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बुधवार, अक्तूबर 07, 2015

ख़ुद से अनजान न होने का उदघोष करता कविता-संग्रह

पुस्तक - मैं अनजान नहीं
कवयित्री - मीनाक्षी आहुजा
प्रकाशन - बोधि प्रकाशन, जयपुर
पृष्ठ - 120
मूल्य -  150 /-
" मैं अनजान नहीं " मीनाक्षी आहुजा की दूसरी काव्य कृति है । इससे पूर्व वे " रेत पर बने पदचिह्न " नामक काव्य कृति से साहित्य की जमीन पर अपने पदचिह्न स्थापित कर चुकी हैं और यह संग्रह उस छाप को और गहरा करता है । इस संग्रह में 99 कविताएँ हैं और कवयित्री ने लघु आकार की कविताएँ अधिक रखी हैं, जो अपने भीतर गहरे अर्थों को समेटे हुए हैं ।

                        पुस्तक का शीर्षक अपने आप में बहुत कुछ कहता है । साहित्य जगत में जब भी कोई साहित्यकार प्रवेश करता है तो निश्चित रूप से वह आत्मविश्वास से उस कद्र लबरेज़ नहीं होता जैसे की कोई स्थापित साहित्यकार । इसके अतिरिक्त सच का सामना भी परिस्थितियों से रू-ब-रू होकर ही हो पाता है । पुस्तक का शीर्षक इसका संकेत करता है कि कवयित्री ने अपने अनुभवों से सीख ली है और वह अब अनजान नहीं । इसी शीर्षक की कविता को देखें तो ये पंक्तियाँ बहुत कुछ कहती हैं 
कभी किसी सवाल ने
मुझे हैरान नहीं किया ।  
( पृष्ठ - 106 )
इसी कविता की अंतिम पंक्तियाँ कवयित्री की अदम्य जिजीवषा का मुँह बोलता प्रमाण है -
दर्द में जीने की लगन ने / 
खुद से मुझे अनजान नहीं किया । ( पृष्ठ - 106 )
कवयित्री का आत्मविश्वास जगह-जगह पर सिर चढ़कर बोलता दिखता है । कविता ' कायम ' में तो वे स्पष्ट लिखती हैं -
दावा नहीं करती / दुनिया बदलने का                        
पर / स्वयं रहूँगी कायम 
ज़िन्दगी के साथ / अपने मूल्यों पर 
जीने का जो / वा'दा है किया  ( पृष्ठ - 44 )     
साथ ही वह आशावादी सोच को पूरी तरह से पकड़े हुए हैं -
बीज बोयेंगे सच के / तोपेड़ ज़रूर बनेंगे  
वक़्त आने पर ( पृष्ठ - 26 )               
कवयित्री इस आत्मविश्वास को किश्ती की जिद्द के रूप में भी देखती है, जो तूफानों से टकराकर स्वयं को बचाती हुई किनारे पर ज़रूर पहुंचेगी ।                                              स्त्री-पुरुष संबन्ध हर रचनाकार का ध्यान खींचते हैं और एक कवयित्री स्त्री की दशा, पुरुष की उसके प्रति सोच को बेहतर तरीके से समझ सकती है । मीनाक्षी की कविताएँ इस तथ्य को और अधिक पुष्ट करती हैं । उनका मानना है कि स्त्रीवादी और पुरुषवादी सोच ने आदम-हव्वा के पवित्र रिश्ते को कलंकित किया है । साथ ही वे औरत की बेबसी को बड़ी शिद्दत से महसूस करती हैं -
क्यों वह सब हार कर भी 
कभी जीत नहीं पाती / एक घर को ( पृष्ठ - 18 )              
एक लड़की की तुलना वह नटनी से करती हैं जो ढोल की थाप संग अनुशासन की रस्सी पर चल रही है । यही दुःख उन्हें खुदा से प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है -
तोड़ सकेगी / नादान 
तारे आसमान के ? ( पृष्ठ - 23 )       
लेकिन वह सिर्फ दुखी ही नहीं अपितु वह पुरुष की सत्ता को ललकारती भी है - 
पुरुष ! / तुम अनादि तो नहीं / 
न अनन्त है / तुम्हारी गाथा ( पृष्ठ - 34 )          
लेकिन पुरुष पिता भी होता है, इसका अहसास भी कवयित्री को है । पिता को समर्पित उनकी यह पंक्तियाँ देखिए -
पिता का साया होता है / सुरक्षित घर-सा
जिसमें जीवन होता है / बेफिक्र निडर-सा ( पृष्ठ - 43 )       
पिता के पास एक बेटी जहाँ सुरक्षित महसूस करती है, वहीं माँ पर उन्हें यकीन है कि वह उसे संभाल लेगी -
तुम समेट लोगी / मुझे है यकीन 
ए माँ / जब भी बिखर जाती हूँ ( पृष्ठ - 47 )              
बेटी माँ-बाप के पास सुरक्षित है लेकिन बेटी का होना माँ के लिए समस्या है । कवयित्री कहती है कि बेटी को जन्म देना औरत का गुनाह है और उस लड़की का बेबाक होना माँ को और अधिक गुनहगार बना देता है । कवयित्री की शिकायत है कि लड़की के साहस को कोई नहीं देखता कि कैसे वो अपरिचित से बंधकर, जीवन को जोखिम में डालकर नव जीवन को जन्म देने जैसी अनेक मुश्किलों से निपटती है । समाज उसे सुंदर घर तो देता है लेकिन घर में कैद भी कर लेता है -
यहाँ / बन्द खिड़कियाँ / सुंदर पर्दे 
कुछ बता ही नहीं पाते / बाहर का हाल ( पृष्ठ - 87 )       
स्त्री का जीवन व्यस्तता का पर्याय बन चुका है, इसे उन्होंने बड़ी बखूबी से बयान किया है -
पूरी हो गई / गर्मी की छुट्टीयाँ
धोते हुए कपड़े / पकाते हुए रोटियाँ ( पृष्ठ - 85 )              
लेकिन इन सबके बावजूद नारी की गरिमा कम नहीं आंकी जा सकती । नारी की महानता को वह दूब के प्रतीक से व्यक्त करती हैं -
जी उठती हूँ / बार-बार / जरा-सा नेह
कर देता है मुझे / फिर से हरा ( पृष्ठ - 78 )               
कवयित्री का ध्यान सिर्फ़ नारी-पुरुष संबंधों और स्त्री की दशा पर ही है, ऐसा नहीं है । एक जागरूक कलाकार की भाँति उनकी दृष्टि सम-सामयिक हालातों पर भी है और इन विषयों पर उनकी लेखनी खूब चली है । जीवन दर्शन पर विचार करते हुए वे जीवन की नश्वरता पर लिखती हैं - 
यही तो है / जीवन के सफ़र की रीत 
जो आता है / एक दिन / जाता है बीत ( पृष्ठ - 49 )             
बसन्त और पतझड़ के माध्यम से वे पुराने रस्मों-रिवाजों पर प्रहार करती हैं -
ज़रूरी है / नव सृजन से पहले
पुरातन का विखण्डन ( पृष्ठ - 30 )         
परिंदों को आधुनिक मनुष्य का प्रतीक मानते हुए ' सुख में सब साथी, दुःख में न कोय ' को उन्होंने परिंदों के माध्यम से कहा है -
आदत है परिंदों की / सिर्फ़ अपने आराम
अपनी भूख / और 
अपनी परवाह करने की ( पृष्ठ - 24 )
नए दौर पर ये व्यंग्य देखिए -
वासना को लोग / कहते हैं रोमांस ( पृष्ठ - 59 )         
नई कविता को महज मोबाइल का सन्देश कहकर यहाँ उन्होंने कवियों पर प्रहार किया है, वहीं कवि की दुविधा का भी बखूबी बयान किया है - 
पूरा सच लिखा / तो / कड़वा होगा /
और / आधा झूठ / कविता का /
दम घोंट देगा ( पृष्ठ - 51 )           
वक़्त की अहमियत तो उन्होंने इस संग्रह की प्रथम कविता में ही स्पष्ट कर दी है । पानी का आँसू, जीवन और मोती में बदल जाना वक़्त पर निर्भर है -
देखा / कैसे बदल जाती है 
पैमाइश / वक़्त-वक़्त की बात है ( पृष्ठ - 9 )                  
कविताओं के शिल्प पक्ष की बात करें तो मुक्त छंद की ये कविताएँ प्रवाह लिए हुए हैं । भाषा सरल, सहज और भावानुकूल है । आम प्रचलन में आए देशज, विदेशज शब्दों का प्रयोग उन्होंने किया है,  जैसे - वक़्त, चद्दर, फाइबर, नसीहत, कोरी आदि । हिंदी कविता में कैफियत, हर्फ़ जैसे कम प्रचलित उर्दू शब्दों को रखने पर भी कहीं भी उनकी भाषा बनावटी नहीं लगती । कवयित्री ने न सिर्फ़ उर्दू शब्दों को अपनाया है अपितु इस भाषा की समास शैली का भी प्रयोग किया है, जैसे - फासला-ए-तहज़ीब । आत्मकथात्मक, संबोधनात्मक शैली का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है । संबोधन के कुछ नमूने -
ए माँ !
ए ख़ुदा !
पुरुष !
बाबरे !
शुक्रिया दोस्त !         
 प्रतीक, बिम्ब, अलंकार कविता को निखारते हैं । " मैं अनजान नहीं " संग्रह में इनका प्रयोग सहज और स्वाभाविक रूप से हुआ है । गवाह, वजूद शीर्षक कविताएँ मानवीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण हैं ।प्रश्न अलंकार भी बड़ा मुखरित है -
1. कैसा रिश्ता है / आँसुओं का / आँखों से
( पृष्ठ - 15 )
2. विजयी कौन / मैं / या / वो ? ( पृष्ठ - 66 )
3. कैसा होता है साहस / एक लड़की में ???
 ( पृष्ठ - 107 )       
रूपक, उपमा ( सूखे पत्ते-सा मन, कागज की कश्ती-सी ज़िन्दगी ) जैसे अर्थालंकार और अनुप्रास, पद-मैत्री ( आस-पास, वक़्त-बेवक़्त ), पुनरुक्तिप्रकाश ( भरे-भरे, कभी-कभी, बार-बार, जब-जब ) आदि शब्दालंकार कविताओं की शोभा बढ़ाते हैं । ' नव सृजन से पहले ' कविता में उल्लेख अलंकार कविता को चार चाँद लगा रहा है - 
किलकारी बिना आँगन
गीत बिना कोयल
पिया बिन विरहन ( पृष्ठ - 30 )          
कवयित्री ने दूब को स्त्री के प्रतीक के रूप में माना है । दृष्य बिंब ( कविता - खेल ),श्रव्य बिंब ( कविता - अंतर्नाद ), दृश्य-श्रव्य बिंब ( कविता - छटपटाहट ) का प्रयोग भी मिलता है ।           
व्याकरणिक दृष्टि से इक्का-दुक्का कमियां भी दिखती हैं, जैसे - 
तुम समेट लोगी / मुझे है यकीन 
ए माँ / जब भी बिखर जाती हूँ ( पृष्ठ - 47 )      
इन पंक्तियों में ' लोगी ' और  ' जाती हूँ ' का प्रयोग काल की दृष्टि से अशुद्ध है, लेकिन यह अशुद्धियाँ अपवाद स्वरूप ही हैं और ऐसे दोष ढूँढने से भले मिलें, सामान्यतः नहीं ।             
संक्षेप में, भाव पक्ष और कला पक्ष दोनों दृष्टियों से यह एक सफल कविता - संग्रह है । कवयित्री का यह मानना कि कुछ कवि कविता का मजाक बनाए हुए हैं, उनके खुद के उत्तरदायित्व को और बढ़ाता है । यह संग्रह इंगित करता है कि कवयित्री इस दायित्व को निभाने में पूरी तरह समर्थ है ।
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दिलबागसिंह विर्क 
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6 टिप्‍पणियां:

vibha rani Shrivastava ने कहा…

उम्दा समीक्षा

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर !

संजय भास्‍कर ने कहा…

काव्य संकलन की अच्छी समीक्षा बहुत अच्छा लगा, श्रीमती मीनाक्षी आहुजा जी के बारे में जानकर।

Arun Roy ने कहा…

bahut umda samiksha

Arun Roy ने कहा…

umda samiksha

Kavita Rawat ने कहा…


मीनाक्षी आहुजा जी के काव्य संग्रह " मैं अनजान नहीं" की सुन्दर समीक्षा प्रस्तुति हेतु आभार!

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