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सोमवार, मार्च 21, 2016

अपने समय की तमाम विसंगतियों को ललकारता हुआ संग्रह

कविता संग्रह - समय से मुठभेड़ 
शायर - अदम गौंडवी 
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन 
कीमत - 75 / - पेपरबैक 
पृष्ठ - 108
अदम गोंडवी का  कविता / ग़ज़ल संग्रह  ' समय से मुठभेड़ ' अपने समय की तमाम विसंगतियों को ललकारता हुआ संग्रह है | इस संग्रह में 63 ग़ज़लें, 14 मुक्तक और 3 नज़्में हैं | 

                       हथियार उठा ले, चमारों की गली और गाँव का परिवेश - ये तीन शीर्षक हैं उनकी नज़्मों  के | हथियार उठा ले नज़्म में वे गांधी के मुल्क के अजीब हालातों का ब्यान करते हुए इस बात पर सहमति व्यक्त करते हैं कि जनता को अब हक है कि वो हथियार उठा ले | चमारों की गली में वे दबे कुचले वर्ग की दयनीय दशा का चित्रण करते हैं | गाँव का परिवेश कविता में वे इस बात पर तंज कसते हैं कि भारत गाँव में बसता है, इस बात पर वे आत्म आलोचन करने को कहते हैं | उनके मुक्तकों के स्वर भी कुछ ऐसे ही हैं | वे गांधीवाद और ओशोवाद को लताड़ते हैं | राजनीति के परिवारवाद पर व्यंग्य कसते हैं | भूख, लाचारी का वर्णन करते हैं | प्रेमचन्द और उनके पात्र उनको विशेष प्रिय हैं | तभी तो वे अपनी बात उन्हीं के माध्यम से कहते हैं - 
रोटी के लिए बिक गई धनिया की आबरू 
लमही में प्रेमचन्द का होरी उदास है | ( पृ. - 91 )
प्रेमचन्द को वे आधुनिक युग का मंसूर कहते हैं - 
वह सिपाही थे न सौदागर थे न मजदूर थे 
दरअसल मुंशी जी अपने दौर के मंसूर थे | ( पृ. - 94 )
                  उनके इस संग्रह की शुरुआत में गज़लें हैं और ग़ज़ल को भी वे अपने ही अंदाज में कहते हैं | ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ है - महबूब से बातचीत और पारम्परिक ग़ज़ल हुस्न, मै, साकी की ही बात करती थी, लेकिन समय के साथ-साथ ग़ज़ल के विषय में परिवर्तन हुआ है, वे इसे यूँ व्यक्त करते हैं - 
जामो-मीना की खनक से थी ये बावस्ता ज़रूर 
देखिए अब ज़िन्दगी की तर्जुमानी है ग़ज़ल | ( पृ. - 66 )
जिंदगी की तर्जुमानी करती ग़ज़ल मुहब्बत की बजाए रोटी की बात करती है - 
अब चर्चा में रोटी है, मुहब्बत हाशिये पर है 
उतर आई ग़ज़ल इस दौर में कोठी के जीने से | ( पृ. - 68 )
वे न सिर्फ ग़ज़ल के बदले रूप को खुद स्वीकार करते हैं बल्कि साथी ग़ज़लकारों को भी कहते हैं - 
जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाकिफ हो गई 
उसको उस बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो | ( पृ. - 47 )
उनका यह संदेश सिर्फ ग़ज़लकारों के लिए नहीं बल्कि तमाम साहित्यकारों के लिए है - 
अदीबो ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ 
मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक के चाँद तारों में | ( पृ. - 46 )
वे साहित्यकारों को सिर्फ़ मुहब्बत जैसे विषय छोड़ने के लिए ही नहीं कहते, अपितु धर्म जैसे मुद्दे भी छोड़ने को कहते हैं क्योंकि मुख्य समस्या रोटी है - 
छेड़िए इक जंग मिल-जुलकर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए |  ( पृ. - 88 )
जो वे दूसरों को कहते हैं, वे ख़ुद भी लिखते हैं | अपनी गजलों- नज्मों के विषय पर वे लिखते हैं - 
मेरी नज़्मों में मशीनी दौर का अहसास है 
भूख के शोलों में जलती कौम का इतिहास है | ( पृ. - 87 )
                 अदम गोंडवी ने अपनी रचनाओं के विषय के बारे में जो संकेत दिया है, वो उनकी सभी रचनाओं में पूरे शबाब के साथ है | उन्होंने देश के हालातों का बड़ी बारीकी से चित्रण किया है | देश उनकी नज़र में बुधुआ की लुगाई या फिर बेबस गाय है - 
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले 
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है | ( पृ. - 64 )
           भारत माँ की इक तस्वीर मैंने यूँ बनाई है 
         बँधी है एक बेबस गाय खूंटे में कसाई के | ( पृ. - 72 )
देश राजनेताओं और लोगों दोनों पर निर्भर करता है | भारत के राजनेता कैसे हैं, संसद की कार्यप्रणाली क्या है, यह किसी से छुपा नहीं | अदम गोंडवी की कलम कैसे इस विषय से चूक सकती है - 
जल रहा है देश ये बहला रही है कौम को 
किस तरह अश्लील है संसद की भाषा देखिए | ( पृ. - 36 )
वर्तमान के शासकों को वो डलहौजी से भी बुरा कहते हैं - 
जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे 
कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे | ( पृ. - 40 )
बापू के बंदरों को नए तरीके से परिभाषित करते हुए वे उनकी तुलना देश के राजनेताओं से करते हैं - 
देखना, सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं 
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बन्दर आ गए | ( पृ. - 31 )
                      राजनीति का प्रभाव समाज पर पड़ता है, देश के नेता भ्रष्ट हैं, इसीलिए देश के कार्यालयों में भ्रष्टाचार है | कार्यलयों की दशा पर वे लिखते हैं - 
जो उलझकर रह गई है फाइलों के जाल में 
गाँव तक वो रौशनी आएगी कितने साल में | ( पृ. - 50 )
और ये कार्यालय सिर्फ आँकड़ों का खेल खेलते हैं, इस पर उनकी कलम यूँ चलती है - 
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है 
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है | ( पृ. - 59 )
                     जब समाज गलत राह पर हो और नेता भ्रष्ट हों, तब उन्हें सचेत करने का कार्य साहित्यकार का होता है, लेकिन साहित्यकार खुद खेमों में बंटे हैं - 
किसी का रंग धानी है किसी का रंग पीला है 
जमातों में बंटा अपने अदीबों का कबीला है | ( पृ. - 60 ) 
                     जब वे समाज को देखते हैं तो उनकी नज़र दुखी और सताए हुए लोगों पर पड़ती है | गरीबी क्या है, ये तो वही बता सकता है जिसने इसकी कीमत चुकाई हो, बतौर गौंडवी - 
रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी 
जिसने जिस्म गिरवी रखके ये कीमत चुकाई है | ( पृ. - 64 )
गरीबी की इस दशा को देखते हुए वे कुछ ओर लिख ही नहीं सकते - 
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर पतीली है 
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है | ( पृ. - 41 )
शबनमी होंठ तभी सुहाते हैं, जब पेट भरा हो - 
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून 
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को | ( पृ. - 63 )
भूख और गरीबी आदमी को बेबस करती है | रिश्ते भुखमरी की भेंट चढ़ जाते हैं - 
तरी है जब से गाँव में फ़ाकाकशी की शाम 
बेमानी होके रह गए रिश्ते करीब के | ( पृ. - 65 )
ये भूख आदमी को जमीर बेचने को विवश करती है - 
बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को 
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को |  ( पृ. - 63 )
वे भुखमरी को भाग्य के साथ जोड़ने के विरोधी हैं - 
इक हम हैं भुखमरी के जहन्नुम में जल रहे 
इक आप हैं दुहरा रहे किस्से नसीब के | ( पृ. - 65 )
गरीबी के लिए वे पूँजीवाद को दोषी ठहराते हैं - 
लगी है होड़-सी देखो अमीरी और गरीबी की 
ये पूँजीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है | ( पृ. - 59 )
देश के तमाम हालात उन्हें दुखी करते हैं, अहसास का बंजर हो जाना उन्हें अखरता है - 
माफ़ करिए सच कहूँ तो आज हिन्दुस्तान में 
कोख ही जरखेज है अहसास बंजर हो गया | ( पृ. - 51 )
नए दौर में इंसानियत खो रही है - 
चाँद है जेरे क़दम सूरज खिलौना हो गया 
हाँ मगर इस दौर में किरदार बौना हो गया | ( पृ. - 53 ) 
व्यवस्था युवा पीढ़ी को दिगभ्रमित कर रही है - 
इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया 
सैक्स की रंगीनियाँ या गोलियां सल्फास की | ( पृ. - 38 )
सैक्स का प्रचार समाज को बिगाड़ रहा है - 
टी.वी. से अखबार तक गर सैक्स की बौछार हो 
फिर बताओ कैसे अपनी सोच का विस्तार हो | ( पृ. - 32 )
शायर युवाओं की हताशा से निराश है - 
जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम का मिज़ाज 
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिए | ( पृ. - 36 )
                      अदम गौंडवी यहाँ समाज और तन्त्र से दुखी हैं, वहीं समाधान सुझाते हुए लिखते हैं - 
जनता के पास एक ही चारा है बगावत 
यह बात कर रहा हूँ मैं होशोहवास में | ( पृ. - 70 )
हालांकि वे तथाकथित विद्रोहियों की भी बखिया उधेड़ते हैं - 
एक अलग ही छवि बनती है परम्परा भंजक होने से 
तुलसी इनके लिए विधर्मी, देरीदा को खास लिखेंगे | ( पृ. - 27 )
उनका मानना है कि इतिहास से छेड़छाड़ का कोई लाभ नहीं - 
गर चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे 
क्या इससे किसी कौम की तक़दीर बदल दोगे | ( पृ. - 89 )
वे पुरातन संदर्भों को नए अर्थ देते हैं - 
मत्स्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार 
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिए | ( पृ. - 36 )
औरत को सम्मान देने की बात करते हुए वे लिखते हैं - 
कहीं हो जिक्र अकीदत से सर झुका देना 
बड़ी अजीम ये औरत की जात होती है | ( पृ. - 34 )
शायर सुहाने कल का सपना देखता है और इसे पूरे होने की आशा रखता है - 
एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हें 
झोंपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार हो | ( पृ. - 33 )
वह नया करने की जिद्द ठानता है - 
मानवता का दर्द लिखेंगे, माटी की बू बास लिखेंगे 
हम अपने कालखंड का एक नया इतिहास लिखेंगे | ( पृ. - 27 )
                     वे समाज की विसंगतियों का निरूपण करते हुए संघर्ष की राह अपनाने का संदेश देते हैं, संघर्ष करने वालों की जीत होगी, ऐसी उनकी मान्यता है, और इसके लिए वे डार्विनवाद का उद्धरण भी देते हैं -
बकौल डार्विन बुजदिल ही मारे जाएंगे 
सरकशी यूँ ही अदम मीरे कारवाँ होगी | ( पृ. - 90 )
                           भाव पक्ष से यह संग्रह यहाँ समृद्ध है, वहीं शिल्प पक्ष से भी इसमें कोई कमी नहीं दिखती | ग़ज़लें अपनी गजलियत के साथ विद्यमान हैं | ग़ज़ल मुख्यतः उर्दू की विधा है, ऐसे में उर्दू शब्दावली का होना सहज ही है | शायर ने यह स्वीकार किया है कि कविता का जन्म अनायास होता है, वह सहज अनुभूति और कल्पना का मिश्रण है -    
अचेतन मन में प्रज्ञा कल्पना की लौ जलाती है 
सहज अनुभूति के सत्र में कविता जन्म पाती है | ( पृ. - 44 )
                    संक्षेप में, देश को ऐसे औजमयी कृतियों की बेहद जरूरत है, जो देशवासियों की सोई हुई आत्मा को झकझोर सके |
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दिलबागसिंह विर्क 
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1 टिप्पणी:

Shiv Raj Sharma ने कहा…

एक एसे शायर जो की क्रांतिकारी भी है, जो की आज के दौर की चिंता और फ़िक्र समेटे है , को आपने आज जो लोगों के सामने लाने का कार्य वो अति सराहनीय है ।मेरे पसंदीदा शायर है अदम साहब

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