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रविवार, नवंबर 08, 2015

रचनाधर्मिता का अलग नजरिया - नरेंद्रकुमार गौड़

युवा रचनाकार दिलबाग सिंह विर्क अनेक साहित्यिक विधाओं के सक्रिय साहित्यकार हैं किन्तु कविता के माध्यम से अपनी बात सशक्त ढंग से कहने में इन्हें महारत हासिल है | समीक्ष्य कृति '  महाभारत जारी है ' से पहले भी इनके पांच कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं | हिंदी साहित्य जगत में सबसे अधिक कविता संग्रह ही प्रकाशित हो रहे हैं किन्तु ऐसा बहुत ही कम होता है कि कोई कविता संग्रह पढकर पाठक को महसूस हो कि हाँ मैंने कुछ पढ़ा है | दिलबाग सिंह विर्क के इस कविता संग्रह को पढ़कर ऐसा ही महसूस होगा कि हाँ मैंने कुछ पढ़ा है | पाठक के मन-मस्तिष्क को भरपूर पौष्टिक खुराक देने वाली कविताओं का संकलन है ' महाभारत जारी है ' | 

                     पुस्तक का प्रथम पृष्ठ खोलकर जब पाठक देखता है कि लेखक ने यह पुस्तक ' सामर्थ्यवान लोगों की बेशर्म चुप्पी के नाम ' समर्पित की है तो वह एक बार तो वहीँ ठिठक कर रह जाता है | पाठक लेखक के इस समर्पण को भीतर तक महसूस करता है और कविताएँ पढने के लिए विवश हो जाता है | 58 छंद-मुक्त कविताओं के सद्य प्रकाशित संकलन को लेखक ने दो भागों में बांटा है | प्रथम खंड कि 50 कविताओं में लेखक ने सामाजिक, राजनैतिक और पारिवारिक रिश्तों की जमीन पर अपनी कविताओं को धरातल प्रदान किया है तथा दूसरे खंड की 8 कविताओं में महाभारत के पात्रों के माध्यम से एक अलग नजरिया किया है | 
                  लेखक ने कलम की ताकत का अहसास एक अलग ही ढंग से कराया है, देखिए -
हमें तो करनी है 
विचारों की खेती 
क्योंकि 
बंदूकें तो 
कभी-कभार लिखती हैं 
विचार अक्सर लिखते हैं 
परिवर्तन की कहानी |
आज के इस भौतिक युग में रिश्ते संभाल कर रखना कितना कठिन हो गया है, इस बात के लिए लेखक अत्यंत चिंताग्रस्त दिखाई देता है | देखिए -
रिश्तों की फ़सल 
यूँ ही नहीं लहलहाती 
तप करना पड़ता है
किसान की तरह |
इंसान अपनी देह के बाहरी सौन्दर्य को चिर बनाए रखने के लिए न जाने क्या-क्या जतन करता है किन्तु अपने मन के सौन्दर्य को संवारने का तनिक भी प्रयास नहीं करता है | इसके लिए लेखक गंभीर दिखाई देता है | 
काश ! 
हम ध्यान दे पाते
मन की सुन्दरता पर 
ठीक वैसे ही 
जैसे देते हैं ध्यान 
बाहरी रूप-सज्जा पर 
शर-शैय्या पर लेटे भीष्म के मन का अन्तर्द्वन्द्व शब्दों के माध्यम से बखूबी उकेरा है कविता आत्ममंथन में | देवव्रत से भीष्म पितामह बनने तक के सफर में उससे कहाँ गलती हुई ? भीष्म के इसी चिन्तन को लेखक ने अपनी कविता के माध्यम से पाठकों के समक्ष रखा है | शांतनु का ज्येष्ठ पुत्र 
गंगा-नन्दन भीष्म 
शर-शैय्या पर पड़ा 
कर रहा है इन्तजार 
मृत्यु का 
और झाँक रहा है 
अपने अतीत में 
संकलन की कविता ' महाभारत जारी है ' के द्वारा लेखक ने महाभारत के पात्रों के चरित्र को लेकर करार व्यंग्य किया है | लेखक ने इसी कविता के शीर्षक को संकलन का नाम भी दिया है | आज भी हमारे समाज में दुर्योधन, दुशासन, शकुनी, द्रोण, भीष्म, शांतनु, कृपाचार्य और धृतराष्ट्र जैसे लोग हैं जो अपनी हरकतों से समाज की जड़ों को खोखला कर रहे हैं |
फिर कैसे कहूँ
महाभारत सिर्फ़ एक घटना है 
द्वापर युग की
महाभारत तो जारी है आज भी 
पहले से कहीं विकराल रूप में |
इसके अलावा संग्रह में हौआ, वापसी, आंसू, अपाहिज, दोषी हम भी हैं, पतंग के माध्यम से, शब्द-बाण, बिटिया, कन्यादान, गुरुदक्षिणा, पलायन, गांधारी दर्शन, चीरहरण, अर्जुन की मौत आदि भी नए कलेवर और नए फ्लेवर की कविताएँ हैं | पुस्तक का आवरण सटीक एवं आकर्षक बन पड़ा है | - नरेंद्र कुमार गौ 
यह कविता-संग्रह आप निम्न स्थानों से ऑनलाइन खरीद सकते हैं - 
  1. Redgrab
  2. eBay
  3. Amazone
आपकी प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा 
धन्यवाद  
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4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर !

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.11.2015) को "दीपों का त्योंहार "(चर्चा अंक-2156) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

Kavita Rawat ने कहा…

नरेंद्र कुमार गौड़ जी द्वारा "महाभारत जारी है" की सार्थक समीक्षा प्रस्तुति हेतु आभार...
आपको हार्दिक बधाई ..दीप पर्व की हार्दिक शुभकामना सहित

Asha Saxena ने कहा…

बढ़िया समीक्षा पुस्तक की |दीपावली पर हार्दिक शुभ कामनाएं |

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