BE PROUD TO BE AN INDIAN

मंगलवार, जनवरी 15, 2013

आधुनिकता की सबसे बड़ी हार

फरीदाबाद के रेलवे स्टेशन पर लगभग दस घंटे रुकना पड़ा । कारण एक तो पत्नी का साक्षात्कार जल्दी समाप्त हो गया था दूसरा पंजाब मेल दो घंटे लेट थी । इतनी लंबी अवधि का इंतजार सामान्यतय नीरसता भरा रहता लेकिन मेरे लिए यह रोमांचक अनुभव लेकर आया ।


                        बड़ा हाल जो पहले कभी टिकटघर रहा होगा अब यात्रियों के बैठने का बढिया स्थल है । हम भी यहीं डेरा जमाए हुए थे । शाम ढलने के साथ ही साधुओं और निराश्रित लोगों ने रात्रि बिताने के लिए डेरा डालना शुरू कर दिया । उनका व्यवहार आश्चर्यचकित कर रहा था । सबसे पहले मुझे झलक मिली विश्वास की । आज हम हर आदमी को शक्की नजरों से देखते हैं लेकिन गरीब साधु को लोगों पर अटूट विश्वास रहा होगा तभी वह अपनी रजाई को उसी हाल में खुला छोड़कर दिन भर शहर में घूम पाता होगा । यह रजाई उन लोगों के लिए अमूल्य वस्तु हो सकती है, जो रात भर ठंड में ठिठुरते हैं, उस गरीब साधु के लिए भी यह बेशकीमती वस्तु होगी लेकिन इसे लेकर सब पर अविश्वास करना उसको गवारा नहीं । हम इसे इस रूप में भी देख सकते हैं कि इस अति आवश्यक वस्तु से उसे मोह नहीं, और दोनों ही दृष्टिकोण से वह मुझे आम इंसान से ऊपर लगा ।

                   उस साधु और उसके साथियों का आपसी रिश्ता भी गौर करने लायक था । जैसे ही उसके पास एक अन्य व्यक्ति सोने के लिए आसन जमाता है तो वह उससे पूछता है कि क्या उसके पास स्वेटर है ? नहीं में जवाब मिलने पर वह उसे एक स्वेटर यह कहकर दे देता है कि कोई सज्जन उसे आज देकर गया है और उसके पास पहले से एक है इसलिए यह दूसरी वह रख ले । बाद में नये आए साथी से जब वह पानी मंगवाता है तो वह न सिर्फ पानी की बोतल भरकर लाता है बल्कि दो कप चाय भी लेकर आता  है, एक अपने लिए और एक अपने इस साथी के लिए । जब वह दूसरा आदमी पानी लेने गया हुआ था उसी दौरान मैंने खाने के लिए बैग से गच्चक निकाली । उस साधू ने मेरी तरफ हाथ बढाए मैंने उसे गच्चक दे दी । यह गच्चक वह बाद में अपने साथी को यह कहकर दे देता है कि उसके दांत नहीं इसलिए यह तू खा ले। यह व्यवहार मुझे सचमुच में हैरान कर गया । हमसे अगर हमारा साथी कोई वस्तु माँगता है तो अपने पास होते हुए भी हम अक्सर बहाना बनाकर अपने दोस्त को टरका देते हैं जबकि ये लोग दूसरे के लिए मांग रहे हैं । मानवीयता,  भाईचारा जैसे वो गुण जो आज इंसान में लुप्तप्राय हो चुके हैं इन बेघर, बेसहारा, गरीब लोगों में जिन्दा हैं । मैं इनकी तुलना जब आम आदमी से करने लगा तो मुझे यही महसूस हुआ कि हमारी शिक्षा और हमारी सम्पन्नता ने हमें चालाक, धूर्त और स्वार्थी बनाया है । पढ़ लिखकर चाहिए तो यह था कि हम ऊपर उठते लेकिन हम नीचे गिरे हैं , शायद यह हमारी आधुनिकता की सबसे बड़ी हार है 


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8 टिप्‍पणियां:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

कभी कभी ये छोटे छोटे किस्से,घटनाएँ जिंदगी के लिए सबक बन जाती है

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

प्रेरक प्रसंग ....सच में हम तो बहुत स्वार्थी है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सार्थक और सटीक!
बहुत सुन्दर प्रेरक प्रस्तुति!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

सफ़र में अक्सर ऐसे उदारमना लोगों को देख कर मन उल्लास से भर जाता है!

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

सुन्दर प्रेरक विचार ....आभार!!!

कबीर की इन पंक्तियों को शायद सार्थक करता साधू

"साधू इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय

मै भी भूखा न रहूं साधू न भूखा जाय"

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच है, यह उदार व्यवहार संस्कृति की ही देन है। हमें अच्छा तो लगता है देखकर पर उसे जीवन में उतारने में हिचक होती है, प्रेरक संस्मरण।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

सचमुच हमें इनसे सीख लेनी चाहिए ....!!

Kumar Radharaman ने कहा…

अच्छा संस्मरण है।
शिक्षा का जिस अनुपात में विस्तार होता गया है,मनुष्यता का उसी अनुपात में पतन होता गया है।

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