BE PROUD TO BE AN INDIAN

सोमवार, सितंबर 23, 2019

मुझे बोल्ड और बिंदास कहा गया – प्रियंका ओम

हिंदी का विद्यार्थी हूँ, हिंदी पुस्तकें पढ़ता रहता हूँ | इसी क्रम में तंजानिया में रह रही भारतीय मूल की युवा लेखिका प्रियंका ओम को पढ़ा | उनकी पुस्तकों की समीक्षा भी की | उनका पहला कहानी-संग्रह " वो अजीब लड़की " बेस्टसेलर के खिताब से नवाजा गया, तो वे ख़ुद लेडी मंटो के नाम से पुकारी गई | फेसबुक पर जुड़े होने के कारण उनसे बातचीत हुई | मन बनाया कि एक साक्षात्कार लिया जाए | फोन पर लम्बी बातचीत द्वारा यह संभव हो पाया | साक्षात्कार का यह मेरा पहला प्रयास है, आशा है आपको पसंद आएगा | 
साक्षात्कार 

दि. वि. - हर फैन अपने प्रिय लेखक के बारे में जानना चाहता है, तो सबसे पहले अपने बारे में, विशेषकर भारत से तंजानिया तक के सफ़र के बारे में बताएँ ?
प्रि. ओ. - वैसे तो बिहार में जन्मी पली बढ़ी हूँ , लेकिन पोलिटिकल कारणों से बिहार विभाजित होकर दो टुकड़ों में बँट गया, बिहार और झारखंड | मैं झारखंड के हिस्से आई, लेकिन फिर भी मैं ख़ुद को बिहारी ही कहना पसंद करती हूँ | शादी के बाद हसबैंड के साथ कई देशों में प्रवास के बाद पाँच साल से तंज़ानिया में रह रही हूँ | 
दि. वि. - पहला क़दम चाहे कोई बच्चा उठाए या कोई लेखक, हमेशा झिझक भरा होता है | आप कब झिझक से बाहर निकली ? कब आपको लगा कि आप न सिर्फ़ लिख सकती हैं, अपितु इसे पाठकों के सामने भी रख सकती हैं ?
प्रि. ओ. -  लिखने का कीड़ा बचपन से था, किंतु ज़िंदगी की मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के झंझावत में लेखन का कीड़ा सुप्त अवस्था में पहुँच गया था जो सालों बाद ख़ाली समय मिलने पर पुनः जागृत हो गया | मुझमें कभी भी किसी भी बात को लेकर कोई झिझक नहीं रही, जब मैंने कहानियाँ लिख ली तो मुझे लगा अब छप कर पाठकों के बीच पहुँच जाना चाहिये | अब तो लगता है सुनाने के लिये ही दुनिया में आई हूँ | 
दि. वि. - तंजानिया में रहते हुए भी आपने ख़ुद को हिंदी से कैसे जोड़े रखा ? कोई समस्या जो पाठकों से सांझा करना चाहें ?
प्रि. ओ. - विदेशियों के बीच रहने और काम के बाद घर लौटने पर जब आप घर में अपनी भाषा में बात करते हैं तो अजीब-सा अपनापन महसूस होता है | यही अपनापन मुझे हिंदी में लिखने से मिलता है | हिंदी में लिखकर मैं खुद को देश से जुड़ा हुआ महसूस करती हूँ | इसी जुड़ाव को क़ायम रखने के लिये हमने घर में अपनी भाषा में ही बात करने की रवायत रखी, इसलिये हिंदी से कभी दूर नहीं हो पाई बल्कि पराए देश और परायों के बीच रहकर और अधिक जुड़ाव होता गया | भारतियों के अलावा अन्य किसी भी देश के लोग चाहे कहीं चले जायें, अपनी भाषा नही छोड़ते |
दि. वि. - कहानी विधा को चुनते समय मन में क्या ख्याल रहे ? कौन-कौन से लेखक रहे जिन्होंने आपको प्रभावित किया ?
प्रि. ओ. - लिखते समय कोई विधा दिमाग़ में नही थी, ज़हन में जो क़िस्से थे उनको अपने तरीक़े से कह दिया | मैं ऐसा मानती हूँ कि यदि आप किसी से प्रभावित होते हैं तो आपके  लेखन पर उनका प्रभाव दिखता है फिर वह लेखन स्वाभाविक लेखन न होकर प्रभावित लेखन हो जाता है |
दि. वि. -  क्या अपने लेखन पर आप किसी प्रकार के लेखन का कोई प्रभाव नहीं मानती ? 
प्रि. ओ. – नहीं, अपने लेखन पर मैं किसी का कोई प्रभाव नहीं मानती | जब मेरी पहली कहानी संग्रह “वो अजीब लड़की” आई थी, तब कुछ पाठकों ने मेरी तुलना इस्मत चुगतई से की तो कुछ ने मंटो से,  स्वच्छंदता की समानता के आधार पर की गई लेजेंड लेखकों से यह तुलना जहाँ एक ओर ख़ुशी देती थी वहीं लेडी मंटो का टैग दुःख भी देता था क्योंकि मैं ख़ुद को किसी ख़ास तरह के लेखन धारा में बाँधना नहीं चाहती थी, मेरे लेखन में विभिन्नताएँ हैं यह दूसरे संग्रह ने बता दिया है |
दि. वि. -  कहते हैं लिखने के लिए पढ़ना भी जरूरी होता है ? यह कितना सही मानती हैं और आप किन-किन लेखकों को पढ़ रही हैं ?
प्रि. ओ. - बिलकुल सही कहते हैं, लिखने के लिये पढ़ना बहुत ज़रूरी है लेकिन यह कोई अनिवार्य शर्त नहीं है, मैं नये पुराने तमाम लोगों को पढ़ती हूँ, जब जो मिले जाये | एक बार किताब हाथ में आ जाने के बाद पढ़कर ही रखती हूँ, कई बार किताब मेरे टेस्ट की नहीं होती है तब भी पढ़ लेती हूँ ! एक आध किताब ही होगी जो बहुत कोशिशों के बाद भी पूरा नही पढ़ पाई |
          मेरा कोई फ़ेवरेट लेखक नहीं है, कला के क्षेत्र में कभी भी कोई हमेशा उत्कृष्ट नहीं हो सकता, सफल को बेहतर कहने की हमारी मानसिकता होती है, हम ख़राब या कमतर कहने से डरते हैं ! 
दि. वि. - कहानी के पात्र कहाँ से चुनती हैं ? यथार्थ और कल्पना का कितना अंश रहता है ? लालू, अजीब लड़की, जैन साहब जैसे पात्रों के सन्दर्भ में कुछ कहें ?
प्रि. ओ. - ज़्यादातर कहानी के पात्र समाज से चुनती हूँ, कुछ काल्पनिक भी होते हैं, लेकिन मैं अपने कहन में इस बात का ध्यान हमेशा रखती हूँ कि ऐसा कुछ भी न लिखूँ जो असंभव हो, जो यथार्थ से परे सिर्फ़ कल्पना हो | भला ऐसी कहानियाँ कोई क्यों पढ़े जो संभव ही न हो | कल्पना के घोड़ों के भी लगाम कसे होने चाहिये | 
          लाल बाबू दादी से सुनी हुई कहानी है, मैंने सिर्फ़ शब्द दिये हैं और कहानी में कुछ काल्पनिक घटनाओं का समावेश किया है जो कहानी के प्रवाह के लिये बेहद ज़रूरी था | अजीब लड़की एक काल्पनिक पात्र होकर भी काल्पनिक इसलिये नहीं है, क्योंकि उसे मैंने अपने विचार और अपनी सोच दी, उसे अपने सपने दिये ! कहीं ना कहीं अजीब लड़की में मैं ख़ुद शामिल हूँ और जैन साहब पूरी तरह से काल्पनिक है ! हालाँकि मैं जैन साहब की जगह सिंह साहब या शर्मा जी भी कह सकती थी लेकिन वो दिल्ली में रहने वाली लड़की की कहानी है इसलिये जैन साहब कहा | 
दि. वि. - आपकी कहानी सौतेलापन एक अलग नजरिया रखती है | इस नजरिये को अस्वीकारा नहीं जा सकता या कह सकते हैं कि यह एक ऐसा कड़वा यथार्थ है, जिस पर लेखकों की नजर कम ही गई है | इस विषय को चुनने के पीछे का सच क्या है ? 
प्रि. ओ. - इस कहानी की शुरूआत मेरे बाबा से होती है, मेरे बाबा मेरे असली वाले हीरो हैं और मेरे हीरो अक्सर खाने की टेबल पर भावुक होकर अपने सौतेलेपन के दर्द को सांझा करते थे, कई बार तो उनकी आँखे भीग जाती थीं, जो मैं आज भी नहीं भूल पाई हूँ | उनका दुःख मेरे ज़हन में घर कर गया, फिर मैंने महसूस किया कि ये तो घर घर की कहानी है और आश्चर्य इस बात है कि लोग इस पर बात नहीं करते हैं, जबकि मुझे बहुत दुःख होता है कि कोई माँ अपने सभी बच्चों से एक समान प्यार क्यों नही कर सकती, जबकि सबको एक समान ही गर्भ में रखती है ? इसलिये जब लिखना शुरू किया तो सबसे पहले यही लिखा | 
दि. वि. - मोशन कहानी आधुनिकता के एक अलग रूप को दिखाती है ? क्या आजकल आधुनिकता का अर्थ महज जिस्म का खेल है ?
प्रि. ओ. - जिस्म से जुड़ी कहानियाँ पहले भी ख़ूब लिखी गई और पढ़ी भी गई | यक़ीनन तब भी उन कहानियों को आधुनिक ही कहा गया होगा और आज से बीस साल बाद भी जब ऐसी स्वच्छंद कहानियाँ लिखी जाएँगी तब भी आधुनिक कही जाएँगी लेकिन मेरे लिये आधुनिकता इमोशन की नायिका का अपने काम को व्यवसाय कहना है और सबसे अहम वह इसमें झोंकी नहीं गई है बल्कि ख़ुद आई है | असल में यही आधुनिकता है | आज से पहले वेश्याओं की कहानी में दुःख दर्द और आँसू लिखे गये थे, यह पहली कहानी है जिसमें एक वेश्या अपनी किस्मत पर रोती नहीं बल्कि अपनी शर्तों पर अपना व्यवसाय करती है |
             हिंदी साहित्य बहुत से पूर्वाग्रहों से घिरा हुआ है और बदलाव को लेकर संकुचित है | आज की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में इंसान दो पल के सुकून को तरस जाता है | ऐसे में मुझे दुःख दर्द लिखना एक तरह का अत्याचार लगता है | 
दि. वि. – सुमित्रानन्दन पन्त ने " वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान " कहकर लेखन में गम को बहुत महत्त्व दिया है, जबकि आप दुःख दर्द लिखना नहीं चाहती क्यों ?
प्रि. ओ. -  सुमित्रानन्दन पन्त जैसे महान कवि की बात काटने का साहस तो नहीं रखती, लेकिन हाँ एक बात जरूर कहना चाहूँगी की दुनिया चाँद पर चली गई है लेकिन हिंदी साहित्य वहीं का वहीं है | मैंने पहले भी कहा कि हिंदी साहित्य बहुत से पूर्वाग्रहों से घिरा हुआ है और बदलाव को लेकर संकुचित है | अब समय बदल गया है | अब ऐसा भी लिखा जाना चाहिए जिसे पढ़कर दुःख दर्द को भूला जा सके | मैं इसलिए ही दुःख दर्द नहीं लिखना चाहती | हाँ, ये सच है कि दुःख-दर्द को भी बड़ी तादाद में पढ़ा जाता है क्योंकि कुछ लोगों को वैसा पढने में ही सुकून मिलता है | दरअसल हर तरह के लेखक होना जरूरी है | 
दि. वि. – ‘ शारीरिक चाह के बिना प्रेम अधूरा है ’ – आपकी इस उक्ति के आधार पर प्रेम और शरीर का क्या संबंध समझा जाए ? आप ने प्लाटोनिक लव  की बात भी की है | यह किस प्रकार संभव है ?
प्रि. ओ. - देखिये जिस प्रेम में शारीरिक चाह नहीं है वह प्लाटोनिक प्रेम कहलाता है लेकिन यदि मात्र प्रेम होगा तो शारीरिक चाह अवश्य होगी | स्पर्श की भाषा का अपना महत्व है,  सिर पे मात्र हाथ रख देना ही ख़ुश रहने का आशीर्वाद समझा जाता है, इसी तरह प्रेम की भी अपनी भाषा होती है  | प्लाटोनिक लव या आध्यात्मिक प्रेम आसक्ति है, जो आजकल देखने को नहीं मिलती है | हाँ ! तीन चार बच्चों के बाद भी बार-बार मीरा का उदाहरण देकर आध्यात्मिक प्रेम की बात कर सकते हैं, दलीलें दे सकते है किंतु प्रेम मन के रास्ते चलकर शरीर पर पूर्णता को प्राप्त करता है | जन्म और मृत्यु के बाद यह इस दुनिया का सबसे बड़ा सच है, मानना या न मानना आप पर निर्भर है | 
दि. वि. - बोल्ड लेखन से आप क्या समझती हैं ? क्या सेक्स, कंडोम की चर्चा मात्र बोल्ड लेखन है या इसका संबंध सामाजिक सरोकार से है | अपने लेखन को सामने रखते हुए बताएँ कि आपका लेखन किन अर्थों में बोल्ड लेखन है ?
प्रि. ओ. - मुझे बोल्ड और बिंदास कहा गया है, हिंदी आज भी इतनी संकुचित है कि बोल्ड को अश्लील समझते हैं और रोमांटिक को इरोटिक लेकिन मेरे लिये बोल्ड का अर्थ है कुछ ऐसा करना जिसे करने के लिए बहुत साहस चाहिए | जैसे सौतेलापन कहानी को ले लें, मेरे लिये वही बोल्ड लेखन है | इमोशन कहानी पाठकों को भले ही सेक्स क्रियाओं के चित्रण के कारण बोल्ड लगी हो लेकिन मुझे यह इसीलिये बोल्ड लगती है क्योंकि इसमें नायिका अपनी सेक्सुएलिटी को न सिर्फ़ ऐक्सेप्ट करती है बल्कि जिस्मफ़रोशी के धंधे में स्वेच्छा से आती है और बड़े ही दुस्साहस के साथ वह ख़ुद को कारपोरेट में काम करने वालियों से बेहतर कहती है |
दि. वि. - आपने सौतेलापन और इमोशन को बोल्ड कहानी कहा । निस्संदेह ये विषय हटकर है । सौतेलापन भी यथार्थ है और इमोशन की कॉल गर्ल आज के समाज का हिस्सा है लेकिन क्या इमोशन की कॉल गर्ल का समर्थन किया जाना चाहिए ? 
प्रि. ओ. - बिलकुल करना चाहिये, बड़े शहरों में इस पेशे में न सिर्फ़ महिलायें हैं बल्कि पुरुष भी हैं और वे स्वेच्छा से हैं | पहले और आज भी इस पेशे में स्त्रियाँ धकेली जाती रही हैं, लेकिन यदि कोई स्वेच्छा से इसमें है और अपनी शर्तों पर है तो हम विरोध करने वाले कौन होते हैं ?  
दि. वि. - वो अजीब लड़की की अपार सफलता ने क्या आप पर किसी प्रकार का दवाब बनाया या आप इससे अछूती रही ? ‘ वो अजीब लड़की ’ से ‘ मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है ’ तक के सफ़र के बारे में बताएँ ?
प्रि. ओ. – ‘ वो अजीब लड़की ’ इतनी सफल होगी ये तो मैंने भी नहीं सोचा था, हालांकि प्रकाशन से पहले कुछ मित्र कह चुके थे कि तुम्हारी कहानियों में आग है लेकिन फिर भी एक आम सी गृहिणी की कहानियों को पाठकों का अकूत प्यार मिलेगा ये नहीं जानती थी, बल्कि ज़रा भी अंदेशा नही था | वो अजीब लड़की की सफलता का पूरा श्रेय मैं पाठकों को ही देना चाहूँगी | 
       सफलता या असफलता दोनों ही स्थितियों में आप पर बेहतर करने का दबाव बना रहता है | यह दबाब मैंने ख़ुद पर भी महसूस किया और यही कारण है कि दूसरा संग्रह लाने में मुझे इतना वक़्त लगा | 
दि. वि. – ‘ मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है ’ की कहानियाँ काफ़ी विस्तार लिए हुए हैं ? इनका विस्तार क्या इनकी जरूरत थी या कोई अन्य कारण रहा ?
प्रि. ओ. - मैंने कहानियाँ कभी भी सोच कर नहीं लिखी, न ही लिखने से पहले दिमाग़ में कोई रूपरेखा तैयार की, शुरूआत करने के बाद कहानियाँ जैसे-जैसे आगे बढ़ी मैं बढ़ातीं चली गई | अजीब लड़की की कहानियों में हमेशा पात्र एक होते थे जबकि ‘ मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है ’ की प्रत्येक कहानी में कई पात्र हैं शायद इसलिये कहानियाँ लम्बी हो गई | फिर लम्बी कहानियाँ लिखने वाली मैं पहली लेखिका नहीं, मुझसे पहले रिस्किंग बॉंड जैसे क़लमकार भी लम्बी कहानियाँ लिख चुके हैं | 
दि. वि. - आमतौर पर धारणा है कि लड़के फ्लर्ट करते हैं | प्रेम पत्र कहानी का पात्र स्वप्निल भी ऐसा ही है लेकिन इस कहानी के माध्यम से आपने लड़कियों की ऐसी ही सोच को दिखाया है ? यह नए दौर का बदलाव है या पहले भी ऐसा ही था, बस उनको फ्लर्ट करते दिखाने का चलन नहीं था ?
प्रि. ओ. - पहले लड़कियाँ फ़्लर्ट करती थी या नहीं, ये मैं नहीं कह सकती क्योंकि तब मैं नही थी, लेकिन अब लड़कियाँ भी फ़्लर्ट करती हैं और ‘ प्रेम पत्र ’ कहानी के माध्यम से मैंने लड़कियों की यही बोल्डनेस दिखाई है | 
दि. वि. - कहानी को बनाने के लिए आपने कई युक्तियों को अपनाया है ? ये युक्तियाँ कथानक के साथ-साथ विकसित होती हैं या इनको पहले ध्यान में रखकर कहानी को बुना जाता है ? कहानी कहने के लिए कौन-सा तरीका आपको ज्यादा सरल लगता है ?
प्रि. ओ. - जैसा कि मैंने पहले भी कहा मैं कहानियाँ प्लान करके नहीं लिखती, जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है वैसे-वैसे मैं लिखती जाती हूँ और कहन का ये तरीक़ा मुझे सबसे सरल लगता है | पुस्तक का ज़िक्र, फ़्लैश बैक और गीत आदि का सहारा मेरे कहन का स्टाइल है, जो कहानी के साथ ही डिवैल्प होता है | मेरी अगली पुस्तकों में भी यह सब आपको मिलेगा, खास कर गीत और पुस्तक का ज़िक्र क्योंकि पुस्तक और गीत के बिना मैं अपने एक दिन की भी कल्पना नहीं कर सकती |
दि. वि. - अंग्रेजों के शासनकाल में हिंदी को देवनागरी लिपि की बजाए रोमन लिपि देने की कोशिश की गई थी | यदि ऐसा होता तो शायद हिंदी अपना वजूद खो चुकी होती | आजकल नए लेखक फिर रोमन में शब्दों को बहुतायत में लिख रहे हैं | क्या इस तरह हिंदी लेखक ही हिंदी का अहित नहीं कर रहे ?
प्रि. ओ. - भाषा की दृष्टि से देखें तो भारत अफ़्रीका से भी ज़्यादा पिछड़ा हुआ है, अंग्रेज़ों से तो आज़ाद हो गये लेकिन अंग्रेज़ी के ग़ुलाम बन गये | अंग्रेज़ी के ऐसे बहुत से शब्द हैं जो अत्यधिक व्यवहार के कारण हिंदी से मालूम पड़ते हैं और आने वाली पीढ़ी उसका  हिंदी अर्थ जानने की कोशिश नहीं करेगी | यह दोष मात्र हिंदी लेखकों का नहीं हमारे समाज और इंग्लिश ग़ुलाम मानसिकता का है, क्या हम पाँच पंक्ति बिना किसी अंग्रेज़ी शब्द के प्रयोग के बोल सकते हैं ? नहीं !  आप बताइये भला डोमेस्टिक फ़्लाइट में अंग्रेज़ी उद्घोषणा का क्या अर्थ ? असल में आज भी भारत में इंग्लिश बोलना पढ़ना अर्बन माना जाता है और हम हिंदी के लेखक शायद अंग्रेज़ी शब्दों के प्रयोग से यह कहना चाहते हैं कि हम हिंदी लिखते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम पिछड़े हुए है, हमें अंग्रेज़ी नहीं आती | यह तो अंग्रेज़ी शब्दों के प्रयोग की बात हुई, लेकिन उसके रोमन में लिखने का कारण यह है कि हो सकता है उस इंग्लिश शब्द से आप परिचित नहीं हों, तब उसके देवनागरी लिपि में लिखे का आप क्या अर्थ लगायेंगे जबकि रोमन में लिखे का फ़ायदा यह है कि हम डिक्शनरी देखकर उसका अर्थ जान सकते हैं |
              वैसे मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि अगली किताब में कम से कम अंग्रेज़ी का इस्तेमाल हो | 
दि. वि. – आपकी नजर में आज हिंदी लेखन की क्या स्थिति है ? क्या आप हिंदी लेखक की स्थिति से संतुष्ट हैं ?
प्रि. ओ. - आज हिंदी लेखन गढ़, मठ या समूह आदि के हाथों की कठपुतली है, हालाँकि मैं हिंदी लेखन में नई हूँ लेकिन सुना है हिंदी लेखन में शुरू से ही मठों का बोलबाला रहा है | ऐसे लोग हिंदी के पक्षधर नहीं बल्कि दुश्मन हैं | पिछले दिनों एक लेखक ने अपनी सफलता का श्रेय तमाम मठों के निर्माता को समर्पित किया था लेकिन मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकती क्योंकि मुझे पाठक ने बनाया है |
         यहाँ तक हिंदी लेखक की स्थिति का प्रश्न है, मैं हिंदी लेखक की स्थिति से ख़ुश नही हूँ, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर मैं सबको हिंदी लेखन में न आने की सलाह देती हूँ | जिस दिन हिंदी लेखन आपसी द्वेष और वैमनस्यता से मुक्त होगा उस दिन वाक़ई, मेरे साथ-साथ हिंदी के सभी लेखक भी संतुष्ट होगा | 
दि. वि. - भविष्य की योजनाएँ ?
प्रि. ओ. - एक हिंदी नॉवल पर काम कर रही हूँ, लेकिन कई बार हिंदी लेखन की स्थिति से घबरा कर लिखना बंद कर देती हूँ इसलिये कुछ कह नहीं सकती कब पूरी होगी | दूसरी तरफ़ इंग्लिश कहानी संग्रह पर काम कर रही हूँ जो शायद हिंदी नॉवल से पहले आये |
दि. वि. - पाठकों के नाम क्या संदेश देना चाहेंगी ?  
प्रि. ओ. - किसी संदेश की जगह आभार कहना चाहूँगी क्योंकि मुझे आप सबने ही बनाया है, एक आम गृहिणी से लेखिका तक का सफ़र तय करना आपके बिना सम्भव नहीं था | मुझे हमेशा यूँ ही पढ़ते रहें | 
साक्षात्कार कर्ता
दिलबागसिंह विर्क 
Email – dilbagvirk23@gmail.com
Mo. - 8708546183

10 टिप्‍पणियां:

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' PBChaturvedi ने कहा…

बेहतरीन साक्षात्कार...👌👌👌

Mujahid mirza ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन साक्षात्कार है बेबाक सवाल और बिंदास जबाव।

Malti Mishra ने कहा…

बेहद उम्दा, विस्तृत और गूढ़ साक्षात्कार दिलबाग जी।

Navneet singh ने कहा…

हर सवाल का सटीक जवाब दिया है आपने । बढ़ियाँ और शानदार साक्षात्कार ।

Navneet singh ने कहा…

हर सवाल का सटीक जवाब दिया है आपने । बढ़ियाँ और शानदार साक्षात्कार ।

रश्मि शर्मा ने कहा…

बेहतरीन सवाल-जवाब। बधाई आप दोनों को

Malhotra vimmi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Malhotra vimmi ने कहा…

बहुत खुब साक्षात्कार
बधाई

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत ही बढ़िया साक्षात्कार। पढ़कर प्रियंका जी का साहित्य पढ़ने की इच्छा जागृत हो गई हैं।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बधाई इस साक्षात्कार के लिये और आभार लेखिका से परिचय कराने के लिये।

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