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गुरुवार, दिसंबर 30, 2010

जश्न नव वर्ष का

हर पल नया होता है, फिर पता नहीं क्यों नव वर्ष का ही जश्न क्यों मनाया जाता है ? नहीं, मैं जश्न विरोधी नहीं हूँ | जीवन को नाचते-गाते ही जिया जाना चाहिए, न कि रो-रोकर | हाँ, सिर्फ नए वर्ष का जश्न मुझे न्यायसंगत नहीं लगता | नए वर्ष में दूसरों से भिन्न कुछ भी नहीं | हर नए दिन की तरह यह भी एक सामान्य तरीके से आया नया दिन है | ऐसे में पार्टीबाजी का बहाना ढूँढने की कोई बात नहीं लगती |
              अगर बात जश्न की है तो हमारा जीवन ऐसा होना चाहिए कि हम हर पल को आनन्द से जी सकें और इसकी शुरुआत के लिए अगर कोई निश्चित दिन चाहिए तो यह एक जनवरी हो सकता है, लेकिन शर्त ये है कि हमारा संकल्प पूरा वर्ष आनन्द से जीने का होगा |आनन्द ! ख़ुशी से बढकर होता है, इसका ध्यान रहे | आनन्द के लिए दूसरों को दुखी नहीं किया जा सकता, अपितु यह दूसरों की भलाई में छिपा रहता है | हमारे तुच्छ स्वार्थों से तो सिर्फ ख़ुशी मिल सकती है, आनन्द नहीं |
       तो चलो आओ वर्ष 2011 के स्वागत में हम आत्ममंथन करते हुए खुद को बदलने के लिए तैयार करें | आनन्द प्राप्ति के लिए प्रयास करें और सही अर्थों में नव वर्ष का जश्न मनाएं |
              
                         * * * * *

1 टिप्पणी:

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

बहुत ही अच्छा आलेख .....
धीरे से खोलें
आओ नव वर्ष का
प्रथम पृष्ठ !
वही है सूर्य
दें रक्ताभ किरणें
सन्देश नया !

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