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बुधवार, जनवरी 31, 2018

अपने आप में एक अनूठा संग्रह

कविता-संग्रह - पाँच लघु काव्य-संग्रह एक साथ 
कवि - पाँच कविगण 
प्रकाशक - राज पब्लिशिंग हॉउस 
पृष्ठ - 118 
कीमत - 175 /- ( सजिल्द )
सांझे संकलन में एक संपादक होता है, जो अन्य रचनाकारों से रचनाएँ एकत्र कर प्रकाशन-संपादन का दायित्व निभाता है, लेकिन " पाँच लघु काव्य-संग्रह एक साथ " एक ऐसा साँझा संग्रह है, जिसमें कोई संपादक नहीं, हालांकि भूमिका के आधार पर कहा जा सकता है कि इसमें संपादक की भूमिका रूप देवगुण जी ने निभाई होगी | उन्होंने इस संग्रह को सांझा-संग्रह कहने की बजाए पाँच लघु काव्य-संग्रह कहा है | प्रत्येक संग्रह में 12 से 15 कविताएँ हैं | प्रत्येक कविता-संग्रह का अलग नाम है और सभी कवियों ने अपने संग्रह के लिए आत्मकथ्य लिखा है | कवियों को उनकी उम्र के हिसाब से क्रम दिया गया है |

                           इस संग्रह की प्रथम कड़ी है किरण मल्होत्रा का लघु कविता-संग्रह " अपना-अपना महाभारत " | इसमें 12 कविताएँ हैं | कवयित्री जीवन के कडवे सच का ब्यान करते हुए कहती है कि सभी को अपना महाभारत ख़ुद ही लड़ना पड़ता है | आज के युग में कृष्ण का साथ भी नहीं | उनके अनुसार - 
क्योंकि कौरव / कुरुक्षेत्र छोड़कर /
हमारे मन में ही / कहीं छुप गए हैं ( पृ. - 26 )
वह ज़िंदगी को परिभाषित करते हुए कहती है - 
पूरी ज़िंदगी / कुछ खोई हुई / चीजों के /
पीछे की भटकन है / बाहर मुस्कुराहटें /
भीतर वही तड़पन है   ( पृ. - 24 )
गाड़ी में पीछे छूटते पेड़ उसे जीवन दर्शन समझाते हैं | जीवन नदी की तरह कभी नहीं रुकता | ख्यालों के चंद सिक्के जमा पूँजी रह जाते हैं | उसे कहने-सुनने-समझने के चक्कर में ज़िंदगी के निकल जाने का डर है | वह ख़ुद को समझे जाने की चाह रखती है | कीकर की तुलना अन्य फूलों से करते हुए स्वतन्त्रता का महत्त्व प्रतिपादित करती है |
                       वह दगाबाज लोगों का चित्रण करती है | वह लोगों को पौधों की तरह विभिन्न प्रकार के मानती है | वह पास-पास रहने वालों के बीच की दूरियों का कारण बताती है | वह कभी आकाश को साथी बताती है, तो कभी कह उठती है - 
मन भी शायद / एक आकाश है ( पृ. - 33 )
                     किरण मल्होत्रा ने वर्णनात्मक शैली को भी अपनाया है और अपनी बात कहने के लिए प्रकृति के तत्वों का सहारा भी लिया है | कहीं-कहीं तुकांत का प्रयोग है | भाषा सहज-सरल है |
                           दूसरी कड़ी में वीरेन्द्र भाटिया का कविता-संग्रह " माँ ! तुम कब सोती हो " है | इसमें 15 कविताएँ हैं | उनका मानना है कि वे सामाजिक विद्रूपता पर कविताएँ लिखते हैं और अपनी इस सोच को वे सुंदर कविता की परिभाषा नामक कविता में ब्यान करते हैं | उनकी कविताओं को पढ़कर लगता है कि उन्होंने अलग-अलग चरित्रों जैसे माँ, लड़की, किसान, बूढ़े, ईश्वर आदि को आधार बनाकर कविताएँ लिखी हैं |                                 पुस्तक का शीर्षक बनी कविता में वे माँ के अथक परिश्रम का ब्यान करते हैं तो माँ कविता में वे माँ की स्थिति का सुंदर चित्रण करते हैं जो सफ़र में रहते हुए भी घर की चिंता में लीन है | लड़की की तुलना नदी से करते हुए वे लिखते हैं - 
मेरे देश की लड़की / और पहाड़ों से छूटी नदी /
एक-सी लगी हैं मुझे ( पृ. - 47 )
वे बूढों की जीवन शैली, किसानों के कठिन जीवन, सड़क किनारे बसी बस्ती के जीवन को कविता में उकेरते हैं | उनका मानना है कि जैसे रेट मुट्ठी से फिसल जाती है वैसे ही ज़िंदगी भी फिसल जाती है | पैसे की कमी से दवाई न खरीद पाने का दुःख भी उनकी कविता में स्थान पाता है | 
                          ईश्वर शीर्षक पर उनकी दो कविताएँ हैं | दोनों में ईश्वर पर व्यंग्य है, पहली कविता में कर्मों के फल को लेकर तो दूसरी कविता में ईश्वर के भक्तों पर उसकी अनुकम्पा को लेकर | उनका व्यंग्य गरीबी रेखा से नीचे वाले कविता में और अधिक मुखर होता है, जो इसे अलग स्तर की कविता बना देता है | वे सरकार के फील गुड के नारे पर कहते हैं - 
आज़ादी से अब तक / हम तक पहुंची है सिर्फ /
रेडुए की फ्रीक्वेंसी ( पृ. - 51 )
वे भीतर के आदमी का जिक्र करते हुए आदमी से कहते हैं - 
तुम बेशक मत सुनना / अंदर के आदमी की कोई भी बात /
मगर गिरने मत देना तुम / अंदर के आदमी को ( पृ. - 42 )
                     संक्षेप में, वीरेन्द्र भाटिया सौन्दर्य बोध की बजाए विद्रूपताओं पर लिखने के हिमायती है और उनकी सोच उनकी कविताओं में झलकती है | व्यंग्य का पूत कविता की धार को तीखा करता है |
                       तीसरी कड़ी में डॉ. मंजू दलाल का कविता-संग्रह " खिले खिले पलाश " है | इस संग्रह में 12 कविताएँ हैं | कवयित्री जीवन में व्याप्त सुख-दुःख को लेकर कविताएँ रचती है | उसका मानना है - 
कभी फूलों का मौसम आया /
कभी काँटों ने जाल बिछाया ( पृ. - 77 )
पुस्तक का शीर्षक बनी कविता भी दुःख के बाद सुख का प्रतीक बांधती है | घटा का न बरसना किसान को दुखी करता है | ' आम ' आम आदमी की पहुँच से दूर है | जीवन पल-पल बीत रहा है, जो हम देख नहीं पाते | लोगों के बदल जाने से शहर बेगाना लगता है | 
                      वह कपास के फूलों की ख़ुशी ब्यान करती है | माँ की याद तन-मन को बहला देती है | नन्हीं बच्ची की सुन्दरता का वर्णन करते हुए वह लिखती है -
वह उस सुंदर मुखड़े की / नन्हीं मल्लिका थी /
कोई परी न थी / पर परी से कम न थी ( पृ. - 60 )
लेकिन उसे दुःख है कि घर को बनाने वाली लडकियों को संसार में आने से रोका जाता है | वह प्रेम की समर्थक है - 
प्रेम की घनी छाँव में / खुशियों के फूल खिलते हैं /
दूर होते हैं सभी / अँधेरे जीवन के /
पुंज प्रकाश के खिलते हैं   ( पृ. - 73 )  
                    डॉ. मंजू दलाल की मुक्त छंद की कविताओं में तुकांत का भरपूर प्रयोग है | भाषा सरल है | अलंकारों का प्रयोग सहज रूप से हुआ है | मान्विकर्ण का एक उदाहरण देखिए -
ले रहा है सांस / सन्नाटा भी /
रात की धडकन बढ़ी है ( पृ. - 74 )
                         इस श्रृंखला की चौथी कड़ी डॉ. शील कौशिक का कविता-संग्रह " कचरे के ढेर पर जिंदगी " है | इसमें 12 कविताएँ हैं | पुस्तक का शीर्षक बनी कविता में वे झुग्गी-झोंपड़ियों के जीवन का सजीव चित्रण करती हैं - 
मैले-कुचैले कपड़े पहने / अधनंगे श्री /
उलझे बाल, धंसी आँखें / और पीठ लगे पेट लिए / 
बचपन ( पृ. - 81 )
माँ पर आधारित दो कविताएँ हैं | माँ की देखभाल नया जोश भर्ती है तो माँ से जुडी हर चीज जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती है | माँ का कमरा इबादत का स्थान बन जाता है | गोद को सुकूनदायक मानते हुए वे लिखती हैं - 
कितनी पवित्र / कितनी गहरी /
कितनी सुरक्षित और / कितनी गर्माहट भरी /
होती है गोद ( पृ. - 92 )
                       प्रियतम का आना वृन्दावन को घर ले आना है | नई नवेली दुल्हन का चित्रण है | कोई सिर्फ आदमी होने के कारण कविता का विषय नहीं बन सकता | मुस्कान अपरिचितों में भी परिचय करवा देती है | वे मन को ट्रैफिक के रूपक में बंधती हैं, यहाँ अनेक विचार उमड़ते-घुमड़ते हैं | दिल और दिमाग का अंतर बताया गया है | दिल गले मिलने को आतुर है तो दिमाग ऐसा करने से रोकता है | उनका मानना है कि आदमी ने बहुत कुछ बाँट लिया है, लेकिन सब कुछ बांटा नहीं जा सकता - 
पर कैसे बांटोगे तुम / आकाश की उस असीम /
छत्र-छाया को / कोहरे के उस /
साम्राज्य की चादर को / जो मुल्कों की सीमाओं को /
एकाकार कर देती है ( पृ. - 90 )
                           कवयित्री ने सरल भाषा के द्वारा जीवन के विभिन्न विषयों को छुआ है और बड़ी सहजता से उन्हें अभिव्यक्त किया है |
                              इस संग्रह की अंतिम कड़ी के रूप में है रूप देवगुण का कविता-संग्रह " तुम झूठ मत बोला करो " | इस संग्रह में 13 कविताएँ हैं | पुस्तक का शीर्षक बनी कविता में वे पत्नी की अहमियत दर्शाते हैं कि उसके साथ ही सारी ख़ुशियाँ मायके चली जाती हैं -
तुम झूठ मत बोला करो / तुमने कहा था /
कि घर में सब कुछ पड़ा है / पर यहाँ तो कुछ भी नहीं था ( पृ. - 106 )
पत्नी मुस्कराहट के द्वारा कवि के अनेक प्रश्नों को हल कर देती है | वे डबवाली अग्निकांड में जले लोगों को समर्पित करते हुए कविता लिखते हैं जिसमें उन बच्चों की दशा का ब्यान है जिनके पिता कभी वापस नहीं लौटे |           
                      कवि के अनुसार मुहल्ले में जो शरीफ है पूरे मुहल्ले का कूड़ा उसके घर के सामने आ जाता है | उनके अनुसार भीतर का विस्फोट बाहर के विस्फोट से अधिक विनाशकारी होता है | उन्हें गर्मी का मौसम धरती का बुखार लगता है | बंद कमरों में बैठे लोग अकेले हैं | कवि को जीवन छोटा मालूम पड़ता है |सीढ़ियों से छत पर चढ़ने के जरिए वे जीवन दर्शन ब्यान करते हैं - 
कि कई बार पूरी ज़िंदगी लग जाती है /
सीढ़ियों से छत तक पहुंचने के लिए ( पृ. - 102 )
धर्म के बारे में वे लिखते हैं - 
धर्म गले मिलवाता है / वह गले नहीं कटवाता ( पृ. - 118 )
उनके अनुसार रेहड़ी वाले सूरज के साथी हैं | पहाड़ों की सुन्दरता के बीच वहाँ के मजदूर वर्ग को देख पाना बड़ा मुश्किल है | 
                             रूप देवगुण की कविताएँ एक तरफ जीवन के उजले पक्ष को ब्यान करती हैं तो दूसरी तरफ काले पक्ष का चित्रण करती हैं | वे समाज के दोहरे चरित्र को बड़ी सरलता से ब्यान करते हैं |
                             यह संग्रह अपने आप में एक अनूठा संग्रह है | इसमें एक साथ पाँच अलग-अलग शैलियों की कविताएँ पाठक को मिलती हैं | प्रत्येक कवि की कम से कम 12 कविताएँ होने के कारण पाठक को एक कवि को समझने का पर्याप्त अवसर मिलता है | अपनी विविधता के कारण यह एक सार्थक प्रयोग है |
दिलबागसिंह विर्क 
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1 टिप्पणी:

Vishwa Mohan ने कहा…

सुन्दर रचनाओं का स्तवक!!!

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