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बुधवार, अक्तूबर 05, 2016

नैतिकता का पाठ पढ़ाता अनूठा संग्रह

पुस्तक - प्रेरक, अर्थपूर्ण कथन एवं सूक्तियाँ 
लेखक - हीरो वाधवानी 
प्रकाशन - राघव पब्लिशर्स 
पृष्ठ - 144 ( पेपरबैक )
कीमत - 300 / - 
सोचना हर आदमी का स्वभाव है | ज्ञान और अनुभव से आदमी विचारशील बनता है | जीवन क्या है, यह कैसा होना चाहिए, इसका लक्ष्य क्या है, जैसे सवाल हर विचारवान व्यक्ति के मस्तिष्क में उथल-पुथल अवश्य मचाते हैं | धर्म, मानवता, समाज को लेकर भी व्यक्ति सोचता है  | कुछ लोग इसकी चर्चा अपने साथियों से कर लेते हैं तो कुछ इनकी अभिव्यक्ति के लिए साहित्यिक विधाओं का सहारा लेते हैं | हीरो वाधवानी ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए सूक्तियों का सहारा लिया है | महापुरुषों के कथन, जैसे विदुर, चाणक्य, महात्मा गांधी के विचार हमने अक्सर इस रूप में पढ़े हैं लेकिन सामान्यत: कोई लेखक इस रूप में अपने विचार कम ही प्रकाशित करता है | हीरो वाधवानी की पुस्तक " प्रेरक, अर्थपूर्ण कथन एवं सूक्तियां " इस दृष्टिकोण से अनूठा संग्रह है |
  
                        इस संग्रह में लेखक ने अनेक पक्षों पर अपनी राय दी है | जीवन के बारे में हर विचारवान व्यक्ति सोचता है | वाधवानी जी ने भी इस विषय पर अपना मत रखा है -
जीवन क्या है ? खेल के समान है | खेल में हम भले ही हार जाएं, लेकिन तैयारी हमें जीतने जैसी करनी चाहिए |
एक तरफ वे जीवन को खेल मानते हैं तो दूसरी तरफ इसकी नश्वरता को भी स्वीकारते हैं - 
समझना चाहा जिंदगी क्या है ? 
हाथ में था शीशा गिरा और टूट गया,
समझा जिंदगी क्या है |
जीवन के साथ-साथ महत्वपूर्ण होता है जीना | जीने के तरीके के लिए वे एक उदाहरण द्वारा अपनी बात कहते हैं - 
केला छीलकर खाना इंसान को भी आता है | बन्दर को भी, लेकिन केला छीलकर छिलके को कहाँ फेंकना है, यह इंसान को आता है, बन्दर को नहीं | 
जीवन में धर्म की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है | धर्म के प्रति उनका नजरिया सामान्य से हटकर है - 
जो परिश्रम, प्यार और सेवा करता है, वह आस्तिक है बाकी बस नास्तिक हैं | 
धर्म है तो पूजा और प्रार्थना की बात भी होगी और जैसा नजरिया धर्म केर प्रति है, वैसा ही कुछ इनके प्रति भी है - 
प्रार्थना पूजा से बढ़कर है क्योंकि वह हृदय से निकलती है और बिना तामझाम के होती है |  
वे जीवन के साथ-साथ मृत्यु को भी धन्यवाद देते हैं - 
आभार मृत्यु, आप हमें जन्म से लेकर मृत्यु तक का समय देती हो, इतना समय हमें और कोई नहीं देता | 
दुःख-सुख जीवन के अंग हैं, इसलिए इन पर भी उनका चिन्तन स्वाभाविक है - 
दुःख और सुख का कारण खुद का विचार और व्यवहार है |
लेकिन वे आशावादी हैं और दुःख से दुखी होने के विरोधी हैं - 
दुःख में दुखी होने का मतलब है - दुःख का दासत्व ग्रहण करना | 
                   मनुष्य अक्सर अपनी मनोवृतियों का गुलाम होकर रह जाता है | लेखक ने सभी मनोवृतियों पर अपने विचार रखे हैं | वे इस बात को आश्चर्यजनक और सत्य मानते हैं कि - 
एक ईर्ष्या ही है जो बिना किसी कारण के की जाती है | 
इसे वे बेहद भयानक मानते हैं - 
ईर्ष्या की आग बारूद में लगी आग से अधिक बड़ी और भयानक होती है क्योंकि बारूद की आग तो बुझ जाती है, लेकिन ईर्ष्या की आग कभी नहीं बुझती | 
ईर्ष्या करने वाले के बारे में वह लिखते हैं - 
ईर्ष्यालु अंधा होता है जिससे ईर्ष्या करता है उसके परिश्रम व् प्रयत्नों को नहीं देखता है | 
हालांकि भगवान ने आदमी को ईर्ष्या से बचना चाहा होगा - 
ईश्वर की कैसी सुंदर योजना है | हम एक दुसरे से ईर्ष्या न करें इसलिए उसने हमारे जैसा और कोई नहीं बनाया है | 
ईर्ष्या के अतिरिक्त अहंकार मनुष्य का बड़ा दुश्मन है | इस बारे में लेखक कहता है - 
ईश्वर सब कुछ कर सकता है, केवल एक काम नहीं कर सकता - वह अहंकारी को अधिक समय तक जीवनदान नहीं दे सकता | 
अहंकार एक ऐसी बुराई है, जो सभी चीजों पर पानी फेर देती है - 
बुद्धि हो, बल हो और हो धन अपार 
मन में अहंकार आया तो सब कुछ है बेकार |
अहंकार की तरह ही घृणा भी घातक है -
संभव को असंभव कौन करती है ?
घृणा 
चिंता, क्रोध, लालच आदि के बारे में भी उनकि सूक्तियां महत्त्वपूर्ण हैं | उनका कहना है - 
चिंता और क्रोध में बिताए गए एक घंटे की भरपाई एक वर्ष में भी पूरी नहीं होती | 
कहते हैं चिंता चिता समान होती है, कुछ ऐसा ही लेखक कहता है - 
हंसी, ख़ुशी और मुस्कराहट उस समय साथ छोड़ देती है जब इंसान चिंता, क्रोध करता है | 
क्रोध की तुलना वे चाकू से करते हैं - 
क्रोध चाकू के समान होता है, जो जोड़ने का नहीं काटने का काम करता है | 
क्रोध और अहंकार हमें छोटा करता है - 
क्रोध और अहंकार कर हम अपने को छोटा और दुसरे को बड़ा बना लेते हैं |
वे लोभ-लालच को सबसे बुरा मानते हैं - 
इंसान बुरा कुछ अहंकार के कारण, कुछ गलत धारणाओं और सोच के कारण और बहुत अधिक लोभ-लालच के कारण बनता है | 
ये मनोवृतियाँ बुरी हैं इसके लिए वे बच्चे से आदमी की तुलना करते हैं - 
नन्हें से बच्चे इसलिए प्यारे लगते हैं, क्योंकि वे अहंकार और अन्धविश्वासी नहीं होते | 
वे निष्कर्ष भी निकालते हैं - 
लोभ, क्रोध, मद ईर्ष्या और अहंकार को छोड़ने के पश्चात यह निश्चित है कि आपके शत्रुओं की संख्या कम होगी |
लेखक ने प्रकृति के तत्वों के आधार पर अनेक मत प्रस्तुत किए हैं | चन्द्रमा सादगी का प्रतीक है - 
सादगी वाला चन्द्रमा सात रंग वाले सूर्य से अधिक सुंदर व आकर्षक होता है |
यही सादगी उसे महान बनाती है - 
चन्द्रमा महान क्यों है ? क्योंकि वह सूर्य से प्रकाश लेकर भी सूर्य की भांति गर्म न होकर शीतल रहता है और शीतलता प्रदान करता है |
समुद्र में दीवारों का न होना उसे महत्त्वपूर्ण बनाता है - 
समुद्र हमेशा भरा होता है, वह इसलिए कि उसमें कुओं और तालाबों की तरह दीवारें नहीं होती | 
समुद्र और नदी स्त्री-पुरुष का रूपक है - 
समुद्र पुरुष है, नदियाँ नारी, नारी के साथ और सहयोग बिना समुद्र और पुरुष दोनों बड़े और शक्तिशाली नहीं बन सकते | 
सहयोग का महत्त्व दर्शाते हुए लेखक लिखता है - 
अनेक नदियों के साथ, सहयोग और प्यार से बना सागर कभी नहीं सूखता | 
पेड़ों में वह अच्छे इंसान की छवि देखता है - 
अच्छे इंसान पेड़ की तरह होते हैं, सबके काम में आते हैं |
साथ ही वह पेड़ों के महत्त्व को भी प्रतिपादित करता है - 
एक पेड़, पचास वरदानों के समान है | 
जब एक पेड़ का इतना महत्त्व है तो यह कहना तो उचित ही है - 
हरे-भरे उद्यान आधे स्वर्ग के समान हैं |
पेड़ का महत्त्व तभी तक है जब वह जड़ से जुदा है, यही बात आदमी पर भी लागू होती है - 
जड़ों से जुदा होने वाला पेड़, पेड़ नहीं रहता काठ हो जाता है | 
                लेखक ने चींटी और हाथी के रूपक से महत्त्वपूर्ण सूक्तियां कही हैं | 
छोटी-सी चींटी अपना घर बना लेती है और समर्थ व शक्तिशाली हाथी उदासीनता के कारण बिना घर के रह जाता है |
चींटी लेखक के लिए परिश्रम का प्रतीक है | 
चींटी की आयु एक वर्ष होती है, एक और वर्ष जीने के लिए वह प्रार्थना नहीं करती | रात और दिन काम करके वह स्वयं ही उसे दो वर्ष का बना देती है | 
लेखक परिश्रम का कट्टर समर्थक और आलस्य का घोर विरोधी है | वह कहता है - 
आलस्य सफलता और समय का दुश्मन है |
आलसी को वह अपराधी के समकक्ष रखता है - 
आलसी भी अपराधी होता है क्योंकि वह अपने शरीर से हाथों पावों को अलग कर लेता है | 
परिश्रम का महत्त्व दर्शाता हुआ वह कहता है - 
अधिक परिश्रम करने से शरीर मजबूत होता है | वह गलत, घिसता और टूटता नहीं | 
वह परिश्रम को मनोरंजन की तरह लेने का पक्षधर है -
बहुत अधिक परिश्रम करने के बाद भी वह इंसान नहीं थकता जो परिश्रम को मनोरंजन समझता है | 
इसके लिए वह चींटियों का उदाहरण देता है - 
चींटियाँ स्वस्थ और जवान रहती हैं क्योंकि वे काम को बोझ नहीं समझती और चिंता नहीं करती | 
परिश्रम आदमी को अनेक रोगों से मुक्ति दिलाता है - 
खून पसीना एक करके अपना पेट पालने वाला चार बड़ी बीमारियों - आलस्य, अकेलापन, बेचैनी और अनिद्रा से मुक्त होता है | 
चींटी के अतिरिक्त वह सूर्य, चन्द्रमा की नियमितता को भी उनका परिश्रम मानता है - 
रात और दिन, सूर्य और चन्द्रमा के परिश्रम और सेवा का परिणाम है | 
वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि - 
परिश्रम सभी समस्यायों का हल है |
वह भाग्यवाद पर विश्वास नहीं करता अपितु उसका मानना है - 
भाग्य क्या है ? प्रयत्नों का परिणाम | 
                अमीरी-गरीबी भी उसके चिन्तन का विषय बनती है | वह इस कडवे सच से वाकिफ है - 
गरीब के लिए सारा जग सौतेला है |
लेकिन उसकी नजर में अमीरी का अर्थ अलग है - 
अमीरी वह नहीं जिसके पास धन है, अमीर वह है जिसके मुख पर मुस्कान, जबान में मिठास, मन में शान्ति और शरीर में शक्ति है |
आदमी की आदतें उसका स्थान निर्धारित करती हैं | शब्द सबसे महत्त्वपूर्ण हैं -
अच्छे शब्द कहना गुलाब जल छिडकने के समान हैं, और बुरे शब्द कहना चिंगारी फेंकने के समान हैं | 
बुरे शब्दों की तुलना वह कांच से करता हुआ कहता है -
बुरे शब्द कांच की तरह होते हैं, चुभते और घाव करते हैं |
इसके विपरीत -
मीठा बोलना मिश्री बांटने के समान है | 
वह दोगलेपन का विरोधी है -
जिसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है, वह आधे संत के समान है | 
मित्र और साथ को महत्त्वपूर्ण मानता है | संगत के प्रभाव को स्वीकार करता है - 
यदि आपका मकान खूबसूरत झरने के पास है तो आपके मकान का मूल्य दुगना होगा और गंदे नाले के पास है तो आधा | 
            पत्नी, माँ, बेटी और औरत के महत्व को स्वीकारता है | उसका मानना है - 
एक अच्छी पत्नी सौ मित्रों के समान होती है | 
माँ का दर्जा उसकी नजरों में बहुत ऊँचा है - 
माँ औरत नही फरिश्ता होती है | 
वह औरत के महत्त्व को भी स्वीकारता है - 
औरत पुल के समान होती है | सीमा में बंधी होने के बाद भी असाधारण कार्य करती है | 
वह बेटी को बेटों से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हुए लिखता है - 
बेटा माँ की आँखों का तारा है और बेटी तारा और रौशनी दोनों | 
                     वह अमन पसंद है और जंग का विरोधी है | उसका मानना है कि - 
जंग एक बार शुरू होने के बाद फिर कभी खत्म नहीं होती |
वह शरीर की बनावट से निष्कर्ष निकालता है - 
हम कम कहें और अधिक सुनें इसलिए परमात्मा ने हमारा मुख अक्सर बंद और कान सदैव खुले रखे हैं | 
                         पुस्तक में फिलिपीन्स के बारे में जानकारी भी है, विद्वानों के प्रति राय भी है | कविता लघुकथा शीर्षक से भी कहने का प्रयास किया गया है लेकिन वे सब भी सूक्तियां ही अधिक हैं | नैतिकता का अनूठा संदेश दिया गया है, हालांकि सीधे-सीधे उपदेश कभी-कभी हजम नहीं होते, लेकिन अगर विदुर नीति और चाणक्य नीति को पढ़ा जा सकता है तो हीरो वाधवानी को क्यों नहीं ? मनीला में रहते हुए हिंदी में लिखना अपने आप में सराहनीय है और अगर इन तमाम सूक्तियों में से कुछ को ही जीवन में अपनाया जाए तो जीवन सुधर सकता है | इस दृष्टिकोण से लेखक का प्रयास सराहनीय है |
दिलबागसिंह विर्क 
*****

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-10-2016) के चर्चा मंच "जुनून के पीछे भी झांकें" (चर्चा अंक-2488) पर भी होगी!
शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर अमूल्य संकलन है
हीरो वाधवानी जी को हार्दिक बधाई!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर

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