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सोमवार, अगस्त 15, 2011

आओ स्वाधीनता दिवस पर प्रण लें

आज राष्ट्र ६५ वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है । गाँव-गाँव, शहर-शहर आयोजन हो रहे हैं, ध्वजारोहण हो रहा है, बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे हैं, शहीदों को नमन किया जा रहा है । यह एक अच्छी बात है, लेकिन यह जज्बा दोपहर ढलते-ढलते दूध में आए उफान की तरह बैठ जाता है । फिर किसी को न देश की याद आती है न शहीदों की । यही कारण है कि भारत आज भी उस मुकाम को नहीं छु पाया जिसकी कल्पना आज़ादी के दीवानों ने की थी । आज़ादी अपने वास्तविक अर्थों से कोसों दूर है । 
          आज अधिकारों की बात बहुत की जाती है । लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों, इस हेतु बहुत प्रचार हुआ है । RTI इस दिशा में उठाया गया बेहतरीन कदम है, लेकिन सिर्फ भाषणों को छोड़कर कर्तव्यों की बात कहीं नहीं हो रही । क्या कर्तव्यों के बिना अधिकार पाए जा सकते हैं ? एक का कर्तव्य दूसरे का अधिकार है । कर्तव्य और अधिकार एक सिक्के के दो पहलू हैं और किसी एक को ठुकराकर दूसरे को हासिल नहीं किया जा सकता ।  
            आज राष्ट्र को कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों की जरूरत है । '' देश ने हमें क्या दिया ?'' यह प्रश्न पूछने की बजाए '' हमने देश को क्या दिया ? '' -यह पूछने की जरूरत है । निस्संदेह स्वाधीनता दिवस एक बड़ा पर्व है और इस बड़े पर्व पर यह प्रण लेने की जरूरत है कि दूसरों को कुछ कहने से पहले, दूसरों से कुछ अपेक्षा करने से पहले हम खुद को सुधारेंगे । अगर हम खुद को सुधार पाए तो राष्ट्र के हालत भी अवश्य सुधरेंगे क्योंकि राष्ट्र वैसा ही है जैसे हम हैं । 
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                      दिलबागसिंह विर्क 
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13 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

65वें स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

संजय भास्कर ने कहा…

आज़ादी की वर्षगाँठ की हार्दिक बधाई....!

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सही लिखा है आपने...
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

vicharneey post. aisi soch ki jarurat hai.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

इस बड़े पर्व पर यह प्रण लेने की जरूरत है कि दूसरों को कुछ कहने से पहले , दूसरों से कुछ अपेक्षा करने से पहले हम खुद को सुधारेंगे .

Sunil Kumar ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं....

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

Yahi to vicharniy hai har nagrik ke liye....Saarthak Post

anu ने कहा…

मै आपकी बात से सहमत हूँ .......आज सब लोग बेकार कि बहस में पड़ का अपना समय व्यर्थ गँवा रहे है

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

दूसरों को कुछ कहने से पहले , दूसरों से कुछ अपेक्षा करने से पहले हम खुद को सुधारेंगे .

यही प्रण लेना तो मुश्किल है दिलबाग जी ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

टिप्पणी में देखिए मरे चार दोहे-
अपना भारतवर्ष है, गाँधी जी का देश।
सत्य-अहिंसा का यहाँ, बना रहे परिवेश।१।

शासन में जब बढ़ गया, ज्यादा भ्रष्टाचार।
तब अन्ना ने ले लिया, गाँधी का अवतार।२।

गांधी टोपी देखकर, सहम गये सरदार।
अन्ना के आगे झुकी, अभिमानी सरकार।३।

साम-दाम औ’ दण्ड की, हुई करारी हार।
सत्याग्रह के सामने, डाल दिये हथियार।४।

Abhishek ने कहा…

कौन सी आजादी की बात कर रहे है आप. वही जिसमे एक आम इन्सान नेताओ, पुलिस , गुंडों का गुलाम है और उनके हिसाब से ही किसी तरह गुलामी में जी रहा है या उस आजादी की बात कर रहे हो जिसमे अंग्रेज तो चले गए किन्तु उनके एजेंट आज भी इंडिया को बर्बाद कर रहे है. इंडिया कभी आजाद हुआ भी था या केवल सत्ता का स्थान्तरण हुआ था अंग्रेजो और अंग्रेजो के अजेंटो के बीच में.

S.M.HABIB ने कहा…

सच्चा आवाहन....
सादर शुभकामनाएं

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

भैया. कर्तव्य तो ६५ वर्ष से निभाते आ रहे हैं :)

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