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बुधवार, सितंबर 13, 2017

बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ को दिखाता कहानी-संग्रह

बाल कहानी-संग्रह – बचपन के आईने से
कहानीकार – डॉ. शील कौशिक
प्रकाशक – अमृत बुक्स, कैथल
पृष्ठ – 88
कीमत – 250/- ( सजिल्द )
बाल साहित्य लिखते समय लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह अपने स्तर को बच्चों के स्तर तक लेकर जाए, तभी वह बच्चों के प्रिय विषयों को चुन सकता है और विषयों को उस तरीके से निभा पाता है कि बच्चे उसे सहजता से आत्मसात कर सकें | डॉ. शील कौशिक के बाल कहानी-संग्रह “ बचपन के आईने से ” को पढ़ते हुए कहा जा सकता है कि लेखिका इस चुनौती की कसौटी पर खरी उतरी है | इस बाल कहानी-संग्रह में 18 कहानियां हैं | पुस्तक का शीर्षक किसी कहानी पर आधारित नहीं अपितु यह उनकी समग्रता पर आधारित है | लेखिका ने जीवन को बचपन के आईने से देखने का सफल प्रयास किया है |

            इस संग्रह की पहली कहानी ‘ जीरो से हीरो ’ आज के सबसे प्रासंगिक विषय पर है | बेटी बचाओ, बेटी पढाओ अभियान जोरों पर है लेकिन बेटी को कम आंकना सामान्य बात है | उमा भी इसकी शिकार है | माँ-बाप के उपेक्षा के चलते उसे चोरी की गलत लत भी लग जाती है, लेकिन वह इससे उबर कर खेल में नाम कमाती है | चोरी की आदत को ‘तरकीब ’ कहानी में भी विषय बनाया गया है | इन दोनों कहानियों में चोरी की आदत के पनपने के कारण का उल्लेख मिलता है | उमा लड़की होने के कारण उपेक्षा का शिकार है तो नितिन के पिता को क्रिकेट पसंद नहीं जबकि नितिन को बीत खरीदना है | विवशतावश दोनों चोरी करते हैं | बच्चो के चोरी करने के पीछे अक्सर ऐसे ही कारण होते हैं | लेखिका ने नितिन की कक्षा इंचार्ज में जो बुद्धिमता दिखाई है अगर सभी अध्यापक उसे अपना लें तो बच्चों की बुरी आदतों को सुधारा जा सकता है | ‘तरतीब’ कहानी में लेखिका नितिन के बारे में लिखती है –
जितना उसके पिता उसे क्रिकेट न खेलने के लिए समझाते उतना ही नितिन का क्रिकेट खेलने का जूनून बढ़ता जाता |( पृ. – 79 )
बच्चे अक्सर ऐसा ही बर्ताव करते हैं | लेखिका ने इसे ‘ आज्ञाकारी मुकुल ’ कहानी में भी दिखाया है –
जितना माँ उसे कुमार के साथ रहने के लिए टोकती उतना ही वह उसकी ओर खिंचता जाता |( पृ. – 51 )
जिस बात से रोका जाए, उसी को करना बच्चों की सामान्य बात है, लेखिका ने इस मनोवैज्ञानिक सच को बड़ी सुन्दरता से उभारा है और ‘ आज्ञाकारी मुकुल ’ कहानी के माध्यम से प्यार को ही इसका उपाय बताया है |
            घरों में अक्सर बच्चों को किसी-न-किसी चीज से डराया जाता है | भूत का डर तो सर्वविदित है ही | लेकिन ने इसे लेकर दो कहानियाँ लिखी हैं, लेकिन दोनों का कथानक अलग-अलग है | ‘ पहाड़ का रहस्य ’ कहानी में आदि के दोस्त उसे मूर्ख बनाने के लिए भूत की अफवाह फैलाते हैं तो ‘ अनोखा भूत ’ कहानी अज्ञानता को भूतों के होने का कारण बताती है | ग्रामीण अंचल में जब आधुनिकता ने पाँव नहीं पसारे थे तब कूकर की सीटी भूत का रूप धारण कर लेती है | सामान्य जीवन में भी अज्ञानता और अफवाहें ही भूतों को जन्म देती हैं | ऐसी अफवाहें चोरों को भी मौक़ा देती हैं, लेखिका ने इसे ‘ नन्हें जासूस ’ कहानी के माध्यम से बताया है | मनकू के नालायक लड़के इन्हीं अफवाहों के चलते “ काले कच्छे वाले बनकर चोरियां करते हैं | यह कहानी बच्चों की बहादुरी को भी दिखाती है | ‘ साजिश ’ कहानी में भी बच्चे पडौसी काका का पर्दाफाश करते हैं | ‘ पोलियो मुक्ति ’ अज्ञानता को लेकर लिखी गई कहानी है | नमिता जिस काम को नहीं कर पाती जानू बड़ी समझदारी से कर लेता है | अज्ञानता को दूर भगाने और देश को पोलियो मुक्त करने में वह अपना योगदान देता है | अज्ञानता से ही अंधविश्वास पैदा होते हैं | ‘ अंधविश्वास ’ टूने-टोटके के विषय को उठाती कहानी है | आर्यसमाजी परिवार की औरत भी टूने से उठाकर न खाने की बात अपने बेटे को कहती है, लेकिन पिता ख़ुश हैं कि इसी बहाने अंशुल समाज को बड़ा संदेश दे जाता है | बच्चे सिर्फ बच्चे नहीं होते, वे कई बार बड़ों की भूमिका भी अदा करते हैं | ‘ तोहफा ’ कहानी का जिमी ऐसा ही बालक है जो माँ को समझाने के लिए उससे मार तक खाता है और आखिर में माँ को चाय से परहेज करने के लिए मना लेता है क्योंकि डॉक्टर ने उसे चाय पीने से मना किया है |     
            बालमन बड़ा नाजुक होता है | ‘ रंगों का जादू ’ इसी विषय को दिखाती कहानी है | अंकित के साथ होली के दिन जो होता है, उसके कारण तुषार होली से डरने लगता है | लेखिका इस कहानी के माध्यम से कीचड़, ग्रीस, काले तेल और कैमिकल रंगों से दूर रहकर तिलक होली खेलने का संदेश भी देती है | बच्चे पशु-पक्षियों से बड़ा प्रेम करते हैं | ‘ झबरी और उसके बच्चे ’ तथा ‘ गुल्लू बन्दर ’ इसी विषय को लेकर लिखी गई कहानियां हैं | ‘ झबरी और उसके बच्चे ’ कहानी में यहाँ सलौनी और खिलौनी का कुत्ते के पिल्लों से लगाव दिखाया गया है, वहीं ‘ गुल्लू बन्दर ’ में बन्दर किस कद्र बच्चे से अपनापन दिखाता है, उसे भी दर्शाया गया है | ‘ ममता ’ कहानी गाय की अपनी बछिया के प्रति प्रेम को दिखाती कहानी है | ‘ ज़िद के आगे जीत ’ फ्लैशबैक तकनीक से लिखी गई कहानी है | अनूप के माँ-बाप अनूप के सिफारिश से मिले इनाम न लेने की ज़िद को याद करते हैं, इसी ज़िद के चलते वह कामयाब भी होता है | ऐसी ही ज़िद को दिखाती है कहानी ‘ दादी की सीख ’ | सौम्या को डी.सी. महोदय से इनाम लेने की ज़िद है और वह इसे हासिल करती है |
            ‘ मनु और कनु ’ घटना के बल पर स्वभाव में आए परिवर्तन को दिखाती है, जबकि ‘ सुहाना ’ में बाई की बेटी की पढाई को विषय बनाया गया है | पढाने के लिए जिस योग्यता का होना चाहिए नेहा का उसमें अभाव है | नेहा को लगता है कि सुहाना पढ़ नहीं सकती लेकिन वही सुहाना नेहा के बेटे अतुल से खेलते-खेलते गिनती सीख जाती है |
            लेखिका ने ज्यादातर कहानियाँ वर्णात्मक शैली में लिखी हैं | ‘ साजिश ’ और ‘ ममता ’ में आत्मकथात्मक शैली को अपनाया है | पात्रों के चित्रण में लेखिका सफल रही है | ‘ मनु और कनु ’ कहानी में लेखिका उनका परिचय ख़ुद करवाती है –
परन्तु दोनों एकदम विपरीत स्वभाव की थीं | मनु जहाँ नर्म दिल, नाजुक और सबको प्यार करने वाली थी वहीं कनु कठोर-दिल, मजबूत व हरदम गुस्सा करने, झगड़ने वाली थी |( पृ. – 30 )
अंशुल की आदतों से उसका चरित्र उभरता है, तो अनूप के चरित्र का पता उनके माँ-बाप के माध्यम से चलता है | कहने से अभिप्राय है कि लेखिका ने चरित्र-चित्रण की सभी विधियों को अपनाया है | संवाद का प्रयोग कम किया है, लेकिन यहाँ किया है वहां संवाद सटीक और कहानी को गति देने वाले हैं | ‘ सुहाना ’ कहानी का एक उदाहरण –
सुहाना फिर बोली, “ क्या मैं आपको आंटी कहूँ ?”
“ हाँ, हाँ क्यों नहीं सुहाना ?”
 सुहाना ने फिर पूछा, “ अब तो आप मुझे पढ़ाओगी न ?”
“हाँ, सुहाना, कल से तुम अपना बैग लेकर आना, जो तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए खरीदा था |” ( पृ. – 61 )
कहानियों में वातावरण का सजीव वर्णन मिलता है –
सभी बच्चे खेलना छोड़कर आंगन में इकट्ठे हो गए और इधर-उधर देखने लगे | सभी डर के मारे एक-दूसरे से सट कर खड़े हो गए | नेहा तो कुछ ज्यादा ही डरी हुई थी |( पृ. – 47 )
लेखिका ने सरल भाषा का प्रयोग किया है ताकि बच्चों को कहानियाँ समझने में दिक्कत न हों | सामान्य प्रचलित देशज शब्दों का प्रयोग इसे सरस बनाता है |
            संक्षेप में, लेखिका को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ है | आम जन-जीवन से विषयों को चुनकर सुंदर कहानियों का सृजन किया गया है | यह कहानियां बालकों के लिए तो हैं ही, अभिभावकों के लिए भी पठनीय हैं |
             दिलबागसिंह विर्क 
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2 टिप्‍पणियां:

विकास नैनवाल ने कहा…

आपके लेख ने कहानी संग्रह के प्रति रूचि जागृत की है। इस किताब का आईऐसबीऐन नंबर हो या किताब का कोई ऑनलाइन लिंक हो देने की कृपा कीजियेगा। नेट में सर्च किया लेकिन कुछ मिला नहीं मुझे।
धन्यवाद
duibaat.blogspot.com

Dilbag Virk ने कहा…

पुस्तक का ISBN - 978-93-82197-91-1
प्रकाशक का मो. न. - 09215897365

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