत्त्वपूर्ण कृति है | 
                            इस कृति में कवि ने दोहा-चौपाई शैली को अपनाया है | शुरूआत में दो दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ और फिर दो दोहे हैं | पुस्तिका के अंत में एक गीत भी है | कवि शुरूआत में बेटी की महिमा का बखान करता है कि बेटी घर, गाँव और धरती का श्रृंगार है और वह जिस घर में जाती है, उसे स्वर्ग बना देती है | कवि अतीत में झांकते हुए गंगा, लक्ष्मीबाई, चंडी को याद करता है; द्रोपदी, सीता का प्रसंग उठाता है | वह बेटी के अनेक रूप दर्शाता है - 
बेटी, बहना, माँ होती है 
बेटी हर घर की ज्योती है |
लेकिन बेटी के भ्रूण को मारे जाने पर वह समाज को आगाह भी करता है - 
सुता बची तो जगत बचेगा 
इस बिन रचना कौन रचेगा | 
भ्रूण हत्या और ऑनर किलिंग को महापाप बताते हुए कन्या की सामान्य बच्चे की तरह देखभाल को जरूरी बताता है - 
हम बेटी को पालें पोसें 
कभी नहीं हक इसका खोसें |
टीकाकरण सभी हों पूरे 
बिन इसके सब काज अधूरे | 
कवि का इस प्रसंग को उठाया जाना बताता है कि बहुत से लोग जो भले ही कन्या भ्रूण हत्या का पाप नहीं करते, लेकिन कन्या के पालन-पोषण और पढ़ाई में बेटे की तुलना में कोताही अवश्य करते हैं | तभी तो वह कहता है - 
नहीं चलेगा कभी बहाना 
बड़ा ज़रूरी इसे पढ़ाना | 
                     कवि का मानना है कि बेटी को सम्मान देने और इसको आगे बढ़ने का अवसर देने पर वह नया इतिहास लिखेगी | कवि इसके हाथों में विश्व की डोर थमा देना चाहता है | अंतिम चौपाई में कवि इस चालीसा के लिखने का कारण बताता है - 
जब ' निजात ' को सुध बुध आई 
बेटी की यह कथा सुनाई | 
अंतिम दोनों दोहों में फिर बेटी के सम्मान का आह्वान है |
                     इस लघु पुस्तिका के अंत में एक गीत भी है - " सीधे खुदा के घर से आती हैं बेटियां " | इस गीत में बेटियों के उन गुणों का बखान है, जिनके कारण नारी को महान कहा गया है | कवि कहता है कि उसने यह चालीसा 30.06.2016 को मात्र तीन घंटे में लिखा और अनेक काव्य संग्रहों के रचयिता के लिए ऐसा करना कोई बड़ी नहीं, लेकिन इसे पुस्तक के रूप में लाकर निशुल्क वितरण करना बड़ी बात है | इतना ही नहीं इसे सिरसा के संगीतकार मुरारी वर्मा द्वारा संगीतबद्ध किया गया और सिरसा की उभरती युवा गायिका सिमरन की आवाज में गाया भी गया, जो यू-ट्यूब पर उपलब्ध है | " बेटी बचाओ, बेटी पढाओ " अभियान में राजकुमार निजात जी का यह प्रयास सचमुच अनूठा और श्लाघनीय है | 
दिलबागसिंह विर्क 
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2 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (19-10-2016) के चर्चा मंच "डाकिया दाल लाया" {चर्चा अंक- 2500} पर भी होगी!
करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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